विवेक रंजन श्रीवास्तव

इस देश की सार्वजनिक जीवन की सबसे दिलचस्प विशेषता यह है कि यहाँ कर्म से अधिक पहचान का मूल्य है । निष्ठा , लेबल , विचार धारा , सदाचार पर भारी हैं। जो दिखाई देता है वही माना जाता है और जो माना जाता है वही सम्मानित होता है। मंच पर बैठे चेहरे बदलते रहते हैं पर मंच के पीछे रखी कुर्सियाँ स्थायी होती हैं। कुछ लोग इन्हीं कुर्सियों की छाया में बड़े होते हैं। कुछ पूरी धूप में तपते रहते हैं और कुछ ऐसे भी होते हैं जो धूप और छाया दोनों से ईमानदारी से गुजरते हैं पर अंत में किसी भी मौसम के आधिकारिक प्रतिनिधि नहीं बन पाते।
यहाँ विचारधारा कम, वेशभूषा अधिक बोलती है। अगर आपके माथे पर सही तिलक है, चाल में सही ताल है । सम्बन्ध सीधे हों या परोक्ष , सही अवसरों पर नजर है, तो आपकी योग्यता प्रमाणित मान ली जाती है। इसके विपरीत अगर आप वही काम बिना विशिष्ट परिधान के करते हैं, वही अनुशासन बिना ढोल के निभाते हैं और वही विचार बिना घोषणा के जीते हैं, तो आप संदिग्ध ठहराए जाते हैं। आपको न तो अपना कहा जाता है, न पराया। आप उपयोगी हैं पर सम्मान के लिए अनिवार्य नहीं।
सत्ता और सम्मान के इस गलियारे में सबसे ज्यादा भीड़ उन्हीं की होती है जो समय पर सही जगह खड़े हो जाते हैं। यहाँ आदर्शों की दुकान है, पर तमगे उन्हीं को मिलते हैं जिनके पास अधिकृत पहचान पत्र हो। बाकी लोग आदर्शों के साथ सोचते रह जाते हैं कि शायद अगली बार उनका नंबर आएगा। वे भूल जाते हैं कि यहाँ कतार नहीं, चयन होता है और चयन में खड़े रहने से ज्यादा जरूरी है पहचाने जाना।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे मजेदार भूमिका निरीह तटस्थों की है। वे नारे नहीं लगाते, इसलिए संदेह के घेरे में रहते हैं। वे गलत को गलत भी कहते हैं, इसलिए अविश्वसनीय माने जाते हैं। वे समर्थन करते हैं, पर अंध भक्ति नहीं । वे अपने समय की विसंगतियों को पहचानते हैं, पर तालियों के लिए नहीं, आत्मसंतोष के लिए लिखते बोलते काम करते हैं। यही उनकी सबसे बड़ी भूल है।
सत्ता को शोर पसंद है, स्पष्ट पक्षधरता पसंद है। जो चुपचाप सही काम करता है, वह व्यवस्था के लिए असुविधाजनक होता है क्योंकि वह उदाहरण बन जाता है। उदाहरण व्यवस्था को डराते हैं। व्यवस्था चाहती है अनुयायी, प्रश्नचिह्न नहीं। इसलिए जो लोग बिना झंडा उठाए उसी दिशा में चलते हैं, उन्हें सबसे पहले हाशिए पर धकेल दिया जाता है। न वे विद्रोही कहलाते हैं, न समर्थक , वे बस असुविधाजनक होते हैं।
अजीब स्थिति बनती है उनकी जिन्होने कोई खेमे को अपनाया नहीं, फिर भी हर खेमे के सच में शामिल होते हैं। एक ओर उन्हें कहा जाता है कि तुम हमारे नहीं हो, दूसरी ओर यह भी स्वीकार किया जाता है कि तुम्हारी बातों में दम है। यह दम ही उनके लिए अभिशाप बन जाता है। क्योंकि दमदार तटस्थता सबसे खतरनाक होती है। वह सवाल उठाती है, बिना यह बताए कि सवाल किसके पक्ष में है।
यहाँ विचारधारा को अक्सर गणवेश समझ लिया जाता है। जो गणवेश में नहीं, वह या तो गुप्त शत्रु है या असमंजस में पड़ा हिस्सा मात्र । यह मान लिया जाता है कि बिना पहचान के कोई समर्पण संभव नहीं। जबकि सच्चाई यह है कि सबसे गहरा समर्पण वही होता है जो प्रचार का मोहताज नहीं होता। लेकिन इस सच्चाई की कीमत बहुत महँगी है। उसे कोई पुरस्कार नहीं मिलता, कोई नियुक्ति नहीं, कोई मंच नहीं।
इतिहास ऐसे लोगों से भरा पड़ा है जिन्होंने अपने समय में सही कहा, सही किया, पर गलत जगह खड़े रहे। वे न तो सत्ता के गीतकार बने, न विरोध के पेशेवर चेहरे। वे बीच की उस जमीन पर खड़े रहे जहाँ से दृश्य सबसे साफ दिखता है, पर वहीं सबसे ज्यादा अकेलापन भी मिलता है। उनके हिस्से में न जयकार आई, न समर्थन, बस उपेक्षा मिल पाई। ऐसे लोग सम्मान की चयन सूची के नॉमिनेशन बस बने रह जाते हैं।
जो वास्तव में उस अनुशासित, समर्पित और राष्ट्रकेंद्रित कार्यशैली को अपने जीवन में उतारते हैं, पर उसे नाम की माला नहीं पहनाते, वे अनदेखे रह जाते हैं। उन्हें वह खेमा संदेह से देखता है जिसकी वे अपने आदर्श की मूल भावना में आलोचना नहीं करते, और वह खेमा तो उनसे कतराता ही है जिसकी विसंगतियों पर वे उंगली रखते हैं। सत्यवादी होना यहाँ सबसे असुविधाजनक स्थिति है। क्योंकि सत्य किसी का स्थायी समर्थक नहीं होता। वह सबको आईना दिखाता है और आईना हर सत्ता को चुभता है। इसलिए सबसे सुरक्षित स्थान या तो पूरी तरह पक्ष में होना है या पूरी तरह विपक्ष में। बीच में खड़ा व्यक्ति इतिहास में नहीं, फुटनोट में भी जगह नहीं पाता।







