हरियाणा में लोकतांत्रिक जागरूकता नहीं, मुख्यमंत्री जन्मदिन का उत्सव छाया**
समाजसेवी इंजीनियर गुरिंदरजीत सिंह

चंडीगढ़। 25 जनवरी—राष्ट्रीय मतदाता दिवस। देशभर में लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत मतदाता को सम्मान देने और उसके अधिकारों के प्रति जागरूकता फैलाने का दिन। लेकिन हरियाणा में यह दिवस लोकतांत्रिक चेतना का नहीं, बल्कि मुख्यमंत्री के जन्मदिन के प्रचार का दिन बनकर रह गया। मतदाता दिवस के अपेक्षित सरकारी कार्यक्रम, संदेश और जन-जागरूकता गतिविधियाँ सीमित रहीं, जबकि जन्मदिन से जुड़े पोस्टर, विज्ञापन और आयोजनों को व्यापक महत्व मिलता दिखाई दिया।
राष्ट्रीय मतदाता दिवस का उद्देश्य नागरिकों को यह याद दिलाना है कि लोकतंत्र की नींव वोट से टिकी है और सत्ता जनता की इच्छा से संचालित होती है। चुनाव आयोग की मंशा के अनुरूप इस दिन शपथ कार्यक्रम, जागरूकता अभियान और लोकतांत्रिक मूल्यों पर संवाद होने चाहिए थे। परंतु राज्य में लोकतंत्र का यह पर्व प्रचार-प्रधान राजनीति की भेंट चढ़ता नजर आया।
लोकतंत्र या व्यक्तिपूजा?
संवैधानिक मामलों के जानकारों का कहना है कि मतदाता दिवस जैसे राष्ट्रीय महत्व के अवसर पर किसी निर्वाचित पदाधिकारी के व्यक्तिगत उत्सव को प्राथमिकता देना लोकतांत्रिक नैतिकता के विपरीत है। इससे यह संदेश जाता है कि सत्ता मतदाताओं के अधिकारों से नहीं, बल्कि नेताओं की छवि-निर्माण राजनीति से संचालित हो रही है।
सरकारी तंत्र के उपयोग पर सवाल
विपक्षी दलों और नागरिक संगठनों ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री के जन्मदिन के प्रचार में सरकारी मशीनरी और सार्वजनिक स्थानों का खुलकर उपयोग किया गया। यदि ऐसा हुआ है, तो यह लोक प्रशासन की निष्पक्षता और सार्वजनिक संसाधनों के सदुपयोग पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। लोकतंत्र में राज्य किसी व्यक्ति का प्रचार मंच नहीं हो सकता।
मतदाता दिवस का मौन संदेश
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि जब मतदाता दिवस जैसे अवसर को हाशिये पर धकेल दिया जाता है, तो यह लोकतंत्र के लिए खतरनाक संकेत है। इससे मतदाता स्वयं को केवल चुनाव के समय याद की जाने वाली इकाई समझने लगता है, न कि शासन का वास्तविक स्रोत।
निष्कर्ष
राष्ट्रीय मतदाता दिवस केवल औपचारिक तिथि नहीं, बल्कि सत्ता को यह याद दिलाने का अवसर है कि लोकतंत्र नेताओं के जन्मदिनों से नहीं, बल्कि मतदाताओं के विश्वास से चलता है। जब यह संतुलन बिगड़ता है, तो लोकतंत्र कमजोर होता है।







