विविध परंपराओं में रचा-बसा उत्सव देता है विवेक, सद्भाव और न्याय का संदेश
कुमार कृष्णन

भारत उत्सवों का देश है। यहां त्योहार केवल धार्मिक आस्था की अभिव्यक्ति नहीं, बल्कि समाज की सांस्कृतिक स्मृति, सामूहिकता और जीवन-दृष्टि के वाहक भी हैं। दशहरा अथवा विजयादशमी ऐसा ही पर्व है, जो देश के विभिन्न हिस्सों में अलग-अलग रूपों में मनाया जाता है। इसकी अनेक परंपराएं बुराई पर अच्छाई, अन्याय पर न्याय और अहंकार पर विवेक की विजय का संदेश देती हैं। भारत की सांस्कृतिक विविधता को समझने के लिए यह पर्व एक महत्त्वपूर्ण अवसर है। आयोजन की पद्धतियां भिन्न होने के बावजूद इनके बीच आस्था, सहभागिता और सामुदायिक जीवन का साझा सूत्र मौजूद है।
उत्तर भारत में दशहरा भगवान राम की रावण पर विजय के रूप में मनाया जाता है। रामलीलाओं के मंचन के बाद अनेक स्थानों पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन होता है। यह आयोजन केवल रामकथा का पुनर्पाठ नहीं, बल्कि समाज को यह याद दिलाने का अवसर भी है कि शक्ति और ज्ञान के बावजूद अहंकार मनुष्य को पतन की ओर ले जाता है। रामलीला के मंच पर प्रस्तुत प्रसंग पीढ़ी-दर-पीढ़ी नैतिक मूल्यों और लोक-संस्कृति को पहुंचाते हैं। मेलों में बच्चों की उमंग, कलाकारों का श्रम और लोगों की सामूहिक भागीदारी इस पर्व को सामाजिक उत्सव का रूप देती है।
लेकिन दशहरे का अर्थ केवल रावण के पुतले का दहन नहीं है। यदि यह रस्म निभाने के बाद भी समाज में अहंकार, अन्याय, हिंसा, स्त्रियों का अपमान और भेदभाव कायम रहें, तो पर्व का नैतिक उद्देश्य अधूरा रह जाता है। आज दशहरा हमें अपने भीतर और आसपास मौजूद बुराइयों को पहचानने की चुनौती देता है। भ्रष्टाचार, नफरत, सामाजिक असमानता और कमजोरों के अधिकारों की अनदेखी भी ऐसी बुराइयां हैं, जिनसे मुक्ति के प्रयास किए बिना विजयादशमी का संदेश सार्थक नहीं हो सकता।
शक्ति की आराधना और लोकजीवन
बंगाल में विजयादशमी दुर्गापूजा के व्यापक उत्सव का समापन अवसर है। यहां मां दुर्गा की आराधना के साथ महिषासुर पर उनकी विजय का स्मरण किया जाता है। बंगाली समाज में दुर्गा को बेटी के रूप में देखने की आत्मीय परंपरा भी है। लोकमान्यता के अनुसार, मां दुर्गा अपने मायके आती हैं और कुछ दिनों बाद विदा होती हैं। इस भावभूमि में दुर्गापूजा धार्मिक अनुष्ठान से आगे बढ़कर घर-परिवार, स्मृति, प्रेम और बिछोह की अनुभूति से जुड़ जाती है। विशाल पंडाल, कलात्मक प्रतिमाएं, रोशनी, संगीत और सामूहिक भोग-वितरण इस आयोजन को जनजीवन का हिस्सा बनाते हैं। ओडिशा और असम में भी दुर्गापूजा अपनी क्षेत्रीय विशेषताओं के साथ मनाई जाती है।
गुजरात में नवरात्र के दौरान गरबा और डांडिया रास सामूहिक उल्लास के प्रमुख माध्यम बनते हैं। रंग-बिरंगे परिधान, पारंपरिक संगीत और नृत्य उत्सव को जीवंत बनाते हैं। गरबा की परंपरा में शक्ति की उपासना और जीवन की निरंतरता का भाव जुड़ा है। यहां धार्मिक आस्था के साथ लोककला, संगीत और सामाजिक मेलजोल को भी बढ़ावा मिलता है। बदलते समय में आयोजन बड़े सार्वजनिक कार्यक्रमों का रूप ले चुके हैं, लेकिन उनकी सांस्कृतिक आत्मा सामूहिक भागीदारी और परंपरा से जुड़ाव में ही निहित है।
ज्ञान और नई शुरुआत
दक्षिण भारत की अनेक परंपराओं में विजयादशमी का संबंध शिक्षा, ज्ञान और नई शुरुआत से भी है। तमिलनाडु और केरल में नवरात्र के अंतिम दिनों में सरस्वती पूजा तथा आयुध पूजा का विशेष महत्त्व है। पुस्तकों और वाद्ययंत्रों की पूजा ज्ञान एवं कला के सम्मान को व्यक्त करती है, जबकि औजारों और कार्य-साधनों का पूजन श्रम तथा आजीविका के प्रति कृतज्ञता का प्रतीक है।
विशेषकर केरल में विजयादशमी पर बच्चों को अक्षर-ज्ञान कराने की परंपरा ‘विद्यारंभ’ कहलाती है। इसमें एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक संदेश छिपा है—ज्ञान जीवन को बेहतर बनाने का साधन है और शिक्षा की शुरुआत शुभ संकल्प के साथ होनी चाहिए। आज शिक्षा में समान अवसर, डिजिटल संसाधनों तक असमान पहुंच और सरकारी विद्यालयों की गुणवत्ता जैसे प्रश्न सामने हैं। ऐसे में यह परंपरा ज्ञान को सबकी पहुंच में लाने की आवश्यकता भी याद दिलाती है।
कर्नाटक के मैसूर का दशहरा अपनी भव्यता और ऐतिहासिक परंपरा के लिए प्रसिद्ध है। विजयनगर की उत्सव-परंपरा और मैसूर के वाडियार राजवंश की विरासत से जुड़ा यह आयोजन देवी चामुंडेश्वरी की आराधना के साथ मनाया जाता है। जंबू सवारी इसकी प्रमुख विशेषता है। इस शोभायात्रा में सुसज्जित हाथी पर देवी चामुंडेश्वरी की प्रतिमा वाला स्वर्ण हौदा रखा जाता है। राजसी वैभव, लोककला, संगीत और पारंपरिक प्रस्तुतियां इसे विशिष्ट बनाती हैं। समय के साथ यह उत्सव सांस्कृतिक पर्यटन और स्थानीय अर्थव्यवस्था से भी जुड़ा है। ऐसे आयोजनों में परंपरा के संरक्षण के साथ पशु-कल्याण और पर्यावरण के प्रति संवेदनशीलता भी आवश्यक है।
कुल्लू और बस्तर की विशिष्टता
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में दशहरे की परंपरा देश के अनेक अन्य हिस्सों से अलग है। यहां विजयादशमी के दिन उत्सव आरंभ होता है और लगभग एक सप्ताह तक चलता है। भगवान रघुनाथ की रथयात्रा तथा आसपास के क्षेत्रों से आने वाले देवी-देवताओं की पालकियों और उनके प्रतिनिधि समुदायों की भागीदारी इसकी खास पहचान है। स्थानीय धार्मिक-सांस्कृतिक परंपराएं इस आयोजन को जीवंत बनाती हैं।
इसी तरह छत्तीसगढ़ का बस्तर दशहरा अपनी विशिष्ट आदिवासी और स्थानीय परंपराओं के कारण उल्लेखनीय है। इसके अनुष्ठानों का क्रम लगभग पचहत्तर दिनों तक चलता है। इसमें मां दंतेश्वरी, स्थानीय देवी-देवताओं और सामुदायिक रीति-रिवाजों का विशेष महत्त्व है। बस्तर दशहरे की परंपरा राम-रावण युद्ध अथवा रावण दहन पर केंद्रित नहीं है। यह उदाहरण बताता है कि भारत की सांस्कृतिक एकता का अर्थ सभी परंपराओं का एक जैसा होना नहीं, बल्कि उनकी विविधता का सम्मान करना है।
दशहरे के ये विविध रूप भारतीय समाज की बहुलता को सामने लाते हैं। कोई राम की विजय का उत्सव मनाता है, कोई दुर्गा की शक्ति का, कोई ज्ञान और शिक्षा की शुरुआत का, तो कोई अपने स्थानीय देवी-देवताओं और सामुदायिक विरासत का। इन सभी परंपराओं को एक ही ढांचे में बांधना भारतीय संस्कृति की वास्तविक प्रकृति को सीमित करना होगा। हमारी सांस्कृतिक शक्ति इसी में है कि अलग-अलग भाषाओं, रीति-रिवाजों और विश्वासों के बावजूद लोग उत्सवों में एक-दूसरे के साथ खड़े होते हैं।
उत्सव बने मेल-मिलाप का अवसर
वर्तमान संदर्भ में सांस्कृतिक एकता की अहमियत और बढ़ जाती है। सामाजिक संवाद की जगह जब अविश्वास, कटुता और पहचान के आधार पर दूरियां बढ़ने लगें, तब त्योहारों को मेल-मिलाप का अवसर बनना चाहिए। धार्मिक उत्सव साझा जीवन के प्रति सम्मान की अभिव्यक्ति हों। उनमें किसी समुदाय के विरुद्ध श्रेष्ठता या नफरत के प्रदर्शन के लिए जगह नहीं होनी चाहिए।
उत्सव की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि पंडाल कितना बड़ा था या आयोजन कितना खर्चीला। यह भी देखा जाना चाहिए कि उसमें कितने लोग सहभागी बने और उससे समाज में कितनी आत्मीयता बढ़ी।
दशहरा और उससे जुड़ा नवरात्र उत्सव स्त्री-शक्ति की आराधना का भी अवसर है। मां दुर्गा को शक्ति का प्रतीक मानने वाला समाज यदि महिलाओं के प्रति हिंसा, भेदभाव और असमानता स्वीकार करता रहे, तो इस विरोधाभास को दूर करना होगा। देवी की पूजा का वास्तविक अर्थ महिलाओं की गरिमा, स्वतंत्रता, सुरक्षा और समान अधिकारों को स्वीकार करना भी है। इसी तरह राम के आदर्शों का स्मरण न्याय, मर्यादा और उत्तरदायित्व के प्रति प्रतिबद्धता की मांग करता है। प्रतीकों की पूजा तभी सार्थक है, जब उनके मूल्यों को व्यवहार में उतारा जाए।
सुरक्षा और पर्यावरण की जिम्मेदारी
उत्सवों के बदलते स्वरूप के साथ पर्यावरण और सार्वजनिक सुरक्षा के सवाल भी महत्त्वपूर्ण हुए हैं। अत्यधिक ध्वनि, एकल-उपयोग प्लास्टिक, पटाखों का धुआं और कचरे का अनुचित निपटान उत्सव के आनंद को प्रभावित कर सकते हैं। भव्यता की होड़ में स्वच्छता और नागरिक सुविधाओं की उपेक्षा नहीं होनी चाहिए।
भीड़भाड़ वाले आयोजनों में स्पष्ट निकास मार्ग, सुरक्षित विद्युत व्यवस्था, अग्निशमन के साधन, प्राथमिक चिकित्सा और यातायात प्रबंधन आवश्यक हैं। बच्चों, बुजुर्गों और दिव्यांगजनों की सुविधा तथा सुरक्षा का विशेष ध्यान रखा जाना चाहिए। पंडालों की समय पर जांच और आयोजकों एवं प्रशासन के बीच समन्वय आस्था के सम्मान का ही हिस्सा हैं।
इसलिए आयोजकों, प्रशासन और नागरिकों—तीनों की जिम्मेदारी है कि उत्सव सुरक्षित, स्वच्छ और पर्यावरण के अनुकूल हों। स्थानीय कलाकारों, कारीगरों और छोटे कारोबारियों को अवसर देना भी जरूरी है, ताकि त्योहार केवल बड़े आयोजनों और बाजार की चमक तक सीमित न रहें। प्राकृतिक मिट्टी और सुरक्षित रंगों से बनी प्रतिमाओं, पुनः उपयोग योग्य सजावट, कचरे के उचित निपटान तथा संयमित ध्वनि के जरिए परंपरा और पर्यावरण के बीच बेहतर संतुलन बनाया जा सकता है।
आचरण में उतरे विजय का संदेश
दशहरा अंततः आत्ममंथन का अवसर है। रावण का पुतला हर साल जलता है, लेकिन समाज को यह भी पूछना चाहिए कि क्या अहंकार, अन्याय और असहिष्णुता कम हो रहे हैं? क्या हम अपने से भिन्न विचार और विश्वास रखने वालों के प्रति सम्मान बनाए रख पा रहे हैं? क्या हम महिलाओं, वंचित समुदायों और कमजोर लोगों के अधिकारों की रक्षा कर रहे हैं? इन सवालों के उत्तर ही पर्व की सार्थकता तय करेंगे।
भारत की उत्सवधर्मिता उसकी सांस्कृतिक संपदा है। दशहरा हमें सिखाता है कि विविधता साझा जीवन की शक्ति हो सकती है। विजयादशमी का संदेश तभी पूरा होगा, जब अच्छाई की विजय कथा और प्रतीक के साथ हमारे आचरण, सामाजिक संबंधों और सार्वजनिक जीवन में भी दिखाई दे। यही दशहरे की परंपरा का आधुनिक अर्थ है—मनुष्य के भीतर विवेक, समाज में सद्भाव और जीवन में न्याय की स्थापना।









