शांतिपूर्ण विरोध लोकतंत्र की ताकत है; हिंसा और असंवैधानिक दबाव उसका विकल्प नहीं
सौरभ वार्ष्णेय

भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के साथ विविधताओं, सहिष्णुता और लोकतांत्रिक मूल्यों वाला देश भी है। यहां सरकार बनाने और बदलने में जनता की निर्णायक भूमिका है। यही भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत है। ऐसे में जब सत्ता परिवर्तन के लिए बांग्लादेश जैसे घटनाक्रम का उदाहरण दिया जाता है या ‘रिजीम चेंज’ अर्थात शासन परिवर्तन की बात होती है, तो उसके आशय और तरीके पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक हो जाता है। भारत में सत्ता परिवर्तन का रास्ता जनमत और संवैधानिक प्रक्रियाओं से होकर गुजरना चाहिए। शांतिपूर्ण आंदोलन इस प्रक्रिया को दिशा दे सकते हैं, लेकिन हिंसा और अराजकता उसका विकल्प नहीं हो सकते।
‘रिजीम चेंज’ जैसे शब्दों को लेकर होने वाली बहस का मूल्यांकन राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर किया जाना चाहिए। किसी व्यक्ति के बयान का वास्तविक अर्थ उसके पूरे संदर्भ में समझना जरूरी है। केवल किसी शब्द के आधार पर किसी व्यक्ति या पूरे विपक्ष की मंशा पर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। चुनाव के माध्यम से सरकार बदलने का आह्वान लोकतांत्रिक राजनीति का सामान्य हिस्सा है। चिंता तब पैदा होती है, जब परिवर्तन के लिए संवैधानिक प्रक्रियाओं को दरकिनार करने या हिंसा का सहारा लेने की बात की जाए।
दूसरे देश की परिस्थितियां अलग
भारत और बांग्लादेश की राजनीतिक, सामाजिक तथा संवैधानिक परिस्थितियों में अंतर है। किसी दूसरे देश में हुए राजनीतिक घटनाक्रम को भारत के लिए आदर्श मान लेना उचित नहीं होगा। भारत में चुनाव और संसदीय प्रक्रियाएं सरकार के गठन तथा परिवर्तन का आधार हैं। न्यायपालिका, निर्वाचन आयोग और अन्य संवैधानिक संस्थाएं अपने-अपने दायरे में लोकतांत्रिक व्यवस्था की रक्षा करती हैं। इन संस्थाओं की स्वतंत्रता, निष्पक्षता और जवाबदेही पर जनता का विश्वास बना रहना आवश्यक है।
भारत की पहचान संवाद और सहअस्तित्व की परंपरा से रही है। यहां सत्ता किसी व्यक्ति, दल या संगठन की स्थायी संपत्ति नहीं है। सरकारें आती-जाती हैं, लेकिन देश और उसकी संवैधानिक व्यवस्था सर्वोपरि रहती है। इसलिए किसी राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए सामाजिक तनाव, हिंसा या संस्थागत अस्थिरता को बढ़ावा देना देशहित में नहीं हो सकता।
जनआंदोलन और भीड़तंत्र में अंतर
लोकतंत्र और भीड़तंत्र के बीच स्पष्ट अंतर है। लोकतंत्र में जनता की आवाज सुनी जाती है, असहमति का सम्मान होता है और निर्णय संवैधानिक प्रक्रियाओं के अनुसार लिए जाते हैं। इसके विपरीत, भीड़तंत्र में भय, हिंसा अथवा जबरन दबाव के बल पर निर्णय थोपने की प्रवृत्ति होती है।
हालांकि, किसी प्रदर्शन में बड़ी संख्या में लोगों का जुटना अपने आप में भीड़तंत्र नहीं है। शांतिपूर्ण धरने, प्रदर्शन, जनसभाएं और जनजागरण लोकतंत्र के महत्वपूर्ण अंग हैं। जनता किसी नीति, निर्णय या शासन के तरीके से असंतुष्ट होती है, तो उसका संगठित होकर आवाज उठाना स्वाभाविक है। सरकार पर नीति बदलने या जवाब देने के लिए शांतिपूर्ण सार्वजनिक दबाव बनाना भी लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा है। उसे हिंसक दबाव के समान नहीं माना जा सकता।
अंतर आंदोलन के आकार से नहीं, उसके आचरण और तरीकों से तय होता है। हिंसा, धमकी और जबरन निर्णय थोपने की कोशिश लोकतांत्रिक मूल्यों को नुकसान पहुंचाती है। वहीं शांतिपूर्ण प्रतिरोध सरकार को जनता की चिंताओं से अवगत कराता है और जवाबदेही मजबूत करता है। व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी निभाते हुए शासन को भी इस अंतर का सम्मान करना चाहिए।
जनमत की निर्णायक भूमिका
भारतीय लोकतंत्र में जनता अपने मत के माध्यम से सरकार के भविष्य का निर्णय करती है। सरकार से असंतुष्ट मतदाताओं के पास चुनाव में विकल्प चुनने का अधिकार है। सरकार की लोकप्रियता का अंतिम चुनावी आकलन नारों, सामाजिक माध्यमों के अभियानों या किसी सभा में जुटी भीड़ से नहीं किया जा सकता। इसके लिए स्वतंत्र, निष्पक्ष और विश्वसनीय चुनावी प्रक्रिया आवश्यक है।
लोकतांत्रिक जवाबदेही केवल मतदान के दिन तक सीमित नहीं रहती। चुनावों के बीच भी जनता को सवाल पूछने, आलोचना करने और शांतिपूर्ण आंदोलन चलाने का अधिकार है। इसी प्रकार, संसदीय व्यवस्था में सरकार का बने रहना सदन के विश्वास से भी जुड़ा होता है। इसलिए सत्ता परिवर्तन की चर्चा में चुनाव के साथ अन्य संवैधानिक संसदीय प्रक्रियाओं का भी सम्मान आवश्यक है।
यदि किसी सरकार की नीतियां जनता की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतरतीं या शासन में गंभीर कमियां दिखाई देती हैं, तो विपक्ष का दायित्व है कि वह इन मुद्दों को जनता के सामने रखे। उसे वैकल्पिक नीतियां प्रस्तुत करनी चाहिए, सरकार से जवाब मांगना चाहिए और लोकतांत्रिक तरीके से जनसमर्थन हासिल करना चाहिए। जनता विपक्ष के विचारों से सहमत होकर उसे सत्ता सौंपती है, तो यह लोकतंत्र की स्वाभाविक प्रक्रिया है।
इसी प्रकार, जनता वर्तमान सरकार को दोबारा चुनती है, तो उस जनादेश का सम्मान करना भी राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है। केवल अपनी पसंद के परिणाम स्वीकार करना लोकतांत्रिक आचरण नहीं है। साथ ही, चुनावी प्रक्रिया से संबंधित ठोस शिकायतों को प्रमाण और निर्धारित संस्थागत प्रक्रियाओं के माध्यम से उठाना भी लोकतंत्र का हिस्सा है। जनादेश का सम्मान और चुनावी पारदर्शिता की मांग एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं।
सत्ता और विपक्ष, दोनों की जिम्मेदारी
बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, किसानों की समस्याएं, शिक्षा, स्वास्थ्य और नागरिक अधिकारों जैसे मुद्दों पर शांतिपूर्ण जनआंदोलन सरकारों को जवाबदेह बना सकते हैं। उनका उद्देश्य जनता की आवाज शासन तक पहुंचाना और व्यवस्था में सुधार लाना होना चाहिए। ऐसे आंदोलन लोकतंत्र को कमजोर नहीं, बल्कि मजबूत करते हैं।
विपक्ष का काम केवल सरकार का विरोध करना नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार विकल्प प्रस्तुत करना भी है। इसी तरह, सत्तापक्ष को आलोचना से घबराने के बजाय जनता की समस्याओं का समाधान करना चाहिए। चुनाव जीतना सरकार को आलोचना से मुक्त नहीं करता और चुनाव हारना विपक्ष की लोकतांत्रिक भूमिका समाप्त नहीं करता।
असहमति को देशविरोधी मानना गलत है। उसी तरह असहमति के नाम पर हिंसा या संवैधानिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने का समर्थन भी स्वीकार नहीं किया जा सकता। लोकतांत्रिक मर्यादा की कसौटी सत्ता और विपक्ष, दोनों पर समान रूप से लागू होनी चाहिए।
परिवर्तन का आधार संविधान
भारत की लोकतांत्रिक शक्ति उसकी जनता, संविधान और संस्थाओं में निहित है। सत्ता परिवर्तन में जनता की निर्णायक भूमिका की रक्षा करना प्रत्येक राजनीतिक दल का कर्तव्य है। ‘रिजीम चेंज’ जैसी बहसों में शब्दों से अधिक महत्वपूर्ण उनका आशय और अपनाया जाने वाला रास्ता है। यदि उद्देश्य जनहित में शासन सुधारना और संवैधानिक प्रक्रियाओं से सरकार बदलना है, तो वह लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा है। यदि रास्ता हिंसा, धमकी और संस्थाओं को जबरन निष्प्रभावी करने का है, तो उसका विरोध होना चाहिए।
भारत में सरकारों का भविष्य जनमत और संवैधानिक प्रक्रियाएं तय करें। शांतिपूर्ण आंदोलन जनता की आवाज बनें और शासन उस आवाज को सुने। लोकतंत्र की असली जीत केवल किसी सरकार की हार या किसी दल की विजय में नहीं, बल्कि जनता की स्वतंत्र इच्छा, संविधान की सर्वोच्चता और नागरिक अधिकारों की रक्षा में है। यही लोकतांत्रिक परंपरा देश को सही दिशा में आगे ले जा सकती है।









