देवी के सामने झुकता समाज जीवित स्त्री के सम्मान पर मौन क्यों?
डॉ. घनश्याम बादल

नवरात्र चल रहे हैं। मंदिरों में घंटाध्वनि गूंज रही है, घरों में दुर्गा सप्तशती के पाठ हो रहे हैं, कन्याओं के पांव पखारे जा रहे हैं और मंचों से नारी शक्ति के जयकारे लग रहे हैं। देवी के नौ रूपों की महिमा का बखान अपनी जगह है, लेकिन स्त्री की अस्मिता, सुरक्षा और सम्मान के सवाल पर समाज का धीमा स्वर बड़े प्रश्न खड़े करता है।
एक तरफ देवी के सामने सिर झुकाने की होड़ है, दूसरी तरफ जीवित स्त्री को झुकाने, दबाने और चुप कराने का सिलसिला जारी है। सवाल है कि हम शक्ति की आराधना कर रहे हैं या अपने पाखंड को धार्मिक आवरण पहना रहे हैं?
पद और प्रतिष्ठा के बाद भी असुरक्षा
उत्तराखंड की मंत्री रेखा आर्य की ओर से अपने पति के खिलाफ दर्ज कराई गई शिकायत इस विरोधाभास को और तीखा बनाती है। उन्होंने मारपीट, उत्पीड़न और जान को खतरे जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं। उनके पति ने आरोपों का खंडन किया है। आरोपों की सच्चाई का निर्धारण जांच और न्यायिक प्रक्रिया से ही होगा। फिर भी यह प्रकरण उस धारणा पर सवाल उठाता है, जिसमें पद, प्रतिष्ठा और विवाह को स्त्री की सुरक्षा की गारंटी मान लिया जाता है।
यदि सत्ता में बैठी एक महिला को भी अपने वैवाहिक संबंध में उत्पीड़न की शिकायत लेकर सामने आना पड़ता है, तो आम स्त्री की मुश्किलों। परिवार बचाने की जिम्मेदारी स्त्री पर डाल दी जाती है, लेकिन उसकी गरिमा बचाने की जिम्मेदारी कौन उठाएगा?
पद, प्रतिष्ठा और राजनीतिक रसूख किसी महिला को हर परिस्थिति में सुरक्षित नहीं बना सकते, तो उस स्त्री की स्थिति क्या होगी जिसके पास न प्रभाव है, न पैसा और न अपनी बात सुने जाने का भरोसा? उसके लिए न्याय की राह कितनी लंबी और अकेली होगी?
कन्या पूजन से आगे की जिम्मेदारी
विडंबना देखिए कि जिस समय नवरात्र में कन्या पूजन के लिए छोटी बच्चियों को खोजा जाता है, उसी समाज में बच्चियों के यौन शोषण की खबरें हमें बार-बार शर्मसार करती हैं। जिस कन्या को देवी का रूप कहकर भोजन कराया जाता है, उसके लिए घर, स्कूल, सड़क और सार्वजनिक स्थान कितने सुरक्षित हैं? पूजा के दिन उसके पांव धोने वाले हाथ क्या शेष दिनों में उसकी स्वतंत्रता और इच्छा का सम्मान करते हैं?
यदि बच्ची को अपनी ही दुनिया में भय के साथ जीना पड़े, तो कन्या पूजन के उद्देश्य और हमारे आचरण के बीच की दूरी पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। बच्ची को सम्मान देना एक दिन का धार्मिक आयोजन भर नहीं हो सकता। यह उसके बचपन, शिक्षा, सुरक्षा और सपनों के प्रति निरंतर जिम्मेदारी है।
स्त्री के प्रति अपराधों की चर्चा करते समय आंकड़ों की शुद्धता भी जरूरी है। किसी अपराध के बढ़ने या घटने का दावा प्रमाणित आंकड़ों के आधार पर होना चाहिए। लेकिन आंकड़ों की बहस से यह वास्तविकता ओझल नहीं होनी चाहिए कि यौन हिंसा, घरेलू उत्पीड़न, पीछा करना, सार्वजनिक अपमान और महिलाओं की आवाज दबाना गंभीर सामाजिक चुनौतियां हैं।
दर्ज मामलों की संख्या पूरी तस्वीर नहीं बताती। बदनामी का भय, परिवार का दबाव, आर्थिक निर्भरता और न्याय पाने की कठिन राह किसी महिला को शिकायत करने से भी रोक सकती है। इसलिए मौन को संतोष या सहमति मान लेना एक और अन्याय है।
सड़क से सत्ता तक गरिमा का सवाल
यह समस्या केवल घरों तक सीमित नहीं है। जन आंदोलनों में महिला पत्रकारों और आंदोलनकारी महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार, धक्का-मुक्की या दमन के आरोप सामने आने पर उनकी निष्पक्ष जांच आवश्यक है। ऐसे प्रश्न लोकतांत्रिक संस्थाओं की जवाबदेही से भी जुड़े हैं।
किसी आंदोलन से असहमति हो सकती है, उसकी मांगों पर सवाल उठाए जा सकते हैं, लेकिन क्या इससे महिला पत्रकार के काम करने के अधिकार या प्रदर्शनकारी महिला की गरिमा को कुचलने का अधिकार मिल जाता है? कानून-व्यवस्था बनाए रखना प्रशासन की जिम्मेदारी है, अपमानित करना नहीं। वर्दी की शक्ति नागरिकों के अधिकारों की रक्षा में दिखाई देनी चाहिए।
महिला की स्वतंत्रता का सवाल सत्ता और विपक्ष, दोनों की परीक्षा लेता है। विपक्ष में रहते हुए महिलाओं के सम्मान की दुहाई देना आसान है; सत्ता में आने पर उसी कसौटी पर खरा उतरना कठिन। किसी एक दल, विचारधारा या समुदाय को स्त्री के प्रति समूचे अन्याय का जिम्मेदार बताकर बाकी समाज को निर्दोष नहीं ठहराया जा सकता।
स्त्री के प्रति भेदभाव की जड़ें परिवार, परंपरा, राजनीति, बाजार और संस्थाओं तक फैली हैं। कहीं उसे परिवार की इज्जत के नाम पर बांधा जाता है, कहीं संस्कृति की रक्षा के नाम पर उसकी पसंद पर पहरा बैठाया जाता है और कहीं उसकी पीड़ा को राजनीतिक लाभ-हानि के तराजू पर तौला जाता है।
हिंसा पर समान कसौटी
संबंधों में हिंसा पर चर्चा करते हुए न्याय की कसौटी भी समान रखनी होगी। मेरठ के चर्चित ‘नीला ड्रम’ हत्याकांड में सौरभ राजपूत की हत्या के दोषी मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को निचली अदालत ने मृत्युदंड सुनाया है। इस मामले में पीड़ित एक पुरुष था। इसलिए इसे महिलाओं के विरुद्ध हिंसा का उदाहरण बनाना उचित नहीं होगा।
यह प्रकरण संबंधों के भीतर क्रूरता और विश्वासघात का भयावह उदाहरण अवश्य है। स्त्री के अधिकारों की पैरवी का अर्थ किसी महिला द्वारा किए गए अपराध का बचाव नहीं है। उसी तरह किसी महिला के अपराध को समूची स्त्री जाति के विरुद्ध आरोपपत्र नहीं बनाया जा सकता। अपराध की जिम्मेदारी अपराधी की है; न्याय प्रत्येक पीड़ित का अधिकार है।
किसी जघन्य अपराध के बाद कठोर दंड की मांग स्वाभाविक है, लेकिन सजा सुना दिया जाना अपने आप में समाज की सुरक्षा की गारंटी नहीं बनता। अपराध होने के बाद जवाबदेही तय करना आवश्यक है; अपराध रोकने वाली सामाजिक और संस्थागत व्यवस्था बनाना भी उतना ही जरूरी है।
आक्रोश के बाद क्या बदलता है?
हमारी समस्या यह भी है कि किसी जघन्य घटना पर कुछ दिनों तक आक्रोश उबलता है, टेलीविजन पर बहसें होती हैं, सोशल मीडिया पर नारे चलते हैं और फिर अगली सनसनी पुरानी पीड़ा को ढक देती है। पीड़ित का दुख चर्चा का विषय बन जाता है, लेकिन उन परिस्थितियों पर गंभीर विचार नहीं होता जो हिंसा को जन्म देती हैं।
अपराधी के लिए कठोर सजा की मांग करने वाला समाज अपने घर में बच्चों को दूसरे मनुष्य के प्रति सम्मान सिखाने की जिम्मेदारी से बच नहीं सकता। विशेष रूप से बेटों को यह समझाना जरूरी है कि स्त्री की असहमति अपमान नहीं है और किसी संबंध में होना दूसरे व्यक्ति पर मालिकाना अधिकार नहीं देता।
कानून का भय आवश्यक है, पर संस्कार का अर्थ केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं है। संस्कार दूसरे मनुष्य की स्वतंत्रता, सहमति और गरिमा को स्वीकार करने में भी दिखाई देते हैं।
देवी को शक्ति का अधिकार, स्त्री को क्यों नहीं?
नवरात्र का मूल संदेश शक्ति की उपासना है। दुर्गा का रूप अन्याय के सामने प्रतिरोध का प्रतीक है। महिषासुर-वध अत्याचार के विरुद्ध संघर्ष का रूपक है और स्त्री के भीतर शक्ति देखने की परंपरा उसे कमजोर मानने की मानसिकता को चुनौती देती है।
फिर भी विडंबना यह है कि देवी को सर्वशक्तिमान मानने वाला समाज अपनी बेटी को अक्सर निर्णय लेने में अक्षम समझता है। दुर्गा की तलवार की आराधना होती है, लेकिन स्त्री अपने आत्मसम्मान की आवाज उठाए तो उसे परिवार तोड़ने वाली, संस्कारहीन या विद्रोही कह दिया जाता है। देवी को शक्ति का अधिकार है, स्त्री को क्यों नहीं?
धर्म का मूल्य कर्म से तय होता है, कर्मकांड की भव्यता से नहीं। यदि नवरात्र के नौ दिनों में हम देवी के नौ रूपों की पूजा करें, लेकिन वर्ष के बाकी दिनों में स्त्री की इच्छा, सहमति, शिक्षा, संपत्ति, रोजगार और स्वतंत्र निर्णय के अधिकारों की उपेक्षा करें, तो हमारी भक्ति अधूरी ही नहीं, आत्मवंचना भी है।
कन्या पूजन का सबसे बड़ा अर्थ किसी बच्ची के पांव धोना भर नहीं है। उसका अर्थ यह सुनिश्चित करना है कि उसके सपनों पर पहरा न हो, उसके शरीर पर उसकी सहमति के बिना कोई अधिकार न जमाए और अन्याय होने पर उसे चुप रहने के लिए मजबूर न किया जाए।
देवी की आराधना की सार्थकता तभी है, जब जीवित स्त्री का सम्मान हमारे रोजमर्रा के व्यवहार में दिखाई दे।









