थाली में बचा अन्न केवल भोजन नहीं, किसान की मेहनत और प्रकृति के संसाधनों का भी नुकसान है
डॉ. रमेश ठाकुर

भोजन इंसान की मूलभूत आवश्यकता होने के साथ सम्मानपूर्ण जीवन का आधार भी है। जिस संसार में अनेक लोगों को पर्याप्त भोजन उपलब्ध नहीं हो पाता, वहां खाने योग्य अन्न का कूड़े में जाना हमारी सामाजिक संवेदनशीलता पर प्रश्न खड़ा करता है। भोजन की बर्बादी को केवल व्यक्तिगत नुकसान मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। यह उन लोगों की जरूरतों की अनदेखी भी है, जिनके लिए दो वक्त का भोजन जुटाना रोज का संघर्ष है।
हर वर्ष 16 अक्टूबर को मनाया जाने वाला विश्व खाद्य दिवस हमें इसी जिम्मेदारी का स्मरण कराता है। इसका उद्देश्य केवल भोजन की बर्बादी रोकना नहीं, बल्कि भूख, कुपोषण और खाद्य असुरक्षा के प्रति जागरूकता बढ़ाना तथा सभी के लिए पर्याप्त और पौष्टिक भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करने के प्रयासों को प्रोत्साहित करना है। यह दिन संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन की स्थापना की वर्षगांठ से जुड़ा है। संगठन के सम्मेलन में नवंबर 1979 में इसे मनाने का निर्णय हुआ और पहला आयोजन वर्ष 1981 में किया गया। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने दिसंबर 1980 में इसके आयोजन के समर्थन में प्रस्ताव पारित किया था।
वर्ष 2026 में विश्व खाद्य दिवस का संदेश है—‘आज नवाचार करें, कल का पोषण सुनिश्चित करें’ (Innovate today. Nourish tomorrow.)। यह विषय विज्ञान, तकनीक और पारंपरिक ज्ञान की सहायता से ऐसी कृषि एवं खाद्य व्यवस्थाएं विकसित करने का आह्वान करता है, जो वर्तमान की जरूरतें पूरी करने के साथ आने वाली पीढ़ियों के संसाधनों की रक्षा भी करें।
बर्बादी का बड़ा दायरा
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की ‘फूड वेस्ट इंडेक्स रिपोर्ट 2024’ के अनुसार, वर्ष 2022 में दुनिया में खुदरा कारोबार, भोजन सेवा प्रतिष्ठानों और घरों के स्तर पर लगभग 1.05 अरब टन खाद्य अपशिष्ट उत्पन्न हुआ। इसमें खाने योग्य भोजन के साथ खाने के अयोग्य हिस्से भी शामिल हैं। इस कुल मात्रा का लगभग 60 प्रतिशत घरों, 28 प्रतिशत भोजन सेवा क्षेत्र और 12 प्रतिशत खुदरा क्षेत्र से संबंधित था। इसलिए पूरे आँकड़े को केवल थालियों में छोड़ा गया भोजन बताना सही नहीं होगा। फिर भी इसका आकार हमारी खरीद, भंडारण और उपभोग की आदतों पर गंभीरता से विचार करने की मांग करता है।
घर में जरूरत से अधिक खाना बनाना, बाजार से ऐसी वस्तुएं खरीद लेना जिनका समय पर उपयोग न हो सके, समारोहों में अनुमान से ज्यादा भोजन तैयार कराना और थाली में आवश्यकता से अधिक परोस लेना—ये ऐसी आदतें हैं जिन्हें बदला जा सकता है। विवाह समारोहों और सार्वजनिक आयोजनों में व्यंजनों की अधिकता को प्रतिष्ठा का विषय बना देना भी विचारणीय है। मेहमाननवाजी का अर्थ भोजन की अनियंत्रित मात्रा नहीं, बल्कि अच्छी व्यवस्था और सम्मानपूर्वक भोजन कराना होना चाहिए।
थाली में पहले कम मात्रा लेना और जरूरत पड़ने पर दोबारा लेना एक छोटा, लेकिन उपयोगी कदम है। बच्चों को भी भोजन का सम्मान डांटकर नहीं, बल्कि अपने व्यवहार से सिखाया जाना चाहिए। अन्न बचाने का संस्कार घर की रसोई और भोजन की मेज से ही विकसित होता है।
अन्न के साथ संसाधनों की हानि
फेंकी गई रोटी या चावल के पीछे केवल उसकी कीमत नहीं होती। उसमें किसान का श्रम, खेत की मिट्टी, सिंचाई का पानी, परिवहन का ईंधन और पकाने में लगी ऊर्जा भी शामिल होती है। भोजन व्यर्थ होने पर ये संसाधन भी निष्फल हो जाते हैं। इसीलिए भोजन बचाना आर्थिक समझदारी के साथ पर्यावरण के प्रति जिम्मेदारी भी है।
संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के अनुसार, खाद्य हानि और खाद्य बर्बादी मिलकर वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में लगभग आठ से दस प्रतिशत योगदान करती हैं। इस तथ्य से स्पष्ट है कि भोजन की बर्बादी का प्रश्न रसोई तक सीमित नहीं, बल्कि जलवायु और प्राकृतिक संसाधनों से भी जुड़ा है।
खेत से बाजार तक होने वाली खाद्य हानि और दुकानों, भोजनालयों तथा घरों में होने वाली बर्बादी के उपाय भी अलग-अलग होंगे। किसानों को बेहतर भंडारण, समय पर परिवहन और बाजार तक पहुंच चाहिए। वहीं उपभोक्ताओं को खरीदारी की योजना, उचित संरक्षण और जरूरत के अनुसार भोजन तैयार करने की आदत अपनानी होगी।
भूख का समाधान भी व्यापक हो
भोजन बचाना जरूरी है, लेकिन केवल बर्बादी रोक देने से हर भूखे व्यक्ति तक भोजन अपने आप नहीं पहुंच जाएगा। इसके लिए वितरण व्यवस्था, लोगों की क्रयशक्ति, रोजगार और स्थानीय स्तर पर सहायता की उपलब्धता भी जरूरी है। बचा हुआ भोजन और जरूरतमंद व्यक्ति अक्सर अलग-अलग स्थानों पर होते हैं। उनके बीच सुरक्षित और समयबद्ध व्यवस्था बनाना आवश्यक है।
यहां एक अंतर समझना भी जरूरी है। थालियों में बचा जूठा भोजन और बिना परोसा हुआ सुरक्षित अतिरिक्त भोजन एक समान नहीं हैं। जरूरतमंदों तक भोजन पहुंचाने की पहल में स्वच्छता, उचित भंडारण और समय का ध्यान रखा जाना चाहिए। सहायता का उद्देश्य किसी की गरिमा बनाए रखते हुए उसकी जरूरत पूरी करना होना चाहिए।
भारत में खाद्य सुरक्षा पर चर्चा करते समय अनाज की उपलब्धता के साथ पोषण की गुणवत्ता पर भी ध्यान देना होगा। केवल पेट भर जाना पर्याप्त नहीं है। भोजन में विविधता और पौष्टिकता भी जरूरी है। सार्वजनिक वितरण, सामुदायिक भोजन और बच्चों के पोषण से जुड़े प्रयासों की सार्थकता इसी में है कि सहायता वास्तव में जरूरतमंद तक पहुंचे।
समारोहों से रसोई तक जिम्मेदारी
होटल, विवाह स्थल, धार्मिक संस्थाएं, विद्यालय और कार्यालय भोजन की बर्बादी कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। आयोजनों में मेहमानों की संख्या का व्यावहारिक अनुमान, चरणबद्ध ढंग से भोजन तैयार करना, छोटी मात्रा में परोसने की सुविधा और सुरक्षित अतिरिक्त भोजन के उपयोग की पूर्व व्यवस्था उपयोगी कदम हो सकते हैं।
घरों में भी खरीदारी से पहले उपलब्ध सामग्री देखना, जल्दी खराब होने वाली वस्तुओं को पहले उपयोग में लाना और परिवार के सदस्यों की जरूरत के अनुसार खाना बनाना मददगार होगा। भोजन की बचत का अर्थ किसी को जरूरत से कम खिलाना नहीं है। उद्देश्य पर्याप्त भोजन उपलब्ध कराते हुए अनावश्यक बर्बादी रोकना है।
विश्व खाद्य दिवस का संदेश एक दिन के आयोजन तक सीमित नहीं रहना चाहिए। भोजन का सम्मान हमारी रोजमर्रा की आदत बने। सरकार की जिम्मेदारी है कि खाद्य सुरक्षा की व्यवस्थाएं मजबूत हों; बाजार की जिम्मेदारी है कि भंडारण और वितरण बेहतर हों; और नागरिकों की जिम्मेदारी है कि खाने योग्य भोजन अनावश्यक रूप से व्यर्थ न जाए।
हर व्यर्थ गई रोटी सीधे किसी दूसरे की थाली से छीनी गई रोटी नहीं होती, लेकिन भूख से जूझते समाज में भोजन की बर्बादी दूसरों की जरूरतों के प्रति हमारी उदासीनता जरूर दिखाती है। अन्न का सम्मान तभी सार्थक होगा, जब अपनी थाली भरते समय हमें उन खाली थालियों का भी ध्यान रहे, जो आज भी भोजन की प्रतीक्षा में हैं।








