शादी-विवाह में बढ़ती फिजूलखर्ची: दिखावे की होड़ और समाज पर प्रभाव

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– सुरेश गोयल धूप वाला
पूर्व जिला महामंत्री भाजपा जिला हिसार

शादी मानव जीवन का एक अत्यंत पवित्र संस्कार है, जिसका मुख्य उद्देश्य दो व्यक्तियों का ही नहीं, बल्कि दो परिवारों का मिलन, समाज का आशीर्वाद और एक नए जीवन का मंगलमय शुभारंभ होता है। किंतु विडंबना यह है कि आज यह संस्कार अपनी मूल भावना से भटककर धीरे-धीरे प्रतिष्ठा की प्रतियोगिता, इवेंट मैनेजमेंट और दिखावे का अखाड़ा बनता जा रहा है। विशाल वेन्यू, महंगे डिज़ाइनर वस्त्र, करोड़ों के आभूषण, डेस्टिनेशन वेडिंग, प्री-वेडिंग शूट, भव्य डेकोरेशन और विलासितापूर्ण भोजन—इन सबकी अंधी होड़ ने विवाह को सादगी और सुख से कोसों दूर कर दिया है। आज समाज में यह भ्रामक धारणा गहराई से बैठ गई है कि शादी जितनी भव्य होगी, समाज में परिवार की प्रतिष्ठा भी उतनी ही अधिक होगी।

​दिखावे की होड़ और सोशल मीडिया

शादी में अत्यधिक खर्च का सबसे बड़ा कारण सामाजिक दबाव और झूठी शान का प्रदर्शन है। लोग अक्सर यह सोचकर अपनी चादर से ज्यादा पैर पसारते हैं कि “समाज क्या कहेगा” और “रिश्तेदार क्या सोचेंगे”। सोशल मीडिया ने इस प्रवृत्ति में आग में घी डालने का काम किया है। वहां भव्य शादियों, सिनेमैटिक वीडियो और सेलिब्रिटी वेडिंग्स की तस्वीरें लगातार देखकर मध्यम वर्ग भी उसी स्तर की शादी करने को विवश हो जाता है। परिणाम यह होता है कि परिवार अपनी वास्तविक आय और भविष्य की जरूरतों को भूलकर दूसरों से एक अंधी प्रतिस्पर्धा करने लगते हैं।

​मध्यम वर्ग पर भारी आर्थिक और मानसिक बोझ

समर्थ और धनी परिवारों के लिए करोड़ों रुपये खर्च करना शायद कोई बड़ी बात न हो, क्योंकि उनके व्यवसाय और संपत्ति इस खर्च को आसानी से वहन कर सकते हैं। किंतु असली त्रासदी तब शुरू होती है, जब मध्यम और निम्न मध्यम वर्ग भी उन्हीं पैमानों पर खरा उतरने का प्रयास करता है। अपनी सीमा से अधिक खर्च करने के लिए उन्हें जीवन भर की गाढ़ी कमाई और बचत गंवानी पड़ती है। बात यहीं खत्म नहीं होती; बैंक लोन लेना, जमीन बेचना और कई बार उच्च ब्याज दर पर उधार लेना भी आम हो गया है। शादी के बाद वर्षों तक ईएमआई और कर्ज चुकाने का भारी मानसिक तनाव परिवार को अंदर से खोखला कर देता है। इसका सीधा असर घर के अन्य बच्चों की उच्च शिक्षा, स्वास्थ्य और बुढ़ापे की सुरक्षा जैसी बुनियादी योजनाओं पर पड़ता है।

​भोजन की बर्बादी और पर्यावरणीय नुकसान

शादी में खर्च का एक बहुत बड़ा हिस्सा भोजन और कैटरिंग पर होता है। आज दो-तीन हजार रुपये प्रति प्लेट के भोजन और पचास से अधिक व्यंजनों के लाइव स्टॉल शादी की शान माने जाते हैं। विडंबना देखिए कि इनमें से आधी से ज्यादा चीजें लोग चख भी नहीं पाते। भारी मात्रा में खाना प्लेटों में और फिर कचरे में जाता है। एक ओर जहां शादियों में टनों खाद्य सामग्री नाले में बहा दी जाती है, वहीं हमारे ही देश का एक बड़ा वर्ग दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करता है। इसके अतिरिक्त, इन भव्य आयोजनों में होने वाला पर्यावरणीय नुकसान भी चिंताजनक है। सिंगल-यूज़ प्लास्टिक का अंबार, डीजे और पटाखों से होने वाला ध्वनि व वायु प्रदूषण, और सजावट में खर्च होने वाली अंधाधुंध बिजली—यह सब पर्यावरण के प्रति हमारी असंवेदनशीलता को दर्शाता है।

​दहेज का बदला हुआ स्वरूप

बेटी के पक्ष पर आज भी यह दबाव अधिक होता है। लोग मानते हैं कि बेटी की विदाई भव्य होनी चाहिए। आजकल यह भी देखा जा रहा है कि शादी में ‘उपहार’ के नाम पर महंगे वाहन, फ्लैट और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स देने की होड़ मची है। यह दरअसल दहेज प्रथा का ही एक नया और आधुनिक रूप है। यह सोच सामाजिक असमानता को और गहरी करती है।

​सादगी और बदलाव की आवश्यकता

शादी का असली सौंदर्य उसके करोड़ों के खर्च में नहीं, बल्कि उसकी आत्मीय भावना, सादगी और परिवार के आपसी स्नेह में है। आवश्यकता इस बात की है कि हम विवाह को इवेंट की बजाय पुनः संस्कार बनाएं। इसके लिए परिवारों को अपनी आर्थिक क्षमता के अनुसार ही बजट तय करना चाहिए। दिन की शादियां (Day Weddings), डिजिटल निमंत्रण पत्र, पर्यावरण-अनुकूल सजावट, और सीमित मेहमानों की उपस्थिति जैसे व्यावहारिक कदम अपनाए जा सकते हैं। बचा हुआ साफ भोजन जरूरतमंदों तक पहुंचाने के लिए संस्थाओं की मदद ली जा सकती है।

शादी में बढ़ती फिजूलखर्ची अब केवल एक व्यक्तिगत विषय नहीं रहा, बल्कि यह एक गंभीर सामाजिक और आर्थिक समस्या बन चुकी है। यह होड़ समाज को कर्ज के दलदल में धकेल रही है और संसाधनों की निर्मम बर्बादी कर रही है। हमें यह समझना होगा कि एक सफल और खुशहाल वैवाहिक जीवन की नींव महंगे टेंट और शाही दावतों पर नहीं, बल्कि पति-पत्नी के आपसी प्रेम, सम्मान और समझदारी पर टिकी होती है। सादगी ही सच्ची शोभा है और विवेकपूर्ण खर्च ही परिवार के सुखद भविष्य की असली गारंटी है।

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Author: Bharat Sarathi

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