सनातन और आधुनिक विचारधाराएँ: मानव चेतना की खोज का विमर्श

👇समाचार सुनने के लिए यहां क्लिक करें

— सुरेश गोयल ‘धूप वाला’

मनुष्य और चेतना का प्रश्न

सृष्टि में असंख्य जीव हैं, किंतु मनुष्य की विशिष्टता उसकी शारीरिक संरचना में नहीं, बल्कि उसकी चेतना, विवेक और प्रश्न करने की क्षमता में निहित है। मनुष्य केवल जीवित नहीं रहता, बल्कि जीवन के अर्थ, उद्देश्य और नैतिकता पर विचार करता है। यही बौद्धिक जिज्ञासा मानव सभ्यता के विकास की आधारशिला रही है।

सनातन परंपरा: धर्म नहीं, जीवन-दृष्टि

मानव इतिहास में चेतना और आत्मबोध की सबसे दीर्घ और सतत परंपरा भारतीय दर्शन में दिखाई देती है, जिसे सनातन कहा गया। सनातन किसी एक काल, ग्रंथ या व्यक्ति से बंधा नहीं है। यह सहस्राब्दियों के अनुभव, तर्क, साधना और संवाद से विकसित एक जीवन-पद्धति है।

सनातन परंपरा में धर्म का आशय भय या अनुशासन थोपना नहीं, बल्कि विवेक को जाग्रत करना है। सत्य, करुणा, अहिंसा, सहिष्णुता और कर्तव्य जैसे मूल्य यहाँ आदेश नहीं, बल्कि जीवन की स्वाभाविक आवश्यकताएँ हैं। यही कारण है कि इसमें आस्तिक और नास्तिक, ज्ञान, कर्म और भक्ति—तीनों मार्गों को स्थान मिला। यह बहुलता इसकी मूल शक्ति है।

आधुनिक विचारधाराएँ और सीमाएँ

आधुनिक काल में विकसित कुछ वैचारिक प्रणालियाँ मानव जीवन को एक निश्चित ढांचे में समझने का प्रयास करती हैं। मार्क्सवादी कम्युनिज़्म इसका उदाहरण है, जिसने धर्म को सामाजिक शोषण का उपकरण माना। कार्ल मार्क्स का यह दृष्टिकोण कई देशों में राज्य-नीति बना, जहाँ धार्मिक संस्थाओं को नियंत्रित या प्रतिबंधित किया गया।

हालाँकि, इतिहास यह भी दर्शाता है कि किसी समाज से आध्यात्मिक चेतना को पूर्णतः अलग नहीं किया जा सकता। सोवियत संघ के विघटन और चीन सहित अन्य देशों में धार्मिक आस्थाओं की निरंतरता यह संकेत देती है कि आध्यात्मिकता मानव स्वभाव का हिस्सा है—इसे दबाया जा सकता है, समाप्त नहीं।

संगठित मजहब और ऐतिहासिक यथार्थ

इस्लाम और ईसाई धर्म जैसे संगठित धर्मों ने अपने-अपने समाजों को नैतिक अनुशासन और सामाजिक ढांचा प्रदान किया। साथ ही, इनके इतिहास में सत्ता, कट्टरता और संघर्ष से जुड़े प्रसंग भी रहे हैं, जिन्हें नकारा नहीं जा सकता।

इसके विपरीत, सनातन परंपरा का प्रसार किसी राजनीतिक शक्ति या सैन्य बल से नहीं, बल्कि विचार, संवाद और आत्मानुभूति के माध्यम से हुआ। इसकी निरंतरता का आधार यही लचीलापन और आत्मालोचनात्मक स्वभाव रहा है।

प्रश्न करने की परंपरा

सनातन परंपरा की सबसे बड़ी विशेषता प्रश्नों से उसका संवाद है। नचिकेता का यम से प्रश्न, बुद्ध का सामाजिक व्यवस्था को चुनौती देना और शंकराचार्य का तर्कपूर्ण दर्शन—ये सभी उदाहरण बताते हैं कि यहाँ प्रश्न निषिद्ध नहीं, बल्कि आवश्यक हैं।

विचारधाराएँ प्रायः अंतिम सत्य का दावा करती हैं, जबकि सनातन परंपरा सत्य को खोज की सतत प्रक्रिया मानती है। जहाँ प्रश्न जीवित रहते हैं, वहाँ विचार विकसित होते हैं; और जहाँ प्रश्न समाप्त हो जाते हैं, वहाँ जड़ता जन्म लेती है।

वर्तमान संदर्भ और निष्कर्ष

आज जब विश्व वैचारिक ध्रुवीकरण, कट्टरता और असहिष्णुता के दौर से गुजर रहा है, तब यह प्रश्न और भी प्रासंगिक हो जाता है कि मानव कल्याण का मार्ग क्या हो। अनुभव बताता है कि समाधान किसी कठोर विचारधारा में नहीं, बल्कि उस जीवन-दृष्टि में है जो व्यक्ति को सोचने, चुनने और आत्मबोध की स्वतंत्रता देती है।

सनातन इसी स्वतंत्र चेतना का प्रतीक है—न अतीत की जड़ता, न भविष्य का भ्रम, बल्कि निरंतर प्रवाह और आत्मचिंतन की परंपरा।

Bharat Sarathi
Author: Bharat Sarathi

Leave a Comment

और पढ़ें