सुरक्षित रिपोर्टिंग के लिए सावधानी जरूरी, लेकिन स्वतंत्र पत्रकारिता की रक्षा प्रशासन की भी जिम्मेदारी
कुमार कृष्णन

लोकतंत्र में पत्रकार केवल घटनाओं का विवरण देने वाला व्यक्ति नहीं होता; वह नागरिकों के जानने के अधिकार का प्रहरी भी होता है। सड़क पर प्रदर्शन हो, सत्ता के खिलाफ आवाज उठ रही हो या पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच टकराव की स्थिति हो—पत्रकार का दायित्व घटनास्थल पर मौजूद रहकर तथ्यों को समाज के सामने रखना है। लेकिन जब समाचार संकलन के दौरान उसकी सुरक्षा संकट में पड़ जाए, दुर्व्यवहार हो, उपकरण छीने जाने की शिकायतें आएं या उसके काम में बाधा डाली जाए, तब सवाल केवल पत्रकारिता का नहीं रहता। वह लोकतांत्रिक व्यवस्था की जवाबदेही का प्रश्न बन जाता है।
इसी संदर्भ में भारतीय प्रेस परिषद के नए दिशा-निर्देश महत्त्वपूर्ण हैं। परिषद ने विरोध-प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग से संबंधित ये दिशा-निर्देश १४ अक्टूबर २०२६ की बैठक में अपनाए और १५ अक्टूबर को सार्वजनिक किए। इनमें पत्रकारों की पहचान, पेशेवर आचरण, सुरक्षित दूरी, आपातकालीन तैयारी, संवाद और तथ्यपरक रिपोर्टिंग पर जोर दिया गया है। पत्रकारों को पहचान-पत्र स्पष्ट रूप से प्रदर्शित करने, निष्पक्ष रहने और पुलिस के विधिसम्मत निर्देशों का पालन करने की सलाह दी गई है।
ये उपाय आवश्यक हैं, लेकिन इनके साथ एक बुनियादी सवाल जुड़ा है—जब पत्रकार अपना दायित्व निभाते हुए हिंसा या दुर्व्यवहार का सामना करता है, तब उसकी सुरक्षा और न्याय सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी किसकी है? पत्रकार को सावधान रहने की सलाह देना एक बात है; ऐसा वातावरण बनाना दूसरी बात, जिसमें वह भय और दबाव के बिना काम कर सके। दिशा-निर्देश तभी प्रभावी होंगे, जब प्रशासन और मीडिया संस्थान भी अपनी जिम्मेदारियां निभाएं।
प्रदर्शन स्थलों पर पत्रकार कई परस्पर विरोधी अपेक्षाओं के बीच काम करता है। प्रदर्शनकारी अपनी मांगों और असंतोष को सार्वजनिक करना चाहते हैं। पुलिस पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने की जिम्मेदारी होती है। पत्रकार इन दोनों पक्षों के दावों और व्यवहार को दर्ज करते हुए उनकी स्वतंत्र पुष्टि करने का प्रयास करता है। किसी पक्ष को यह असुविधाजनक लग सकता है कि उसकी कार्रवाई कैमरे में दर्ज हो या उसके बयान पर सवाल उठें। लेकिन पत्रकारिता का काम किसी को प्रसन्न करना नहीं, सार्वजनिक महत्त्व की घटनाओं का तथ्यपरक विवरण देना है। इसलिए पत्रकारों की सुरक्षा प्रशासन की सुविधा या सदाशयता पर निर्भर नहीं छोड़ी जा सकती।
दिल्ली में हालिया प्रदर्शनों की रिपोर्टिंग के दौरान पत्रकारों को हिरासत में लिए जाने की खबरें सामने आई हैं। पत्रकारों और मीडिया संगठनों ने मारपीट, दुर्व्यवहार तथा उपकरण छीनने के आरोप भी लगाए हैं। वहीं, दिल्ली पुलिस ने कहा कि कुछ प्रदर्शनकारी पत्रकार होने का दावा करते हुए पुलिस के काम में हस्तक्षेप कर रहे थे। इन आरोपों और पुलिस के पक्ष की निष्पक्ष जांच जरूरी है। किसी पत्रकार के साथ हुए कथित दुर्व्यवहार को जांच से पहले सिद्ध तथ्य मानना उचित नहीं, लेकिन शिकायतों को पहचान संबंधी सामान्य संदेह के आधार पर खारिज करना भी स्वीकार्य नहीं होना चाहिए।
यदि किसी व्यक्ति की पहचान को लेकर संदेह है, तो उसकी पुष्टि की जा सकती है। यह प्रक्रिया स्पष्ट, सम्मानजनक और गैर-मनमानी होनी चाहिए। पहचान की जांच किसी पत्रकार को अपमानित करने, उसके काम में अनुचित बाधा डालने या उसे निशाना बनाने का बहाना नहीं बननी चाहिए।
किसी बड़े मीडिया संस्थान का प्रेस कार्ड न होना भी अपने आप में यह साबित नहीं करता कि संबंधित व्यक्ति पत्रकार नहीं है। स्वतंत्र पत्रकारिता के अनेक रूप हैं और डिजिटल माध्यमों ने इसका दायरा बढ़ाया है। प्रेस कार्ड पहचान में सहायक है, लेकिन स्वतंत्र पत्रकारों के काम की पुष्टि के लिए भी व्यावहारिक व्यवस्था होनी चाहिए। पत्रकारिता की विश्वसनीयता का मूल्यांकन उसके काम, तथ्यों की शुद्धता और पेशेवर आचरण से भी किया जाना चाहिए।
सुरक्षित रिपोर्टिंग के लिए पत्रकार की अपनी तैयारी महत्त्वपूर्ण है। भीड़ की दिशा, तनाव के संकेत, आसपास के रास्तों और सुरक्षित स्थानों की जानकारी जोखिम कम कर सकती है। किसी टकराव का दृश्य हासिल करने के लिए स्वयं को अनावश्यक खतरे में डालना समझदारी नहीं। पत्रकार को प्रदर्शन में भाग लेने, किसी पक्ष को उकसाने या पुलिस की कार्रवाई में हस्तक्षेप करने से बचना चाहिए।
लेकिन सुरक्षित दूरी का अर्थ पत्रकार को घटनास्थल से इतनी दूर कर देना नहीं होना चाहिए कि वह केवल अधिकृत बयान पर निर्भर रह जाए। यदि घटनाओं के महत्त्वपूर्ण पहलू उसकी नजर से ओझल कर दिए जाएं, तो नागरिकों तक पहुंचने वाली सूचना भी अधूरी रह सकती है। सुरक्षा व्यवस्था का उद्देश्य रिपोर्टिंग संभव बनाना होना चाहिए, उसे निष्प्रभावी करना नहीं।
जिम्मेदार पत्रकारिता की दूसरी कसौटी तथ्यों की शुद्धता है। किसी आरोप को प्रमाणित तथ्य बनाकर प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए। वायरल वीडियो, सोशल मीडिया पोस्ट या प्रत्यक्षदर्शी का बयान सूचना का शुरुआती आधार हो सकता है, अंतिम प्रमाण नहीं। पत्रकार को स्वयं देखी गई कार्रवाई, दूसरे व्यक्ति के कथन और अपुष्ट दावे के बीच स्पष्ट अंतर रखना चाहिए।
पुलिस, प्रदर्शनकारी, आयोजक और सरकारी अधिकारी—सभी के दावों को समान संपादकीय कसौटी पर परखना जरूरी है। जहां संभव हो, एक से अधिक स्वतंत्र स्रोतों से पुष्टि की जाए। किसी अधिकारी या प्रदर्शनकारी की मंशा का अनुमान लगाने के बजाय उसके प्रत्यक्ष आचरण का विवरण दिया जाए। अपुष्ट खबर किसी की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने के साथ तनाव भी बढ़ा सकती है।
डिजिटल माध्यमों ने इस जिम्मेदारी को और जटिल बनाया है। लाइव प्रसारण, सबसे पहले खबर देने की होड़ और विशेष दृश्य हासिल करने का दबाव कभी-कभी सुरक्षा तथा सत्यापन को पीछे धकेल देता है। ऐसे समय में संपादकीय विवेक की आवश्यकता और बढ़ जाती है। कोई दृश्य समाचार की दृष्टि से आकर्षक हो सकता है, लेकिन उसका तत्काल प्रसारण किसी व्यक्ति को खतरे में भी डाल सकता है।
दिशा-निर्देशों में ऐसी वास्तविक समय की जानकारी के प्रसारण से सावधानी बरतने को कहा गया है, जिससे सुरक्षा या परिचालन संबंधी गोपनीयता प्रभावित हो सकती हो। नाबालिगों, घायलों और संकट में फंसे लोगों की पहचान उजागर करते समय भी संभावित नुकसान पर विचार करने की सलाह दी गई है। स्वतंत्र पत्रकारों को किसी विश्वसनीय संपादक या संपर्क व्यक्ति को अपने स्थान, रिपोर्टिंग की योजना और अपेक्षित वापसी की जानकारी देने को कहा गया है।
पत्रकार की सुरक्षा केवल उसकी व्यक्तिगत सतर्कता का विषय नहीं हो सकती। मीडिया संस्थान संवाददाता को संवेदनशील स्थान पर भेजकर अपनी जिम्मेदारी पूरी नहीं मान सकते। संभावित जोखिम का आकलन, नियमित संपर्क, जरूरी सुरक्षा सामग्री और आपातकालीन सहायता की व्यवस्था भी उनकी जिम्मेदारी होनी चाहिए। घायल होने, हिरासत में लिए जाने या उपकरण क्षतिग्रस्त होने की स्थिति में संवाददाता को अकेला छोड़ देना पेशेवर संवेदनहीनता है।
छोटे समाचार संस्थानों और स्वतंत्र पत्रकारों की चुनौती अधिक बड़ी है। उनके पास बड़े प्रतिष्ठानों जैसे संसाधन, कानूनी सहायता या सुरक्षा प्रशिक्षण उपलब्ध नहीं होते। इसलिए पत्रकार संगठनों और मीडिया संस्थानों को साझा सहायता व्यवस्था विकसित करने पर विचार करना चाहिए। सुरक्षा प्रशिक्षण और आपातकालीन संपर्क जैसी सुविधाएं केवल बड़े संस्थानों तक सीमित न रहें।
प्रेस परिषद की पहल का वास्तविक महत्त्व तभी बढ़ेगा, जब उसके साथ शिकायतों के निपटारे और जवाबदेही की प्रभावी व्यवस्था भी विकसित हो। पत्रकार संगठनों, संपादकों, स्वतंत्र पत्रकारों और पुलिस प्रतिनिधियों के बीच नियमित संवाद होना चाहिए। दुर्व्यवहार की शिकायत कहां दर्ज होगी, उसकी जांच कौन करेगा और कितने समय में निर्णय होगा—इन प्रश्नों का स्पष्ट उत्तर आवश्यक है।
जहां आरोप गंभीर हों, वहां निष्पक्ष जांच सुनिश्चित की जानी चाहिए। जांच में उपलब्ध वीडियो, प्रत्यक्षदर्शियों के बयान और अन्य संबंधित सामग्री का परीक्षण हो। आरोप प्रमाणित होने पर जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध कार्रवाई की जाए। केवल औपचारिक स्पष्टीकरण जारी कर देना शिकायत का समाधान नहीं है। इसी तरह किसी शिकायत के गलत पाए जाने पर उसका आधार भी स्पष्ट किया जाना चाहिए। पारदर्शिता से पत्रकारिता और पुलिस, दोनों की विश्वसनीयता मजबूत होगी।
यह भी सुनिश्चित करना होगा कि पत्रकारों की सुरक्षा के नाम पर उनकी स्वतंत्रता सीमित न हो। पुलिस और प्रशासन से समन्वय उपयोगी है, लेकिन समन्वय नियंत्रण का माध्यम नहीं बनना चाहिए। निर्धारित स्थान से रिपोर्टिंग की व्यवस्था कुछ परिस्थितियों में आवश्यक हो सकती है, मगर उसकी आड़ में घटनास्थल के महत्त्वपूर्ण हिस्सों तक पहुंच रोक देना स्वतंत्र रिपोर्टिंग को कमजोर करता है।
पत्रकारों को कानून का सम्मान करना चाहिए। साथ ही प्रशासन को यह समझना होगा कि असुविधाजनक सवाल, आलोचनात्मक रिपोर्ट या पुलिस की कार्रवाई का दृश्य अपने आप में व्यवस्था-विरोधी गतिविधि नहीं है। किसी कार्रवाई का सार्वजनिक परीक्षण लोकतांत्रिक जवाबदेही का हिस्सा है।
लोकतंत्र की परीक्षा इस बात से नहीं होती कि सत्ता आलोचना सहन करने की कितनी घोषणाएं करती है। उसकी वास्तविक परीक्षा असहमति के क्षणों में होती है—जब नागरिक सड़क पर होते हैं, प्रशासन दबाव में होता है और पत्रकार दोनों की गतिविधियों को दर्ज कर रहे होते हैं। उस समय पत्रकारों के साथ किया गया व्यवहार बताता है कि व्यवस्था स्वतंत्र सूचना के प्रति कितनी प्रतिबद्ध है।
यदि पत्रकार संभावित कार्रवाई, अपमान या हिंसा की आशंका में काम करेगा, तो उसका प्रभाव खबरों पर पड़ेगा। कुछ घटनाएं दर्ज नहीं होंगी, कुछ सवाल पूछे नहीं जाएंगे और कुछ आवाजें समाज तक नहीं पहुंचेंगी। इसका नुकसान किसी एक संवाददाता या समाचार संस्थान तक सीमित नहीं रहेगा; नागरिकों का जानने का अधिकार कमजोर होगा।
इसलिए पत्रकार सुरक्षा के दिशा-निर्देशों की असली परीक्षा प्रशासन और मीडिया संस्थानों के आचरण से होगी। पत्रकारों को सावधानी और निष्पक्षता की सीख देना आवश्यक है, लेकिन यह सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है कि उन्हें सवाल पूछने और सार्वजनिक कार्रवाई दर्ज करने की सजा न मिले। जहां अधिकारों के दुरुपयोग के आरोप हों, वहां निष्पक्ष जांच और समयबद्ध निर्णय होना चाहिए।
वर्दी कानून लागू करने का अधिकार देती है, कानून से ऊपर होने का नहीं। प्रशासन की विश्वसनीयता प्रेस विज्ञप्तियों से नहीं, उसके व्यवहार और जवाबदेही से तय होती है। कैमरे की नजर से बचना समाधान नहीं; ऐसी कार्रवाई करना समाधान है, जो सार्वजनिक जांच की कसौटी पर खरी उतरे।
पत्रकारों से जिम्मेदार पत्रकारिता की अपेक्षा उचित है। उसी तरह प्रशासन से जिम्मेदार आचरण की अपेक्षा भी अनिवार्य है। स्वतंत्र प्रेस और जवाबदेह प्रशासन लोकतंत्र की परस्पर पूरक जरूरतें हैं। पत्रकारों की सुरक्षा पर जारी निर्देश तभी सार्थक होंगे, जब सच दर्ज करने की स्वतंत्रता और सत्ता से जवाब मांगने का अधिकार व्यवहार में सुरक्षित दिखाई देंगे।









