–सुरेश गोयल धूप वाला…….हिसार, हरियाणा.

गत दिवस सुबह एक टीवी प्रसारण में देश के एक चर्चित बाबा को भूत-प्रेत और आत्माएँ भगाने का दावा करते देखा गया। मंच पर बैठे भयभीत लोग, तेज़ ढोल-नगाड़े, मंत्रोच्चार, चीख-पुकार और बाबा के तथाकथित चमत्कार—पूरा दृश्य किसी टीवी धारावाहिक या सुनियोजित नाटक से कम नहीं था। कैमरों की रोशनी में डर और चमत्कार का यह प्रदर्शन भले ही टीआरपी के लिए मनोरंजन हो, लेकिन समाज के लिए यह बेहद चिंताजनक संकेत है।
भक्तों की आस्था अपनी जगह है, पर सवाल यह है कि क्या इस तरह के अंधविश्वास को खुलेआम बढ़ावा देना भारतीय संस्कृति, विवेक और वैज्ञानिक सोच के अनुरूप है?
भारतीय सनातन परंपरा में भूत-प्रेत, ओपरी-पराई जैसी धारणाएँ कभी भी धर्म का मूल आधार नहीं रहीं। वेदों, उपनिषदों और श्रीमद्भगवद्गीता में मनुष्य को विवेक, ज्ञान, आत्मचिंतन और कर्म के मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी गई है। हमारे ऋषि-मुनियों ने भय और अज्ञान से मुक्ति को ही मोक्ष का मार्ग बताया। कहीं भी ऐसी डरावनी और असत्य कथाओं का समर्थन नहीं मिलता, जो मनुष्य को कमजोर, असहाय और पराधीन बना दें।
इसके बावजूद आज कुछ तथाकथित बाबा और तांत्रिक लोगों की बीमारी, मानसिक समस्याओं और व्यक्तिगत संकटों को भूत-प्रेत का नाम देकर भय का व्यापार कर रहे हैं। जिन लोगों को चिकित्सकीय या मनोवैज्ञानिक सहायता की ज़रूरत होती है, उन्हें ‘साया’ या ‘प्रेत बाधा’ बताकर और अधिक मानसिक यातना में झोंक दिया जाता है। मिर्गी, अवसाद, चिंता, हिस्टीरिया जैसे रोगों को भूत-प्रेत से जोड़ना न केवल अज्ञान है, बल्कि अमानवीय अपराध भी है।

इन तथाकथित चमत्कारों के पीछे प्रायः एक सुनियोजित नाटक होता है—पहले डर पैदा किया जाता है, फिर उसी डर को दूर करने का ढोंग रचकर बाबा ‘महान’ बन जाता है। टीवी चैनलों पर ऐसे कार्यक्रमों का प्रसारण इस समस्या को और गंभीर बना देता है, क्योंकि इससे इन ढोंगियों को सामाजिक वैधता और लोकप्रियता मिल जाती है। जब मीडिया खुद अंधविश्वास को मनोरंजन बनाकर परोसने लगे, तो विवेक और विज्ञान की आवाज़ कौन उठाएगा?
सबसे दुखद पहलू यह है कि पढ़े-लिखे और आधुनिक कहे जाने वाले लोग भी संकट के समय तर्क और विज्ञान छोड़कर इन ढोंगियों की शरण में चले जाते हैं। यह दर्शाता है कि हमारी शिक्षा व्यवस्था ने डिग्रियाँ तो दी हैं, लेकिन वैज्ञानिक दृष्टिकोण और विवेक विकसित करने में हम अब भी असफल हैं।
आज ज़रूरत है कि ऐसे ढोंगियों का सार्वजनिक रूप से फंडाफोड़ किया जाए। सरकार को अंधविश्वास फैलाने वालों पर सख्त कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए। कई राज्यों में अंधश्रद्धा विरोधी कानून मौजूद हैं, लेकिन उनका प्रभावी क्रियान्वयन अब भी ढीला है। पुलिस और प्रशासन को ऐसे मामलों में सक्रिय भूमिका निभानी होगी।
मीडिया की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। टीआरपी के लालच में अंधविश्वास परोसने वाले कार्यक्रमों पर रोक लगनी चाहिए। उनकी जगह वैज्ञानिक कार्यक्रम, तर्कपूर्ण बहसें और जन-जागरूकता अभियान चलाए जाने चाहिए। विद्यालयों और महाविद्यालयों में भी वैज्ञानिक सोच और तर्कशक्ति को जीवन से जोड़ना होगा।
भूत-प्रेत की यह उछलकूद दरअसल एक महा नाटक है—धर्म नहीं, संस्कृति नहीं, आध्यात्म नहीं; यह सिर्फ भय का व्यापार है। भारतीय समाज को डर नहीं, विवेक चाहिए; अंधविश्वास नहीं, आत्मविश्वास चाहिए।
समय आ गया है कि हम अपने ऋषि-मुनियों की उस परंपरा को फिर से जीवित करें, जो अज्ञान से नहीं, ज्ञान से लड़ना सिखाती है। भूत-प्रेत के नाम पर चल रहे इस महा नाटक को बंद करना केवल सरकार या मीडिया की नहीं, बल्कि हम सभी की सामूहिक जिम्मेदारी है। जागरूक नागरिक ही समाज को इस अंधविश्वास के अंधकार से बाहर निकाल सकते हैं।







