विजयादशमी विशेष : शक्ति पूजा के बाद शस्त्र पूजन

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शक्ति की सार्थकता रक्षा, ज्ञान, आत्मनिर्भरता और लोककल्याण में है

डॉ. विनोद बब्बर

शारदीय नवरात्र की शक्ति आराधना के बाद विजयादशमी का पर्व आता है। साधना से संकल्प और संकल्प से अन्याय के प्रतिकार तक की यह यात्रा भारतीय सांस्कृतिक चेतना का महत्वपूर्ण अंग है। रामकथा की प्रचलित परंपराओं में रावण पर विजय से पहले श्रीराम द्वारा देवी दुर्गा की आराधना का प्रसंग मिलता है। महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ ने अपनी प्रसिद्ध कविता ‘राम की शक्ति-पूजा’ में इसे आत्मसंघर्ष, साधना और अडिग संकल्प की गहराई के साथ प्रस्तुत किया है। उनकी कविता में विजय का मार्ग केवल शस्त्रों से नहीं, भीतर की शक्ति को जागृत करने से भी प्रशस्त होता है।

परंपरागत मान्यता के अनुसार, आश्विन शुक्ल दशमी श्रीराम की रावण पर विजय का पर्व है। देश के अनेक भागों में रामलीलाओं का मंचन और रावण, कुंभकर्ण तथा मेघनाद के पुतलों का दहन इसी स्मृति को जीवित रखते हैं। लेकिन विजयादशमी का संदेश पुतला दहन तक सीमित नहीं है। यह हमें अपने भीतर और आसपास मौजूद अन्याय, अहंकार तथा भय को पहचानने और उनका सामना करने की प्रेरणा भी देती है।

नवरात्र और विजयादशमी से जुड़ी परंपराओं में शस्त्र पूजन का विशेष स्थान है। क्षेत्रीय रीति के अनुसार कहीं महानवमी को आयुध पूजा होती है तो कहीं विजयादशमी पर शस्त्र पूजन किया जाता है। मैसूर की दशहरा परंपरा में भी आयुध पूजा और विजयादशमी की शोभायात्रा अलग-अलग अनुष्ठानों के रूप में प्रतिष्ठित हैं। इसलिए इन विविध परंपराओं को किसी एक दिन या एक ही पद्धति तक सीमित करके नहीं देखना चाहिए।

शस्त्र पूजन का व्यापक अर्थ अपने साधनों, सामर्थ्य और दायित्व के प्रति सजग होना है। साधन तभी उपयोगी हैं, जब उन्हें चलाने वाले हाथ प्रशिक्षित हों और उनका मार्गदर्शन करने वाला विवेक जागृत हो। केवल तलवार पर तिलक लगाने से समाज सुरक्षित नहीं होता; उसके लिए अनुशासन, तैयारी और न्यायपूर्ण आचरण भी आवश्यक हैं।

शांति के लिए सजग सामर्थ्य

समय के साथ शक्ति की अभिव्यक्तियां बदलती रही हैं। गणतंत्र दिवस की परेड में सैन्य अनुशासन, आधुनिक रक्षा उपकरणों और राष्ट्रीय उपलब्धियों का प्रदर्शन हमें सामूहिक सामर्थ्य का बोध कराता है। सांस्कृतिक रूपक के तौर पर इसे अपनी शक्ति के प्रति विश्वास और उत्तरदायित्व की आधुनिक अभिव्यक्ति कहा जा सकता है। यह विश्वास सैनिकों का मनोबल बढ़ाने के साथ नागरिकों को भी देश की सुरक्षा में अपने दायित्व का स्मरण कराता है।

गुरु तेग बहादुर की वाणी में निर्भयता का सुंदर संदेश मिलता है—

“भै काहू कउ देत नहि नहि भै मानत आन।”

अर्थात न किसी को भयभीत करना और न किसी का भय मानना। यह संदेश शक्ति के साथ संयम और आत्मसम्मान, दोनों को जोड़ता है।

हमारे लिए शांति और शक्ति परस्पर विरोधी नहीं, सहयोगी होनी चाहिए। शांति की रक्षा के लिए सामर्थ्य चाहिए और सामर्थ्य को सही दिशा देने के लिए विवेक। क्षमा का मूल्य तब और बढ़ जाता है, जब उसमें भय या विवशता नहीं, बल्कि आत्मबल और नैतिक निर्णय की स्वतंत्रता हो। साथ ही, किसी कमजोर व्यक्ति की करुणा या क्षमाशीलता को तुच्छ समझना भी उचित नहीं। लक्ष्य उसे उपहास का पात्र बनाना नहीं, सशक्त करना होना चाहिए।

शक्ति केवल शस्त्रों में नहीं होती। वह मन-मस्तिष्क की सजगता, संकट में धैर्य, निर्णय की स्पष्टता और समय पर उचित कार्रवाई की क्षमता में भी होती है। बिना अभ्यास के शस्त्र अनुपयोगी हो सकते हैं और बिना विवेक के शक्ति विनाशकारी।

सुरक्षा के साथ उत्तरदायित्व

समकालीन संदर्भ में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ का उल्लेख प्रासंगिक है। पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारतीय सशस्त्र बलों ने ७ मई २०२५ को यह अभियान शुरू किया था। रक्षा मंत्रालय के तत्कालीन वक्तव्य के अनुसार, शुरुआती कार्रवाई में पाकिस्तान और पाकिस्तान के कब्जे वाले जम्मू-कश्मीर में नौ आतंकी ठिकानों को निशाना बनाया गया। मंत्रालय ने उस कार्रवाई को केंद्रित, संतुलित और तनाव बढ़ाने से बचने वाली बताया था।

राष्ट्रीय सुरक्षा के ऐसे प्रसंग हमें याद दिलाते हैं कि शांति की आकांक्षा के साथ रक्षा की तैयारी भी जरूरी है। शक्ति का उद्देश्य नागरिकों के जीवन की रक्षा, आतंक का प्रतिरोध और सुरक्षित भविष्य सुनिश्चित करना होना चाहिए। सैनिकों के साहस का सम्मान करते हुए हमें उस अनुशासन और संयम का भी सम्मान करना चाहिए, जो किसी जिम्मेदार राष्ट्र की पहचान है।

ज्ञान-विज्ञान भी शक्ति

शक्ति की सामर्थ्य बनाए रखने के लिए उसके बदलते स्वरूपों को समझना जरूरी है। आज ज्ञान-विज्ञान किसी भी राष्ट्र की प्रमुख शक्तियों में शामिल हैं। आधुनिक रक्षा व्यवस्था से लेकर कृषि, चिकित्सा, संचार और उद्योग तक, प्रत्येक क्षेत्र में शोध तथा तकनीकी दक्षता का महत्व बढ़ा है।

शस्त्रों का संचालन प्रशिक्षित और अधिकृत हाथों का दायित्व है, लेकिन ज्ञान का विस्तार प्रत्येक नागरिक की आवश्यकता है। वैज्ञानिक दृष्टि हमें प्रश्न पूछना, प्रमाण परखना और भ्रम से बचना सिखाती है। इसलिए प्रयोगशालाओं में काम करने वाले वैज्ञानिक, कक्षाओं में भविष्य गढ़ने वाले शिक्षक और नए समाधान खोजने वाले शोधकर्ता भी राष्ट्र की शक्ति बढ़ाते हैं।

विजयादशमी पर हमें यह प्रश्न भी पूछना चाहिए कि क्या हम अपनी अगली पीढ़ी को केवल सफल होने की शिक्षा दे रहे हैं या विवेकशील बनने का अवसर भी दे रहे हैं? ज्ञान तभी समाज की शक्ति बनता है, जब वह कुछ लोगों की सुविधा तक सीमित रहने के बजाय जनसाधारण के जीवन को बेहतर बनाए।

अर्थ के साथ साधन की शुद्धता

आर्थिक सामर्थ्य भी राष्ट्रीय शक्ति का महत्वपूर्ण आधार है। व्यक्ति हो, समाज हो या राष्ट्र—शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और विकास के लिए संसाधन चाहिए। आत्मनिर्भर अर्थव्यवस्था निर्णय लेने की स्वतंत्रता बढ़ाती है और संकट के समय सहारा देती है।

भारतीय चिंतन में विद्या, विनय, पात्रता, धन, धर्म और सुख के बीच संबंध स्थापित किया गया है। इसका आशय केवल धन संचय नहीं, बल्कि योग्य बनने और अर्जित संसाधनों का सदुपयोग करने से है। धन की उपयोगिता तभी व्यापक होती है, जब वह न्यायपूर्ण आजीविका, सामाजिक उत्तरदायित्व और लोककल्याण से जुड़े।

यहां साधन की शुद्धता अनिवार्य है। छल, भ्रष्टाचार या शोषण से अर्जित धन बाहरी प्रभाव तो बढ़ा सकता है, लेकिन वह विश्वास और नैतिक प्रतिष्ठा को कमजोर करता है। वास्तविक समृद्धि वह है, जिसमें श्रम का सम्मान हो, अवसरों तक पहुंच हो और आगे बढ़ने का रास्ता दूसरों का अधिकार छीनकर न बनाया जाए।

अंतिम व्यक्ति तक पहुंचे शक्ति

भारतीय संस्कृति, हमारी भाषाएं और हमारी विविधता भी शक्ति के स्रोत हैं। खेतों में अन्न उगाने वाला किसान, निर्माण में जुटा मजदूर, सीमाओं पर तैनात सैनिक, विद्यालय में पढ़ाता शिक्षक और अस्पताल में सेवा करता स्वास्थ्यकर्मी—सभी राष्ट्र को अपने-अपने ढंग से सशक्त बनाते हैं।

जाति, धर्म, भाषा और क्षेत्र के आधार पर एक-दूसरे को कमजोर करके कोई समाज स्थायी रूप से शक्तिशाली नहीं बन सकता। एकजुट भारत के निर्माण का संकल्प तभी सार्थक होगा, जब उसमें अंतिम पंक्ति के व्यक्ति की गरिमा और भागीदारी भी शामिल हो।

यदि किसान असुरक्षित है, मजदूर उपेक्षित है, बच्चा शिक्षा से वंचित है और महिला भय में जी रही है, तो हमारी शक्ति-साधना अधूरी है। शक्ति का उत्सव तभी पूर्ण होगा, जब सामान्य नागरिक अपने जीवन में सुरक्षा, सम्मान और न्याय अनुभव करेगा।

गुरु गोबिंद सिंह की परंपरा भी हमें साहस, आत्मसम्मान और अन्याय के प्रतिरोध की प्रेरणा देती है। इस प्रेरणा का सार कमजोर की रक्षा और सामर्थ्य के उत्तरदायी उपयोग में देखा जाना चाहिए। आध्यात्मिक चेतना और नैतिक अनुशासन से जुड़ी शक्ति ही समाज के लिए कल्याणकारी बनती है।

विजयादशमी पर शस्त्रों का पूजन करते समय हमें अपने संकल्पों को भी परखना चाहिए। क्या हमारी शक्ति किसी असहाय की ढाल बनेगी? क्या हमारा ज्ञान किसी का अंधकार दूर करेगा? क्या हमारी संपन्नता किसी जरूरतमंद के लिए अवसर बनेगी?

शक्ति पूजा की पूर्णता इसी में है कि सामर्थ्य रक्षा बने, ज्ञान प्रकाश बने और समृद्धि लोककल्याण का साधन बने। यही विजयादशमी का जीवन में उतरता हुआ संदेश है।

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Author: Bharat Sarathi

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