अब सामाजिक न्याय व धर्मनिरपेक्षता का झंडा बुलंद करेगी भाजपा

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कमलेश पांडेय

कभी ‘मंडल’ के बाद ‘कमंडल’ की सियासत शुरू करके राष्ट्रीय व सूबाई राजनीति में कांग्रेसियों, समाजवादियों और उनके नेतृत्व वाले गठबंधन को निपटाने वाली भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) अब केंद्र व राज्यों में ‘ओबीसी नेतृत्व’ के मजबूत होते ही स्वघोषित ‘हिंदुत्व’ के एजेंडे से भटकते  हुए उसी कथित सामाजिक न्याय व सेक्युलरिज्म का झंडा बुलंद करती दिखाई दे रही है, जिसकी जनविरोधी सियासत करने वाले दल हाशिए पर चले गए! 

बताया जाता है कि अपने वर्तमान नेतृत्व को चुनावी मजबूती यानी बहुमत दिलाते रहने के लिहाज से भाजपा ने भी देश की उसी घिसी पिटी सवर्ण विरोधी ‘सामाजिक न्याय’ और मुस्लिम परस्त ‘अल्पसंख्यकवाद’ की राजनीतिक पीच पर नए तरीके से शैक्षणिक बॉलिंग-बैटिंग शुरू की है, ताकि वह लोकसभा चुनाव 2024 के अप्रत्याशित परिणाम के सदमे से उबर सके। बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के परिणामों ने भी उसकी हौसलाअफजाई की है! 

इसलिए जहां निर्वाचित सवर्ण नेतृत्व भी रणनीतिक खामोशी दिखा रहा है, वहीं सामान्य जाति के लोग भाजपा-संघ की सुनियोजित चाल के खिलाफ सुलग रहे हैं। दरअसल, भाजपा सरकार नियंत्रित ‘यूजीसी’ के एक नापाक करतब से और उसे पर्दे के पीछे से शह देते हुए अमलीजामा पहनाने वाली मध्यप्रदेश सरकार के उच्च शिक्षा विभाग के साल 2023 वाले समनुरूप दिशानिर्देश से और बिहार के तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय, भागलपुर के हालिया निर्देशों से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि हिंदूहित चिंतक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उनका सियासी मुखौटा समझी जाने वाली भाजपा के ओबीसी-दलित रणनीतिकार और मातहत अधिकारी सत्ता मद में इतने नेता मदांध हो चुके हैं कि इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगाए हुए रोक की भी उन्हें परवाह नहीं है। 

मसलन ऐसा करके अपने ही पुराने नारों और मुद्दों को दरकिनार करते हुए देश व समाज को तोड़ने वाले दलित, पिछड़ा व अल्पसंख्यक विमर्श को पुनः हवा देने लगी है, जबकि समग्र हिन्दू हित में जातिवादी और पूंजीवादी सोच-समझ के सम्पूर्ण उन्मूलन की दिशा में उसे सधे हुए रणनीतिक कदम बढ़ाने चाहिए। ऐसे में भारतीय समाज का इंजन समझे जाने वाले सवर्णों की सामाजिक व राष्ट्रीय दुविधा बढ़ेगी, जिससे देर सबेर ‘हिंदुत्व’ का गतिशील विचार रथ भी थमेगा और दुनियावी चक्रब्यूह संरचना संकट में फंसेगा। ततपश्चात भाजपा की सरकारें भी लुढ़क कर किस सियासी गड्ढे में जा फंसेगी, इसकी शायद कल्पना उन्होंने भी नहीं की होगी। 

ऐसे अदूरदर्शी रणनीतिकारों को पता होना चाहिए कि भारत की सियासत में धुर सवर्ण विरोधी एजेंडा अपनाने वाले दल हाशिए पर सिमटकर देशद्रोही सियासत की ओर उन्मुख हो गए। बताया जाता है कि कांग्रेस की धुर मुस्लिम तुष्टिकरण और जातीय समीकरण वाली जड़वत सियासी नीतियों से अपेक्षाकृत प्रगतिशील सवर्णों का मन ऊब गया तो वे कांग्रेसी से समाजवादी बने पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई व पूर्व केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री राजनारायण सिंह जैसे समाजवादियों ने उन्हें अपनी ओर आकर्षित कर लिया और देश की सत्ता हथिया ली।

तब 1960 और 1970 के दशक में कांग्रेस को कमजोर करने और उसके पक्षधर दलितों-मुसलमानों को उससे दूर करके अपने पक्ष में मिलान के लिए ही राममनोहर लोहिया जैसे समाजवादी नेताओं ने पिछड़ावर्ग को गोलबंद करते हुए नारा दिया था- “पिछड़ा पावे सौ में साठ।” इसी रणनीति के तरह 1977 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने ओबीसी के हितार्थ मंडल आयोग का गठन किया था। उसी मंडल आयोग की रिपोर्ट को 1989 में लागू करके समाजवादियों की तत्कालीन जनता दल सरकार के प्रधानमंत्री वी पी सिंह ने जिस ओबीसी सियासत को हवा दी, उसका मकसद तत्कालीन उपप्रधानमंत्री चौधरी देवीलाल को काबू में रखना था। इसके बाद जो हुआ देशवासी वाकिफ हैं।

दरअसल, इन सब जातिवादी और सेक्युलर सियासत के पीछे की गहरी राजनीतिक चाल यह है कि पूंजीवाद समर्थक कांग्रेस और भाजपा एक ही सियासी सिक्के के दो पहलू हैं और इन्होंने कभी समाजवादियों को आगे करके वामपंथियों को कमजोर किया तो कभी समाजवादियों में फूट दलकरके भारत में पूंजीवादी हितों को संरक्षित किया।बताया जाता है कि पूंजीवाद एजेंडे को सामाजिक कवच प्रदान करने के लिए ही ये पार्टियां पुनः जाति आधारित सामाजिक न्याय और धर्म आधारित अल्पसंख्यकवाद की सियासत को संविधान बचाने की आड़ लेकर नए सिरे से धार दे रही हैं।

 वहीं, भाजपा भी अब इसी सियासी पीच पर लौटने की जो बेताबी दिखा रही है, उससे अब यह साफ हो चुका है कि भाजपा का हिंदुत्व भी ‘नेहरू कांग्रेस’ के मुस्लिम लीगी जिन्ना विरोधी हिंदुत्व सरीखा छलावा ही निकला! जबकि इनकी सवर्ण विरोधी राजनीति से सवर्ण नेताओं की तो सियासत चमकी, लेकिन जमींदारी से लेकर नौकरी और कारोबार तक में उन्हें हाशिए की ओर जाना पड़ा। अब तो उन्हीं विदेशी कम्पनियों की देश में पुनः आवभगत होने लगी है, जिनकी साजिशों से कभी भारत गुलाम बना था और स्वतंत्रता संघर्ष में सवर्णों को भारी कीमत चुकानी पड़ी थी।

बताया जाता है कि गुलाम भारत की राजनीति में जब अंग्रेज-अंग्रेजियत विरोधी मुहिम तेज हुई, तो चालाकी से उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम विमर्श तेज कर दिया। परिमाण स्वरूप देश और समाज दोनों टूटा। इसी क्रम में जब हिन्दू, मुसलमानों के खिलाफ एकजुट होने लगे तो चतुर अंग्रेजों ने 1933 में जातीय जनगणना करवाकर दलित, पिछड़ा और सवर्ण विमर्श जैसी हिन्दू विरोधी सियासत शुरू की, जिससे सामाजिक विखंडन की गति तेज हुई। तब उनकी इस फूट डालो, शासन करो वाली खलनीति का गुप्त एजेंडा था ब्रिटिश प्रभाव ईस्ट इंडिया कम्पनी को मजबूती देने वाले जमींदारों को शह देना और उनके खिलाफ देशवासियों को गुप्त मदद देकर भड़काने वाले राष्ट्रवादी जमींदारों व उनके सिपहसलारों को कमजोर करना। क्योंकि 1857 के बाद ब्रिटिश अधिकारी ब्रितानी हितों को लेकर सजग हो चुके थे। 

लेकिन इसी दौर में जब 1917 की रूसी क्रांति के बाद  भारत में भी पूंजीवादी ताकतों के खिलाफ किसान-मजदूर-कामगार समर्थक वर्गवादी वामपंथी राजनीति तेज हुई तो अंग्रेजों के समक्ष दोहरी चुनौती आ गई। इसलिए उन्होंने पुनः हिंदुओं में जातीय विभाजन तथा मुस्लिमों में साम्प्रदायिक विभाजन को और गहरा किया। लेकिन जब सजग भारतीय बिखरने के बजाए जनविरोधी पूंजीवादी ताकतों के खिलाफ एकजुटता दिखाई तो उन्होंने निर्वाचन क्षेत्रों, शिक्षा और नौकरियों में आरक्षण का राग अलापकर मुसलमानों और दलितों को अपने खेमें में रखकर आजादी के आंदोलन को कमजोर किया।

इसी बीच औद्योगिक क्रांति और शैक्षणिक बदलाव जनित विस्तार के फलस्वरूप भूमि जमींदारी का स्वरूप परिवर्तित होकर पूंजीवादी कम्पनी राज की तरफ भी कुछ कुछ शिफ्ट होने लगा था। इसी को हतोत्साहित करने के लिए अंग्रेजों ने हिंदू-मुस्लिम समाज को तोड़े रखने के निमित्त हिंदू और सवर्ण विरोधी कानूनी स्टैंड लेकर व लाभान्वित वर्गों के मजबूत नेताओं को तोड़कर अपनी ओर करना शुरू कर दिया। लेकिन तबतक भारतीय राजनेता भी परिपक्व व समझौतावादी होकर अपने राष्ट्रीय आजादी जैसे अकाट्य लक्ष्यों के प्रति पूरी निष्ठा के साथ समर्पित होकर एकजुटता दिखा रहे। 

इससे राष्ट्रवादी समाज एकजुट रहा और दो राष्ट्रों के सिद्धांतों के आधार पर देश विभाजन तक कबूल कर लिया, लेकिन अंग्रेजों को भारत से हटाकर ही दम लिया। इसी कड़ी में पुष्पित पल्लवित हुए नौकरशाहों, न्यायविदों, उद्योगपतियों और राजनेताओं ने अपने अथक संघर्षों की प्रशासनिक कीमत वसूलने की सियासत शुरू कर दी और बजाप्ता उन्हें संवैधानिक व कानूनी रूप दिया। उसी दौर में जिन्ना को पाकिस्तान, अंबेडकर को हिंदुस्तान में दलित-आदिवासी राज और नेहरू को सत्तागत जनतांत्रिक नेतृत्व मिला। 

चूंकि लोकतांत्रिक भारत में जवाहर लाल नेहरू को क्षणभंगुर सत्ता मिली थी और सरदार पटेल की सियासी चुनौतियों का ख़तरा उन्हें था। इसलिए उन्होंने इसे स्थायित्व देने की मंशा से सियासी तिकड़म शुरू किया और दलित-मुस्लिम वोटों की महत्ता के दृष्टिगत डॉ अंबेडकर को आगे करके जो स्थायी संवैधानिक षडयंत्र रचा, उसकी राजनीतिक कीमत आज का सवर्ण समुदाय चुका रहा है। यह दुर्भाग्यपूर्ण रहा कि अपने परिवार की राजनीतिक सत्ता सदैव कायम रखने के लिए उन्होंने आजाद भारत में भी फूट डालो और शासन करो जैसी समाज विरोधी नीतियों का अनुसरण लिया और प्रशासनिक अदूरदर्शिता दिखाई।

आजादी के तत्काल बाद यानी जवाहरलाल के ही दौर में जब श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने उन्हें नीतिगत टक्कर दी तो उन्हें रास्ते से हटवा दिया गया, जैसा कि आरोप लगे थे। हालांकि उनके द्वारा स्थापित जनसंघ की कब्र पर खड़ी भाजपा ने जो सियासी पैंतरे दिखाई, उसने आधुनिक भारत के निर्माता जवाहरलाल नेहरू और उनकी बेटी पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के सभी राजनीतिक पापों को अवधारणात्मक तौर पर धो दिया। आलम यह है कि भाजपा की मुस्लिम विरोधी हिंदुत्व की सियासत अब पुनः सवर्ण विरोध की धुरी पर लौट आई है।

कहना न होगा कि भाजपा पर हिंदुत्व को छलावा बताकर दलित-ओबीसी विमर्श में फंसने का आरोप विपक्षी दलों द्वारा लगातार उठाया जा रहा है, खासकर 2024 के लोकसभा चुनाव के बाद से ही यह बहस जातिगत जनगणना, आरक्षण और सामाजिक न्याय के इर्द-गिर्द घूम रही है, क्योंकि कांग्रेस के नेतृत्व वाले इंडिया गठबंधन ने भाजपा के निजी बहुमत वाले सपने को चूर चूर कर दिया। समझा जाता है कि 2024 लोकसभा चुनावों में भाजपा को दलित वोटों में 5% की गिरावट का सामना करना पड़ा, जहां कई दलित मतदाता इंडिया गठबंधन (INDIA) की ओर खिसके।

 लिहाजा यूपी और महाराष्ट्र जैसे राज्यों में भाजपा की आरक्षित सीटें घटीं, क्योंकि विपक्ष ने इसे संविधान बदलने और आरक्षण खत्म करने के डर से जोड़ा। मसलन, हिंदुत्व की आलोचना यह है कि यह ऊपरी जातियों को फायदा पहुंचाता है, जबकि दलित-ओबीसी की असल समस्याओं को नजरअंदाज करता है। इसलिए अब भाजपा ने यूजीसी बिल को अपना सियासी ढाल बनाई, जिसपर सुप्रीम कोर्ट ने अगले आदेश तक रोक लगा दी है।

इससे पहले के प्रमुख विवाद को भी समझना होगा, जब भाजपा को दलित-ओबीसी नेताओं के दबाव में जातिगत जनगणना पर भी यू-टर्न लेना पड़ा। अब भाजपा ने लंबे विरोध के बाद 2025 में जाति गणना को मंजूरी दी, जिसे विपक्ष ने अपनी जीत बताया। यह हिंदुत्व के ‘एक हिंदू पहचान’ के विचार से टकराता है। वहीं, 2026 में विश्व विद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के नए नियमों (जातिगत भेदभाव रोकने वाले) पर भाजपा के सवर्ण नेताओं का विरोध सामने आया, जिसे दलित-ओबीसी खुशहाली का कदम बताया गया। इस पर विपक्ष चुप है, क्योंकि राष्ट्रवादी भाजपा अब अपने ही सवर्ण विरोधी जाल में फंसी दिखाई देती है।

राष्ट्रीय हित में मेरा स्पष्ट मानना है कि कानून अनुपालन की इकाई व्यक्ति की जगह परिवार, जाति, सम्प्रदाय और भाषा-क्षेत्र को बना देने से ही ये विरोधाभास सामने आए हैं। आज जिस तरह से हिंदुत्व बनाम जाति और सवर्ण, ओबीसी, दलित लाभ की बहस छिड़ी हुई है, उससे आरएसएस भी असहज है, भाजपा के सवर्ण नेता भी असमंजस में हैं, क्योंकि मोदी-शाह के चक्रब्यूह में सभी महारथी घिरे हुए हैं।

यह ठीक है कि भाजपा अपना दलित-ओबीसी आउटरीच बढ़ा रही है, लेकिन 2026 चुनावों से पहले जो यह सवर्ण विरोधी यूजीसी विमर्श तेज है। उससे बिहार, यूपी में ओबीसी-दलित वोटबैंक के साथ-साथ सवर्ण वोट बैंक में भी बिखराव की आशंका प्रबल है। 

सवाल है कि कास्ट सेंसस भाजपा के यू-टर्न के पीछे क्या कारण थे? तो जवाब होगा कि भाजपा का जातिगत जनगणना पर यू-टर्न मुख्य रूप से 2024 लोकसभा चुनावों में ओबीसी-दलित वोटों के नुकसान से प्रेरित है, जहां पार्टी को यूपी और बिहार जैसे राज्यों में भारी झटका लगा। वहीं, विपक्ष के सामाजिक न्याय के दबाव और बिहार चुनावों से पहले मुद्दे को निष्क्रिय करने की रणनीति ने भी इसमें भूमिका निभाई, जिसका सियासी लाभ भी उसे मिला। 

भाजपा विरोधी विपक्ष, खासकर कांग्रेस और क्षेत्रीय दलों ने जाति जनगणना को आरक्षण वृद्धि से जोड़कर ओबीसी वोटबैंक पर सेंध लगाई, जिससे भाजपा को 2024 में ऊपरी ओबीसी में 4% और निचली ओबीसी में 7% वोट गंवाने पड़े। वहीं, बिहार में नीतीश कुमार के जातिगत सर्वेक्षण ने राजनीतिक क्रेडिट वॉर छेड़ दिया, जबकि यूपी में अखिलेश की पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक आधारित पीडीए (PDA) रणनीति ने हिंदुत्व को पीछे छोड़ दिया। लिहाजा भाजपा ने इसे विपक्ष के मुख्य हथियार को भंग करने के लिए अपनाया। क्योंकि आरएसएस ने पहले ही जाति गणना को स्वीकार किया था, जो भाजपा के लिए हरी झंडी बने। 

चूंकि कांग्रेस नेता राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा, संविधान बचाओ जैसे नारे और सेक्युलर सियासत वाले गठबंधन का असर ऐसा हुआ कि 2024 के लोकसभा चुनाव में सिर्फ यूपी में भाजपा को 28 सीटें गंवानी पड़ी। इसलिए उन मुद्दों को निष्क्रिय करने के लिए भाजपा को सवर्ण विरोधी चालें चलनी पड़ी। हालांकि, इसकी छटपटाहट बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह द्वारा भाजपा में बढ़ाए गए जनाधार विहीन ओबीसी नेताओं को एक अरसे से थी, जो अब जाकर पूरी तो हुई। बदलते राजनीतिक परिदृश्य में भले ही भाजपा का कदम मास्टरस्ट्रोक माना गया, लेकिन पार्टी के अंदर आरएसएस और हिंदुत्व गुटों में दरारें बढ़ीं। 

फिर भी आरएसएस ने जातिगत जनगणना का खुला समर्थन सितंबर 2024 में किया था। 2 सितंबर 2024 को केरल के पलक्कड़ में आयोजित तीन दिवसीय अखिल भारतीय समन्वय बैठक के अंतिम दिन आरएसएस के प्रचार प्रमुख सुनील आंबेकर ने प्रेस को संबोधित करते हुए कहा कि संगठन जातिगत जनगणना के पक्ष में है, बशर्ते इसका उपयोग राजनीतिक लाभ या सामाजिक विघटन के लिए न हो। उन्होंने एससी/एसटी (SC/ST) के उप-वर्गीकरण पर भी समुदायों की सहमति पर जोर दिया।

 समझा जाता है कि यह बयान 2024 लोकसभा चुनावों के बाद विपक्ष के दबाव के बीच आया, जब भाजपा को ओबीसी-दलित वोटों में नुकसान हुआ। ऐसे में जिस आरएसएस ने पहले जाति-विहीन समाज पर जोर दिया, लेकिन कल्याणकारी उद्देश्यों के लिए डेटा उपयोग को स्वीकार किया, इससे भाजपा को 2025 के यू-टर्न के लिए हरी झंडी मिली। स्वाभाविक है कि सामाजिक विद्वेष बढ़ेगा और हिंदुत्व अभिमन्यु की तरह पिटेगा।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

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