जज देवता नहीं—जनता के सेवक

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डॉ० मत्स्येन्द्र प्रभाकर

न्यायपालिका लोकतंत्र का तीसरा स्तम्भ है लेकिन क्या यह स्तम्भ जनता से ऊपर है? यशवन्त वर्मा जैसे न्यायाधीश के घर से 25 करोड़ रुपये की नगद बरामदगी ने सच्चाई उजागर कर दी। जज देवता नहीं, जनता के सेवक हैं। सेवक से जवाब माँगना जनता का अधिकार है।

संविधान का धोखा :

संविधान के अनुच्छेद 124(4) में न्यायाधीशों को हटाने की प्रक्रिया ‘महाभियोग’ बतायी गयी है लेकिन यह प्रक्रिया इतनी जटिल है कि 75 साल में केवल एक न्यायाधीश को हटाया गया। विधि आयोग की 230वीं रिपोर्ट (2009) में साफ लिखा है: “न्यायिक उत्तरदायित्व के लिए स्वतंत्र तंत्र जरूरी है।” लेकिन संसद ने कानून नहीं बनाया। क्यों? क्योंकि राजनीति और न्यायपालिका के बीच एक अघोषित ‘समझौता’ है। जनता बीच में फँसी है।

सुप्रीम कोर्ट के अपने फैसले :

2019 में पाँच जजों की संविधान पीठ ने ऐतिहासिक फैसला दिया: “सीजेआई का कार्यालय आरटीआई के दायरे में आएगा।” तब न्यायाधीश धनञ्जय विष्णु चन्द्रचूड़ ने कहा: “पारदर्शिता न्यायपालिका की ताकत है, कमजोरी नहीं।” लेकिन इस फैसले के बाद भी न्यायाधीशों की सम्पत्ति घोषणा ‘स्वैच्छिक’ बनी रही।

1 अप्रैल, 2025 को सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण पीठ ने नया संकल्प लिया: “सभी न्यायाधीश अपनी सम्पत्ति वेबसाइट पर सार्वजनिक करेंगे।” लेकिन सवाल है: यह संकल्प कानून बनेगा या कागज पर ही रहेगा?अभी तक कोई कानून नहीं बना।

ताजा प्रकरण – अक्टूबर 2026 की सच्चाई :

अक्टूबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार अपने न्यायाधीशों की सम्पत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक किया। यह एक ऐतिहासिक कदम है। लेकिन सवाल है: क्या यह पर्याप्त है?

सितम्बर 2026 में सीजेआई सूर्यकान्त ने स्पष्ट कहा: “जजों के खिलाफ हर शिकायत वेबसाइट पर डाल देना सही नहीं।” लेकिन उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि “न्यायिक संस्थानों में निरन्तर सुधार, पारदर्शिता और जवाबदेही की जरूरत है।”

सितम्बर 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की किताब से ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ अध्याय हटवाकर मामला बन्द किया। यह क्या सन्देश देता है? कि भ्रष्टाचार की बात छापना गलत है, भ्रष्टाचार होना गलत नहीं?

मार्च 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी की किताब में इस अध्याय को फिर से शामिल करने पर “गहरी नाराजगी” जतायी थी। क्या अदालत आलोचना सहन नहीं कर सकती?

भ्रष्टाचार के चौंकाने वाले आँकड़े :

पिछले 10 साल में जजों के खिलाफ 8,630 से अधिक शिकायतें आयीं।

2025 में दिल्ली हाईकोर्ट के एक न्यायाधीश के घर से 25 करोड़ रुपये से अधिक की नगदी बरामद हुई। एक अध्ययन के अनुसार

77 फीसद जनता मानती है कि कई जज भ्रष्ट हैं।

सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर 2019 में केवल 7 जजों ने ही सम्पत्ति का विवरण दिया था।

ये आँकड़े झूठ नहीं बोलते। न्यायपालिका में सड़न है। इसे स्वीकार करना होगा।

स्वतंत्रता नहीं, निरंकुशता!

न्यायिक स्वतंत्रता और न्यायिक निरंकुशता में फर्क समझना जरूरी है। स्वतंत्रता का मतलब है निष्पक्ष फैसला। निरंकुशता का मतलब है—कोई सवाल नहीं, कोई जाँच नहीं, कोई जवाब नहीं! सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकान्त ने साफ कहा: “न्यायपालिका के फैसले आलोचना और जाँच के दायरे से ऊपर नहीं।” यह बयान ऐतिहासिक है लेकिन बयान काफी नहीं। कार्रवाई चाहिए!

विधिक स्थिति : क्या कहता है कानून?

1997 का संकल्प : सुप्रीम कोर्ट ने प्रस्ताव पारित किया कि न्यायाधीश अपनी सम्पत्ति की घोषणा मुख्य न्यायाधीश को करेंगे। लेकिन यह घोषणा गोपनीय रहेगी, सार्वजनिक नहीं।

2009 का संकल्प : अक्टूबर 2009 में सुप्रीम कोर्ट ने संकल्प लिया कि न्यायाधीश स्वैच्छिक तौर पर अपनी सम्पत्ति वेबसाइट पर सार्वजनिक करेंगे। लेकिन यह स्वैच्छिक था, अनिवार्य नहीं।

2019 का आरटीआई फैसला : संविधान पीठ ने माना कि सीजेआई का कार्यालय आरटीआई के तहत सार्वजनिक प्राधिकरण है। सम्पत्ति की जानकारी सार्वजनिक-हित परीक्षण के अधीन खुलासी यानी सार्वजनिक की जा सकती है। लेकिन प्रकटीकरण को कर्तव्य नहीं बनाया गया।

2025 का नया संकल्प : 1 अप्रैल, 2025 को पूर्ण पीठ ने फैसला लिया कि सभी न्यायाधीश अपनी सम्पत्ति वेबसाइट पर सार्वजनिक करेंगे। लेकिन यह अभी भी संकल्प है, कानून नहीं।

2026 का नया कदम : अक्टूबर 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार न्यायाधीशों की सम्पत्ति सार्वजनिक की। लेकिन यह अभी भी स्वैच्छिक प्रथा है, कानूनी बाध्यता नहीं।

कानूनी स्थिति साफ है : न्यायाधीश कानूनी रूप से अपनी सम्पत्ति का सार्वजनिक प्रकटीकरण करने के लिए बाध्य नहीं हैं। यह स्वैच्छिक प्रथा है, कानूनी बाध्यता नहीं।

क्या चाहिए? ठोस सुधार!

1. अनिवार्य सम्पत्ति घोषणा : सभी न्यायाधीशों को हर साल सम्पत्ति का ब्यौरा सार्वजनिक करना अनिवार्य हो। जैसे सांसद और मंत्री करते हैं, वैसे ही जज भी करें। निजता का हवाला बन्द हो!

2. स्वतंत्र न्यायिक आयोग : एक संवैधानिक निकाय बने जो न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों की जाँच करे। इसमें सेवानिवृत्त जज, कानून विशेषज्ञ और जनप्रतिनिधि हों। लोकपाल की तर्ज पर!

3. कॉलेजियम में पारदर्शिता : न्यायाधीशों की नियुक्ति का मौजूदा तंत्र ‘बन्द कमरे’ में चलता है। मानदण्ड सार्वजनिक हों। इण्टरव्यू रिकॉर्ड हों। चयन के कारण लिखित में हों।

4. समयबद्ध जाँच : न्यायाधीशों के खिलाफ शिकायतों की जाँच 6 महीने में पूरी हो। देरी हो तो जिम्मेदार अधिकारी पर कार्रवाई हो।

5. (सूचनादाता) व्हिसलब्लोअर सुरक्षा : जो न्यायालय कर्मचारी या वकील भ्रष्टाचार की जानकारी दे, उसकी पहचान गोपनीय रहे और उसे कानूनी सुरक्षा मिले।

6. भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में संशोधन : 1988 के भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम में न्यायाधीशों को स्पष्ट रूप से शामिल किया जाए। अभी यह अधिनियम न्यायाधीशों पर पूरी तरह लागू नहीं होता।

राजनीति की दोहरी चाल :

सरकार कहती है : “न्यायपालिका में सुधार न्यायपालिका को ही करना है।” न्यायपालिका कहती है: “हम स्वतंत्र हैं, हस्तक्षेप नहीं चाहिए।” यह ‘आपस की बंटियाँ’ यानी एक सहमति या समझौते हैं। जनता बीच में फँसी है। 2025 में प्रयागराज में हुए अखिल भारतीय सम्मेलन में वकीलों ने साफ कहा: “न्यायाधीशों की जवाबदेही सुनिश्चित हो।” लेकिन संसद में बिल पेश नहीं हुआ।

2026 में लोकसभा में दी गयी जानकारी के मुताबिक पिछले 10 साल में 8,630 शिकायतें आयीं। लेकिन केवल कुछ मामलों में ही कार्रवाई हुई। क्यों? क्योंकि जाँच का तंत्र ही कमजोर है।

जनता का गुस्सा जायज है :

जब एक साधारण कर्मचारी पर छोटी सी गलती में निलम्बन की कार्रवाई होती है, तो न्यायाधीश पर करोड़ों की नकदी मिलने पर केवल ‘जाँच’ का आश्वासन? यह दोहरा मापदण्ड है। सुप्रीम कोर्ट ने 2019 में कहा था: “न्यायाधीशों की सम्पत्ति आरटीआई के तहत ‘सूचना’ है।” लेकिन 2026 तक इस पर कानून नहीं बना। क्यों?

एनसीईआरटी की किताब में ‘न्यायपालिका में भ्रष्टाचार’ अध्याय पर विवाद हुआ। सुप्रीम कोर्ट ने किताब के लिए जिम्मेदार विशेषज्ञों पर बैन लगा दिया। लेकिन सवाल यह है: अगर भ्रष्टाचार नहीं है, तो 8,630 शिकायतें क्यों आईं? अगर भ्रष्टाचार है, तो उसे स्वीकार क्यों नहीं करते?

निष्कर्ष : अब बारी कार्रवाई की!

न्यायपालिका की स्वतंत्रता जरूरी है। लेकिन जवाबदेही के बिना स्वतंत्रता ‘तानाशाही’ बन जाती है। जैसा कि एक सम्पादकीय में लिखा गया: “न्यायिक कदाचार के मामलों से निपटने के लिए न्यायपालिका के भीतर एक पारदर्शी प्रणाली अनिवार्य है।”

सवाल यह नहीं कि न्यायपालिका पर भरोसा है या नहीं। सवाल यह है कि भरोसा बनाये रखने के लिए कौन से सुधार जरूरी हैं? जवाब साफ है: पारदर्शिता, जवाबदेही और कानून का राज!

जज देवता नहीं, जनता के सेवक हैं। सेवक से जवाब माँगना जनता का अधिकार है। अब चुप्पी तोड़नी होगी। अब कानून बनाना होगा। अब जजों की भी जवाबदेही तय करनी होगी!

संविधान ने न्यायपालिका को स्वतंत्रता दी है लेकिन जवाबदेही से नहीं बचाया। समय आ गया है कि न्यायपालिका स्वयं कदम बढ़ाये। या फिर संसद को कानून बनाना होगा। जनता अब और इन्तजार नहीं करेगी!

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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