तेलंगाना में आवारा कुत्तों की हत्याएं, कानून, करुणा और भारतीय लोकतंत्र की आत्मा पर सवाल
सभ्यता की पहचान यह नहीं होती कि वह ताकतवर को कैसे बचाती है, बल्कि यह कि वह सबसे कमजोर के साथ कैसा व्यवहार करती है।
— एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी

तेलंगाना में आवारा कुत्तों की सामूहिक हत्याओं की घटनाएं केवल पशु क्रूरता तक सीमित नहीं हैं, बल्कि यह भारतीय समाज में बढ़ती असहिष्णुता, प्रशासनिक विफलता और संवेदनहीनता का भयावह संकेत हैं। यह घटनाएं हमारे कानून, करुणा और लोकतांत्रिक मूल्यों—तीनों को कठघरे में खड़ा करती हैं।
जीवन का सम्मान: भारतीय दर्शन की मूल आत्मा
वैश्विक स्तर पर ईश्वर, अल्लाह या गॉड—नाम भिन्न हो सकते हैं, पर सृष्टि का मूल भाव एक है—जीवन। भारतीय दर्शन 84 लाख योनियों की बात करता है, जहां हर जीव का अपना उद्देश्य और संतुलन है।
मनुष्य को सबसे बुद्धिजीवी प्राणी इसलिए माना गया, क्योंकि उसे करुणा, विवेक और नैतिक निर्णय की क्षमता मिली। लेकिन जब वही मनुष्य भय, सुविधा या स्वार्थ में बेज़ुबानों का जीवन छीनने लगे, तो यह केवल कानून का उल्लंघन नहीं, बल्कि मानवता का पतन बन जाता है।
तेलंगाना में हत्याओं का भयावह सच

जनवरी 2026 से अब तक तेलंगाना में 500 से अधिक आवारा कुत्तों की हत्या की खबरें सामने आ चुकी हैं।
ताज़ा मामला याचाराम गांव का है, जहां करीब 100 कुत्तों को ज़हर देकर मार दिया गया। पशु चिकित्सा विशेषज्ञों ने स्ट्राइकिन जैसे घातक न्यूरोटॉक्सिन के इस्तेमाल की आशंका जताई है—जो कुछ ही मिनटों में भीषण पीड़ा, ऐंठन और श्वसन विफलता से मौत का कारण बनता है।
यह तरीका न केवल अमानवीय, बल्कि पूरी तरह गैरकानूनी और आपराधिक है।
कानून क्या कहता है?
पशु क्रूरता निवारण अधिनियम, 1960 के तहत स्ट्राइकिन का उपयोग पूर्णतः प्रतिबंधित है।
किसी भी पंचायत, सरपंच या स्थानीय निकाय को स्वस्थ कुत्तों को मारने का अधिकार नहीं है। केवल गंभीर रूप से बीमार या रेबीज-ग्रस्त कुत्तों को, वह भी पशु चिकित्सक की सलाह से, मानवीय इच्छामृत्यु दी जा सकती है।
इसके अलावा हर हत्या दंडनीय अपराध है।
बच्चे पर हमला: भय बनाम समाधान की राजनीति
हैदराबाद के सुराराम क्षेत्र में पांच वर्षीय बच्चे पर कुत्तों का हमला गंभीर और चिंताजनक घटना है।
लेकिन सवाल यह है—
क्या एक घटना का समाधान 100 कुत्तों की हत्या है?
क्या भय का जवाब ज़हर और हिंसा हो सकता है?
सभ्य समाज में समाधान भावनात्मक उन्माद से नहीं, बल्कि वैज्ञानिक, कानूनी और मानवीय नीति से निकलता है।
सुप्रीम कोर्ट की सख़्त टिप्पणी
13 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने साफ कहा कि वह राज्यों की जवाबदेही तय करेगा।
न्यायालय ने माना कि पिछले पांच वर्षों में एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) नियमों का बेहद खराब क्रियान्वयन हुआ है।
अर्थात समस्या कुत्तों की नहीं, बल्कि शासन की असफलता की है।
याचाराम मामला: लोकतंत्र के नाम पर हिंसा
आरोप है कि याचाराम गांव में सरपंच ने चुनावी वादे निभाने के लिए कुत्तों को जहर दिलवाया।
यदि जनप्रतिनिधि ही कानून तोड़ेंगे, तो लोकतंत्र की आत्मा कैसे बचेगी?
पुलिस द्वारा केस दर्ज होना स्वागतयोग्य है, लेकिन असली सवाल यह है—
क्या यह कार्रवाई मिसाल बनेगी या केवल औपचारिकता रह जाएगी?
एकमात्र समाधान: एनिमल बर्थ कंट्रोल
सुप्रीम कोर्ट और केंद्र सरकार दोनों स्पष्ट कर चुके हैं कि एनिमल बर्थ कंट्रोल (ABC) ही एकमात्र समाधान है

- नसबंदी
- रेबीज टीकाकरण
- और कुत्तों को उसी इलाके में वापस छोड़ना
यह मॉडल न केवल कुत्तों की संख्या नियंत्रित करता है, बल्कि मानव-पशु संघर्ष को भी कम करता है। दुनिया के कई देशों में यह सफलतापूर्वक लागू है।
निष्कर्ष
आवारा कुत्तों की हत्या कोई समाधान नहीं, बल्कि सभ्यता की हार है।
आज सवाल कुत्तों का नहीं—
हम किस तरह का समाज बनना चाहते हैं?
-संकलनकर्ता लेखक-क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं गोंदिया महाराष्ट्र







