गेहूं की एमएसपी में सिर्फ 25 रुपये वृद्धि किसानों से क्रूर मजाक : विद्रोही

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समर्थन मूल्य बढ़ोतरी को बताया अपर्याप्त, कहा—इसे ऐतिहासिक बताकर किसानों के जख्मों पर नमक छिड़क रही भाजपा

रेवाडी, 1 अक्टूबर। स्वयंसेवी संस्था ग्रामीण भारत के अध्यक्ष वेदप्रकाश विद्रोही ने रबी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में की गई बढ़ोतरी को अपर्याप्त बताते हुए केंद्र की भाजपा सरकार पर किसानों की उपेक्षा का आरोप लगाया है। उन्होंने कहा कि गेहूं जैसी प्रमुख खाद्यान्न फसल के समर्थन मूल्य में महज 25 रुपये प्रति क्विंटल की वृद्धि किसानों के साथ क्रूर मजाक और धोखा है।

विद्रोही ने कहा कि गेहूं का न्यूनतम समर्थन मूल्य 2,585 रुपये से बढ़ाकर 2,610 रुपये प्रति क्विंटल किया गया है। यह बढ़ोतरी एक प्रतिशत से भी कम है। उन्होंने आरोप लगाया कि पहले से कर्ज के बोझ तले दबे किसानों को राहत देने के बजाय सरकार ऐसी मूल्य नीति अपना रही है, जिससे उनकी आर्थिक कठिनाइयां और बढ़ेंगी।

देश का पेट भरने वाले किसान की उपेक्षा

विद्रोही ने कहा कि देश के करोड़ों लोगों का पेट भरने वाला किसान अपनी फसल के उचित दाम की अपेक्षा करता है, लेकिन गेहूं के भाव में केवल 25 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी उसकी मेहनत के साथ अन्याय है। उनके अनुसार, रबी की सबसे प्रमुख फसल के समर्थन मूल्य में इतनी कम वृद्धि सरकार की किसान विरोधी सोच और नीतियों को दर्शाती है।

उन्होंने कहा कि अन्य रबी फसलों में चने का समर्थन मूल्य 83 रुपये, जौ का 136 रुपये, सरसों का 413 रुपये, मसूर का 390 रुपये और कुसुम का 675 रुपये प्रति क्विंटल बढ़ाया गया है। विद्रोही ने इन बढ़ोतरियों को भी किसानों की जरूरतों और आर्थिक संकट के मुकाबले अपर्याप्त बताया।

‘ऐतिहासिक बढ़ोतरी’ के दावे पर सवाल

विद्रोही ने आरोप लगाया कि एक ओर सरकार ने गेहूं के समर्थन मूल्य में ‘ऊंट के मुंह में जीरा’ के समान वृद्धि की है, दूसरी ओर भाजपा के मंत्री और नेता इसे ऐतिहासिक उपलब्धि बताकर किसानों के जख्मों पर नमक छिड़क रहे हैं। उन्होंने कहा कि सत्ता के अहंकार में किसानों की वास्तविक परेशानियों को नजरअंदाज करना और मामूली राहत का बढ़-चढ़कर प्रचार करना उनका मजाक उड़ाने जैसा है।

मसूर और कुसुम का उल्लेख करते हुए विद्रोही ने दावा किया कि देश में इन फसलों की खेती अपेक्षाकृत कम होती है और इनके बाजार भाव घोषित समर्थन मूल्य से अधिक रहते हैं। उन्होंने चना, जौ और सरसों के समर्थन मूल्य में की गई वृद्धि को भी नाकाफी बताते हुए सरकार की मूल्य निर्धारण नीति पर सवाल उठाए।

किसानों पर बढ़ते कर्ज का मुद्दा उठाया

विद्रोही ने आरोप लगाया कि भाजपा सरकार की आर्थिक नीतियां आमजन और किसानों को राहत देने के बजाय चुनिंदा पूंजीपतियों को लाभ पहुंचा रही हैं। उन्होंने कहा कि किसान विरोधी नीतियों के कारण अन्नदाता कर्ज के बोझ तले दबता जा रहा है, जबकि सरकार समर्थन मूल्य में अपर्याप्त बढ़ोतरी को बड़ी उपलब्धि के रूप में प्रस्तुत कर रही है।

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Author: Bharat Sarathi

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