उमेश कुमार साहू

विजयादशमी यानी दशहरा केवल कागज़ और पटाखों से बने रावण के पुतले को जलाने का दिन नहीं है। यह पर्व हमें हर साल उस सनातन सच की याद दिलाता है, जिसे इंसान सदियों से जीता आया है—अन्याय और अहंकार की ताकत चाहे कितनी भी बड़ी क्यों न हो, उसकी उम्र बहुत छोटी होती है; जीत हमेशा सत्य और अच्छाई की ही होती है।
उपनिषद् का यह सीधा और सरल मंत्र इसी शाश्वत नियम को उद्घोषित करता है—
सत्यमेव जयते नानृतं…
(सत्य की ही जीत होती है, झूठ और असत्य की कभी नहीं।)
माँ कौशल्या का भोला सवाल : कोमल राम ने बलशाली रावण को कैसे मारा?
गोस्वामी तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में एक अत्यंत मार्मिक प्रसंग लिखा है। चौदह वर्षों के वनवास और लंका विजय के बाद जब भगवान राम अयोध्या लौटे, तो राजमहल में माँ कौशल्या अपने पुत्र की आरती उतार रही थीं।
आरती उतारते समय माँ अपने सुकुमार और कोमल राम के मुख को निहारती हैं और मन ही मन विस्मय से भर जाती हैं:
हृदयँ विचारति बारहिं बारा। कवन भाँति लंकापति मारा॥
अति सुकुमार जुगल मम बारे। निसिचर सुभट महाबल भारे॥
माँ सोचती हैं कि मेरे ये दोनों बालक (राम-लक्ष्मण) तो फूल जैसे कोमल और सुकुमार हैं, फिर इन्होंने उस महाबली रावण को कैसे हरा दिया, जिसके सामने बड़े-बड़े देवता और दिग्गज थर-थर कांपते थे?
यह केवल माँ कौशल्या का कौतूहल नहीं था, बल्कि यह हर युग के उस आम इंसान का सवाल है, जो यह सोचकर डर जाता है कि बुराई के पास साधन, पैसा और बाहुबल बहुत ज्यादा है, तो भला एक सीधा-सादा, सच्चा इंसान उससे कैसे जीतेगा?
इसका उत्तर युद्ध के मैदान में छिपा था।
रावण का सोने का रथ और प्रभु राम का ‘धर्म-रथ’
युद्धभूमि का वह दृश्य याद कीजिए। एक तरफ रावण था—सोने के विशाल रथ पर सवार, चमचमाते अस्त्र-शस्त्रों से लैस और अहंकार में डूबा हुआ। दूसरी तरफ भगवान राम थे—पैरों में न जूते, तन पर न कोई कवच, न कोई रथ, केवल जमीन पर नंगे पाँव खड़े!
यह देखकर विभीषण घबरा गए। उन्होंने व्याकुल होकर पूछा—”प्रभु! आपके पास न रथ है, न पैर में जूते, न शरीर पर ढाल; आप इस महाबलशाली वीर रावण से कैसे पार पाएंगे?”
तब श्रीराम ने मुस्कुराते हुए विभीषण को जो उत्तर दिया, वह दुनिया की सबसे बड़ी सीख है:
सुनहु सखा कह कृपानिधाना। जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना॥
सौरज धीरज तेहि रथ चाका। सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका॥
बल बिबेक दम परहित घोरे। छमा कृपा समता रजु जोरे॥
भगवान राम ने समझाया—”हे सखे! जिससे असली जीत हासिल होती है, वह रथ कोई दूसरा ही है। उस रथ के दो पहिए हैं—शौर्य (साहस) और धैर्य। उस रथ की पताका (झंडा) है—सत्य और सदाचार (अच्छा आचरण)। उस रथ के घोड़े हैं—विवेक, इंद्रिय-नियंत्रण और दूसरों की भलाई (परोपकार); और उन घोड़ों की लगाम बंधी है क्षमा, दया और समता से।”
सीधी बात यह है कि रावण के पास दुनिया के सारे बाहरी साधन थे, लेकिन भीतर कोई नैतिक बल नहीं था। राम के पास बाहरी दिखावा नहीं था, लेकिन उनके भीतर गुणों का अटूट आत्मबल था। शक्ति जब मर्यादा और धर्म को छोड़ देती है, तो वह अपना ही सर्वनाश कर बैठती है।
इतिहास गवाह है : अन्यायी कभी जीत नहीं सका
यह केवल त्रेता युग की बात नहीं है। इतिहास के किसी भी पन्ने को पलटकर देख लीजिए, जब-जब किसी ने ताकत और सत्ता के नशे में चूर होकर निर्बलों को सताया, समय ने उसे धूल चटा दी:
महाभारत का कौरव पक्ष : दुर्योधन के पास विशाल ग्यारह अक्षौहिणी सेना, भीष्म, द्रोण और कर्ण जैसे महारथी थे। पांडवों के पास केवल सत्य, न्याय और भगवान श्रीकृष्ण का मार्गदर्शन था। नतीजा क्या हुआ? अधर्म का वह विशाल पहाड़ ताश के पत्तों की तरह ढह गया। यतो धर्मस्ततो जयः (जहाँ धर्म और न्याय है, विजय वहीं होती है।)
यतो धर्मस्ततो जयः
(जहाँ धर्म और न्याय है, विजय वहीं होती है।)
अहंकारी तानाशाहों का हश्र : दुनिया के इतिहास में हिटलर, मुसोलिनी या अंग्रेजों का साम्राज्यवादी घमंड—इनके पास तोपें थीं, सेना थी और दुनिया भर की दौलत थी। लेकिन जब भारत में महात्मा गांधी जैसे निहत्थे फकीर ने सत्य और अहिंसा का दामन थामा, तो दुनिया की सबसे बड़ी सल्तनत को भी घुटने टेकने पड़े।
कष्टों में सहारा बनी रामकथा : आज से लगभग दो सौ साल पहले जब भारत के गरीब गिरमिटिया मजदूर मजबूरी में फिजी, मॉरीशस और सूरीनाम जैसे सुदूर देशों में ले जाए गए, तो अंग्रेजों के कोड़ों और अमानवीय अत्याचारों के बीच उनके पास केवल एक ही संबल था—तुलसी की रामायण। वे शाम को थक-हारकर बैठते, चौपाइयां गाते और यह विश्वास बनाए रखते कि जैसे रावण का अन्याय खत्म हुआ था, वैसे ही हमारा यह अंधकार भी एक दिन जरूर कटेगा।
हमारे भीतर का राम और बाहर का रावण
आज के समय में रावण कोई दस सिर वाला राक्षस बनकर नहीं घूमता। वह हमारे समाज में और हमारे भीतर छिपकर बैठा है:
- जब हम किसी का हक मारते हैं, तो वह रावण है।
- जब हम सफलता पाने के लिए बेईमानी और शार्टकट का रास्ता चुनते हैं, तो वह रावण है।
- जब हम अपने पद, पैसे या ज्ञान के घमंड में दूसरों को छोटा समझने लगते हैं, तो वह रावण है।
आधुनिक दौर में महाकवि निराला ने अपनी कविता ‘राम की शक्ति-पूजा’ में लिखा कि जब अन्याय बहुत ताकतवर दिखने लगे, तो निराश होकर बैठना नहीं चाहिए, बल्कि अपने भीतर की आत्मशक्ति और सच्चाई को जगाना चाहिए।
जीवन भर याद रखने योग्य सीख
इस विजयादशमी पर जब आप रावण का पुतला जलते हुए देखें, तो अपने मन में यह बात हमेशा के लिए बिठा लें:
- साधन से ज्यादा साधना बड़ी होती है : आपके पास कितनी सुख-सुविधाएं हैं, यह मायने नहीं रखता; आपके विचार कितने सच्चे और मजबूत हैं, जीत उससे तय होती है।
- धैर्य मत खोइए : बुराई शुरुआत में बहुत ताकतवर और डरावनी लग सकती है, लेकिन उसका अंत तय है।
- शॉर्टकट से बचिए : जो लोग गलत रास्तों से जल्दी आगे बढ़ना चाहते हैं, समय उनके रास्ते को काटकर खत्म कर देता है।
विजयादशमी का यही अमर पैगाम है—सच्चाई की राह पर डटे रहिए, क्योंकि दुनिया की कोई भी ताकत सत्य और धर्म के रथ को कभी रोक नहीं सकती।









