भारत-अमेरिका व्यापार डील एकपक्षीय, किसानों के हितों पर खतरा: विद्रोही

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ग्रामीण भारत के अध्यक्ष ने संयुक्त बयान पर उठाए सवाल, कहा—अमेरिका को होगा फायदा, भारत का बढ़ेगा व्यापार घाटा

रेवाडी, 8 फरवरी 2026। स्वयंसेवी संस्था ‘ग्रामीण भारत’ के अध्यक्ष वेदप्रकाश विद्रोही ने भारत-अमेरिका द्विपक्षीय व्यापार डील के संयुक्त बयान पर गंभीर सवाल उठाते हुए इसे मोदी-भाजपा सरकार की नीति और नीयत पर प्रश्नचिह्न बताया है। उन्होंने आरोप लगाया कि यह कथित व्यापार समझौता अमेरिका के पक्ष में एकपक्षीय है, जिससे दोनों देशों के बीच भारत का व्यापार घाटा बढ़ेगा और अमेरिका को लाभ होगा।

विद्रोही ने कहा कि इस डील से पहले भारत-अमेरिका व्यापार में भारत को लाभ होता था और अमेरिका को घाटा, लेकिन अब स्थिति उलटने का दावा किया जा रहा है। उन्होंने प्रश्न उठाया कि यदि भारत को ही व्यापार घाटा होगा तो इस समझौते को देशहित में कैसे बताया जा सकता है।

उन्होंने यह भी कहा कि डील के बाद अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा रूस से कच्चा तेल खरीदने पर लगाए गए 25 प्रतिशत पेनिल्टी टैरिफ को वापस लेने संबंधी आदेश की भाषा अपमानजनक प्रतीत होती है। विद्रोही के अनुसार वर्क ऑर्डर की शब्दावली से ऐसा लगता है मानो अमेरिका भारत को एक स्वतंत्र संप्रभु राष्ट्र के बजाय अधीन देश की तरह देख रहा हो। उन्होंने दावा किया कि भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में किसी भी विदेशी शासनाध्यक्ष ने व्यापार आदेश में ऐसी भाषा का प्रयोग नहीं किया।

विद्रोही ने आरोप लगाया कि आदेश में यह चेतावनी भी दी गई है कि यदि भारत रूस से कच्चा तेल खरीदेगा तो उस पर 25 प्रतिशत या उससे अधिक टैरिफ लगाया जा सकता है। साथ ही, भारत की गतिविधियों की निगरानी के लिए अमेरिका के दस विभागों को अधिकार देने का उल्लेख भी किया गया है। उन्होंने सवाल किया कि क्या अमेरिका भारत का मालिक है?

केंद्र सरकार के इस दावे पर भी विद्रोही ने शंका जताई कि व्यापार डील से किसानों, खेती और डेयरी उद्योग को नुकसान नहीं होगा। उनका कहना है कि अब तक यह स्पष्ट नहीं किया गया कि अमेरिका के किन कृषि उत्पादों पर भारत कितना टैक्स लगाएगा और किन पर शून्य शुल्क रहेगा।

उन्होंने संयुक्त बयान में विरोधाभास बताते हुए कहा कि भविष्य में अमेरिकी कृषि उत्पादों से भारतीय बाजार भर सकता है, जिससे किसानों को नुकसान होगा। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि गेहूं के आयात पर रोक है, लेकिन आटे पर नहीं; आम पर रोक है, पर आम रस पर नहीं; सोयाबीन पर रोक है, पर सोयाबीन तेल पर नहीं; मक्का पर रोक है, पर पशु आहार पर नहीं; चने पर रोक है, पर बेसन पर नहीं; और चावल पर रोक है, लेकिन चूड़े पर नहीं।

विद्रोही ने आरोप लगाया कि जिन कृषि उत्पादों को अमेरिका सीधे भारत में नहीं बेच सकता, उनके प्रसंस्कृत उत्पादों को छूट देना किसानों के साथ धोखाधड़ी है। उन्होंने कहा कि इस नीति से किसानों को बर्बाद करने का रास्ता खुल सकता है। इस संदर्भ में उन्होंने कहा कि इस स्थिति पर कहावत लागू होती है—“गुड़ खाओ, गुलगुले से परहेज।”

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Author: Bharat Sarathi

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