पत्रकार की पहचान नेताओं से नजदीकी नहीं, उसकी खबरों की विश्वसनीयता है
डॉ. शैलेश शुक्ला

अच्छा पत्रकार वह नहीं जो बड़े नेताओं के साथ तस्वीर खिंचवाकर अपनी पहुँच का प्रदर्शन करे, बल्कि वह है जो उनसे जनता के सवाल पूछ सके और उनके दावों की सच्चाई सामने रख सके। पत्रकारिता की असली पहचान किसी प्रभावशाली व्यक्ति के साथ खड़े होने में नहीं, जरूरत पड़ने पर उसी व्यक्ति से जवाब माँगने के साहस में है। आज जब सोशल मीडिया पर संपर्कों का प्रदर्शन बढ़ रहा है, तब इस बुनियादी कसौटी को याद करना और भी जरूरी हो गया है।
फेसबुक खोलिए तो अनेक पत्रकारों की प्रोफाइल पर मंत्रियों के साथ मुस्कुराती सेल्फियाँ, विधायकों से आत्मीय मुलाकातों और नेताओं से सम्मान प्राप्त करने की तस्वीरें दिखाई देती हैं। नीचे लिखा होता है—‘आत्मीय भेंट’, ‘मार्गदर्शन प्राप्त हुआ’ या ‘अविस्मरणीय क्षण’। लाइक और प्रशंसा के बीच एक सवाल पीछे छूट जाता है—पत्रकार का काम अपनी पहुँच दिखाना है या उस पहुँच का इस्तेमाल जनता के सवालों के जवाब हासिल करने के लिए करना है?
किसी नेता से मिलना या उसके साथ तस्वीर खिंचवाना अपने आप में गलत नहीं है। पत्रकार को संवाद भी करना होता है और सूचना के स्रोत भी बनाने होते हैं। समस्या तब शुरू होती है जब यह संपर्क उसकी स्वतंत्रता पर भारी पड़ने लगता है; जब तस्वीर पहचान का प्रमाणपत्र और निकटता प्रभाव जमाने का साधन बन जाती है। खबर की साख की जगह संपर्क की धाक काम करने लगे, तो पत्रकारिता और जनसंपर्क के बीच की दूरी मिटने लगती है।
सवाल ही पत्रकारिता की ताकत
लोकतंत्र में पत्रकारिता की भूमिका सत्ता की आरती उतारना नहीं, उसके कामकाज की पड़ताल करना है। सरकार क्या कह रही है, यह बताना जरूरी है, लेकिन उसके कहे और किए में कितना अंतर है, यह सामने लाना भी उतना ही जरूरी है। सरकारी घोषणा खबर की शुरुआत हो सकती है, उसका अंतिम सत्य नहीं।
सत्ता से सवाल पूछने का अर्थ हर काम का विरोध करना भी नहीं है। अच्छी नीति और उपयोगी पहल को स्थान मिलना चाहिए, लेकिन उनकी उपयोगिता का आधार प्रचार नहीं, प्रमाण होना चाहिए। किसी योजना से लोगों को लाभ हुआ है तो वह सामने आए; कहीं कमी, अनियमितता या अन्याय है तो उसे भी उसी स्पष्टता से लिखा जाए। पत्रकार की कसौटी सरकार की पसंद-नापसंद नहीं, सार्वजनिक हित होना चाहिए।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में पत्रकार की उपस्थिति तभी सार्थक है जब वह जरूरत पड़ने पर हाथ उठाकर पूछ सके—आपके आँकड़ों और जमीन की हकीकत में अंतर क्यों है? घोषित काम समय पर पूरा क्यों नहीं हुआ? स्वीकृत धन कहाँ खर्च हुआ? जिन लोगों के लिए योजना बनी, वे अब भी उसके लाभ से वंचित क्यों हैं?
ऐसे सवाल असुविधाजनक हो सकते हैं, लेकिन लोकतंत्र को उनकी जरूरत है।
खिंचाई नहीं, तथ्यपूर्ण जवाबदेही
नेताओं की ‘खिंचाई’ का अर्थ गाली देना, निजी उपहास करना या सोशल मीडिया पर उत्तेजना फैलाना नहीं है। पत्रकारिता में इसका अर्थ है—तथ्य, तर्क और प्रमाण के साथ जवाबदेही तय करना। तीखी भाषा किसी कमजोर खबर को मजबूत नहीं बना सकती। खबर की ताकत उसके दस्तावेजों, जमीनी पड़ताल और निष्पक्षता से आती है।
सरकार कहती है कि सौ स्कूल बनाए गए हैं तो पत्रकार का काम केवल घोषणा प्रकाशित करना नहीं है। उसे देखना चाहिए कि कितने भवन तैयार हैं, कितनों में पढ़ाई शुरू हुई, शिक्षक कितने हैं और बच्चों को आवश्यक सुविधाएँ मिल रही हैं या नहीं। अस्पताल खुलने की खबर के साथ यह सवाल भी उठना चाहिए कि वहाँ डॉक्टर, दवाएँ और जाँच की व्यवस्था है या नहीं। सड़क निर्माण के दावे के साथ उसकी गुणवत्ता और वास्तविक उपयोगिता की जाँच भी होनी चाहिए।
इसी तरह अपराध कम होने के दावे की पड़ताल आँकड़ों, शिकायत दर्ज होने की स्थिति और पीड़ितों के अनुभवों के आधार पर होनी चाहिए। किसी एक बयान या घटना के सहारे पूरी तस्वीर बना देना भी जिम्मेदार पत्रकारिता नहीं है।
जिस पर आरोप हो, उसका पक्ष लेना और उसे उचित स्थान देना इस प्रक्रिया का आवश्यक हिस्सा है। जवाब न मिले तो यह बात स्पष्ट लिखी जाए। पत्रकार का उद्देश्य किसी को पहले से दोषी साबित करना नहीं, पाठक के सामने सत्यापित जानकारी रखना है।
तस्वीरों से बड़ी विश्वसनीयता
सोशल मीडिया ने पत्रकारों को सीधे पाठकों तक पहुँचने का अवसर दिया है। इसी के साथ लोकप्रियता का दबाव भी बढ़ा है। फॉलोअर, लाइक और शेयर कभी-कभी इस भ्रम को जन्म देते हैं कि दिखाई देना ही प्रभावशाली होना है। किसी बड़े नेता के साथ तस्वीर तत्काल ध्यान खींच सकती है, लेकिन वह खबर की विश्वसनीयता का विकल्प नहीं बन सकती।
पाठक केवल यह नहीं देखता कि पत्रकार किन लोगों से मिलता है। वह यह भी देखता है कि उन्हीं लोगों पर सवाल उठने पर पत्रकार क्या करता है। क्या वह समान कसौटी अपनाता है? क्या वह असुविधाजनक तथ्य प्रकाशित करता है? क्या उसकी खबर में किसी खास व्यक्ति या दल के लिए अनकही छूट है?
विश्वसनीयता लगातार किए गए काम से बनती है। एक साहसी रिपोर्ट के बाद लंबे समय तक चुप्पी साध लेना पर्याप्त नहीं है। सत्ता बदले तो पत्रकार की कसौटी नहीं बदलनी चाहिए। जो सवाल आज सरकार से पूछे जा रहे हैं, कल दूसरी सरकार से भी पूछे जाने चाहिए। विपक्ष के दावों की भी जाँच होनी चाहिए। जनता के प्रति जवाबदेही किसी राजनीतिक खेमे की सदस्यता नहीं है।
सत्ता के पास अपना पक्ष रखने के अनेक माध्यम होते हैं। स्वतंत्र पत्रकारिता का मूल्य उन सवालों को सामने लाने में है जो प्रचार के शोर में दब जाते हैं।
मैदान में बनती है पहचान
एक अच्छे पत्रकार की पहचान उसकी उन रिपोर्टों से बनती है जो सार्वजनिक जीवन की वास्तविक समस्याओं को सामने लाती हैं—किसी मजदूर का अटका राशन कार्ड, किसी गाँव का सूखा नल, किसी अस्पताल का खाली चिकित्सक कक्ष, किसी बस्ती की टूटी सड़क या किसी स्कूल में शिक्षकों की कमी।
इन विषयों में बड़े मंचों जैसी चमक नहीं होती, लेकिन आम आदमी का जीवन इन्हीं से प्रभावित होता है। पत्रकार जब इन पर लगातार लिखता है, संबंधित अधिकारियों से जवाब माँगता है और कार्रवाई की स्थिति पाठकों को बताता है, तब खबर का सामाजिक महत्व स्पष्ट होता है।
समस्या प्रकाशित करके आगे बढ़ जाना हमेशा पर्याप्त नहीं होता। आश्वासन दिया गया था तो उसका क्या हुआ? काम शुरू हुआ तो पूरा कब होगा? शिकायत का निस्तारण बताया गया है तो शिकायतकर्ता संतुष्ट है या नहीं? पत्रकारिता की उपयोगिता ऐसे अनुवर्ती सवालों से भी तय होती है।
प्रेस विज्ञप्ति सूचना का स्रोत हो सकती है, स्वतंत्र पड़ताल का विकल्प नहीं। उसमें किए गए दावों की जाँच, आवश्यक संदर्भ और प्रभावित लोगों की बात जोड़ने से ही पाठक को पूरी तस्वीर मिलती है। हर खबर में जाँच की जरूरत अलग होगी, लेकिन दावा और प्रमाण के बीच का अंतर कभी नहीं भूलना चाहिए।
दबाव के बीच स्वतंत्रता
सत्ता से कठिन सवाल पूछना आसान नहीं है। पत्रकार को धमकियों, विज्ञापन के दबाव, सूचना रोकने और संगठित ऑनलाइन हमलों जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। छोटे शहरों और कस्बों में यह दबाव और व्यक्तिगत हो जाता है, क्योंकि जिन लोगों के बारे में खबर लिखी जाती है, उनसे रोज सामना भी होता है।
इसलिए साहस के साथ पेशेवर सावधानी जरूरी है। दस्तावेज सुरक्षित रखना, तथ्यों की दोबारा जाँच करना, आरोप और स्थापित तथ्य में स्पष्ट अंतर रखना तथा गलती होने पर उसे सुधारना पत्रकार की ताकत है। निष्पक्षता सवालों को कमजोर नहीं करती; उन्हें अधिक भरोसेमंद बनाती है।
समाचार संस्थानों की भी जिम्मेदारी है कि वे अपने पत्रकारों को अकेला न छोड़ें। स्वतंत्र पत्रकारिता केवल किसी एक रिपोर्टर की हिम्मत के भरोसे नहीं चल सकती। उसे संपादकीय समर्थन और ऐसे कार्य वातावरण की जरूरत है जहाँ तथ्यपूर्ण खबर को प्रभावशाली लोगों की नाराजगी के कारण दबाया न जाए।
कैमरा जनता की ओर भी घुमाइए
युवा पत्रकारों से विशेष आग्रह है—अपने संपर्क बढ़ाइए, लेकिन अपनी स्वतंत्रता की कीमत पर नहीं। नेताओं से मिलिए, लेकिन जनता से दूरी बनाकर नहीं। कैमरा उस टूटी सड़क, सूखे नल और खाली कक्षा की ओर भी घुमाइए जिनके बारे में भाषणों में बहुत कुछ कहा जाता है, पर जमीन पर बहुत कम बदलता है।
अपनी पहचान इस बात से बनाइए कि आपकी खबर में कितना श्रम, कितना सत्य और कितनी सार्वजनिक उपयोगिता है। सम्मान मिलना सुखद हो सकता है, लेकिन सम्मान देने वाले से सवाल पूछने की स्वतंत्रता बची रहनी चाहिए।
नेता आते-जाते रहेंगे, सरकारें बदलती रहेंगी और सोशल मीडिया की टाइमलाइन पर नई तस्वीरें चढ़ती रहेंगी। एक ईमानदार रिपोर्ट का मूल्य उससे कहीं अधिक स्थायी होता है। वह अन्याय का दस्तावेज बन सकती है, किसी वंचित की आवाज को स्थान दे सकती है और व्यवस्था को जवाब देने के लिए बाध्य कर सकती है।
लोकतंत्र में पत्रकार का काम सत्ता की बारात में नाचना नहीं, उस उत्सव के पीछे छिपे सार्वजनिक सवालों की पड़ताल करना है। उसकी कलम का सम्मान निकटता से नहीं, स्वतंत्रता से बनता है। सत्ता को स्तुति सुनाने वाले बहुत मिल जाएँगे; पत्रकारिता की जरूरत इसलिए है कि उससे सवाल पूछने वाले भी बने रहें।
डॉ. शैलेश शुक्ला ….. गृह मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा ‘राजभाषा गौरव पुरस्कार’ से सम्मानित |








