कांग्रेस संगठन, गुटबाज़ी और ‘अदृश्य संरक्षण’ की कहानी**
गुरुग्राम। कुमारी सैलजा फोटो विवाद को लेकर कांग्रेस संगठन के भीतर जो कुछ दिख रहा है, वह केवल सतह है। असली कहानी उससे कहीं गहरी है—जहां नोटिस, कार्रवाई और माफी से ज्यादा अहम हैं गुटीय समीकरण, शक्ति संतुलन और अदृश्य संरक्षण।
नोटिस के पीछे सहमति, कार्रवाई पर असहमति
पार्टी सूत्रों के अनुसार, दोनों जिला अध्यक्षों द्वारा पी. एल. कटारिया को संयुक्त नोटिस जारी करने से पहले संगठन में लंबी चर्चा हुई थी।
उस वक्त लगभग सभी गुट इस बात पर सहमत थे कि सैलजा जैसे वरिष्ठ नेता से जुड़ा विवाद नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
लेकिन जैसे ही नोटिस जारी हुआ, कार्रवाई के सवाल पर मतभेद उभर आए।
एक वरिष्ठ कांग्रेसी नेता के अनुसार— “नोटिस देना आसान था, लेकिन कार्रवाई करते ही कई लोग असहज हो गए।”
कटारिया की खामोशी : बेपरवाही नहीं, रणनीति
सूत्रों की मानें तो पी. एल. कटारिया का नोटिस का जवाब न देना कोई भूल नहीं, बल्कि सोची-समझी रणनीति है।
कटारिया को यह भरोसा है कि—
- मामला यदि ऊपर गया, तो वह जिला स्तर पर ही ठंडा कर दिया जाएगा,
- और कोई भी अध्यक्ष अकेले दम पर उन पर कार्रवाई करने का जोखिम नहीं उठाएगा।
यही कारण है कि समय बीतने के बावजूद संगठन में बेचैनी है, लेकिन फैसला नहीं।
माफी वीडियो का दबाव : संगठन नहीं, व्यक्ति चला रहे खेल?
इनसाइड जानकारी के मुताबिक, पंकज डावर की शिकायत वापस लेने के बदले माफी का वीडियो सार्वजनिक करवाने का प्रस्ताव कुछ नेताओं ने “समाधान” के तौर पर आगे बढ़ाया था।
इस प्रस्ताव को लेकर पार्टी में ही दो राय बन गई—
- एक खेमा इसे अनुशासनात्मक समाधान मान रहा था,
- जबकि दूसरा खेमा इसे अपमानजनक और दबाव की राजनीति बता रहा था।
कटारिया का इनकार इसी बिंदु पर पार्टी को दो हिस्सों में बांटता दिखा।
थाने की फाइल क्यों नहीं बढ़ी?
सूत्र बताते हैं कि शिवाजी नगर थाने में दी गई शिकायत पर शुरुआती स्तर पर सक्रियता दिखाई गई थी,
लेकिन जैसे ही यह स्पष्ट हुआ कि मामला राजनीतिक रूप से संवेदनशील है, फाइल की गति धीमी पड़ गई।
एक पदाधिकारी का कहना है—“कानूनी कार्रवाई तभी तेज होती है, जब राजनीतिक संकेत साफ हों।”
जिला अध्यक्ष असमंजस में क्यों हैं?
इनसाइड सर्किल में यह भी चर्चा है कि जिला अध्यक्ष—
- एक तरफ कार्रवाई न करने पर कार्यकर्ताओं के गुस्से का सामना कर रहे हैं,
- तो दूसरी तरफ कार्रवाई करने पर ऊपर से सवाल और असहयोग का डर है।
यही दुविधा उन्हें निर्णय से दूर रखे हुए है।
शीर्ष नेतृत्व तक संदेश पहुंच चुका है
सूत्रों के अनुसार, यह पूरा मामला अब प्रदेश स्तर के कुछ वरिष्ठ नेताओं तक पहुंच चुका है।
लेकिन वहां भी सवाल यही है—
“क्या यह विवाद संगठन को मजबूत करेगा या और कमजोर?”
इसी सोच के चलते फिलहाल टकराव से बचने की रणनीति अपनाई जा रही है।
इनसाइड निष्कर्ष : कार्रवाई नहीं, प्रतीक्षा की राजनीति
इस पूरी इनसाइड स्टोरी का निष्कर्ष यही है कि—
- कांग्रेस इस समय कार्रवाई नहीं, प्रतीक्षा की राजनीति कर रही है,
- ताकि मामला अपने आप ठंडा पड़ जाए।
लेकिन पार्टी के भीतर ही चेतावनी दी जा रही है कि यदि ऐसा हुआ, तो संदेश साफ जाएगा— संगठन के नियम कमजोर हैं और प्रभावशाली नेता उनसे ऊपर।







