-एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानीं

भारतीय रुपया (INR) भारत की आर्थिक नीतियों, विकास दर, विदेशी व्यापार, वैश्विक वित्तीय उतार-चढ़ाव और भू-राजनीतिक घटनाओं से लगातार प्रभावित होता रहा है। डॉलर-आधारित वैश्विक व्यापार संरचना में रुपये की भूमिका बढ़ी है, लेकिन अभी यह स्थिति इतनी मजबूत नहीं कि रुपये को विश्व व्यापार की प्रमुख मुद्राओं में शामिल किया जा सके। एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी (गोंदिया, महाराष्ट्र) मानते हैं कि वर्तमान दौर में भारतीय रुपया स्थिर भी है और चुनौतीपूर्ण भी।
वैश्विक मुद्रा परिदृश्य और रुपये की मौजूदा स्थिति
दुनिया के 195 देशों में अलग-अलग मुद्राओं के बीच डॉलर, यूरो, पाउंड, येन, दीनार और रियाल जैसी मुद्राएँ सबसे अधिक प्रभावशाली हैं। वैश्विक विनिमय प्रणाली में मुद्रा का मूल्य प्रतिदिन बदलता है और यह राजनीतिक, आर्थिक व बाज़ार स्थितियों पर निर्भर करता है। पिछले सप्ताह डॉलर–रुपया विनिमय दर ₹89.06 से ₹89.75 के दायरे में उतार-चढ़ाव करती रही, जो यह दर्शाता है कि बाहरी दबाव रुपये की स्थिरता को लगातार प्रभावित करते हैं।
भारत का वित्तीय तंत्र मजबूत है, विदेशी मुद्रा भंडार विश्व के शीर्ष देशों में हैं और आर्थिक विकास दर वैश्विक स्तर पर सबसे तेज़ है, इसलिए रुपये को एक स्थिर मुद्रा माना जाने लगा है। लेकिन डॉलर की मजबूती, महँगा क्रूड ऑयल और विदेशी निवेश में उतार-चढ़ाव रुपये को निरंतर चुनौतियों में रखते हैं।
वास्तविक प्रभावी विनिमय दर (REER) का आकलन
नाममात्र विनिमय दर (USD/INR) भले रुपये की कमजोरी दिखाती हो, लेकिन REER के आधार पर भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता उतनी प्रभावित नहीं होती।
इसके प्रमुख कारण हैं—
- भारत का विस्तृत होता निर्यात बेस
- सेवाक्षेत्र की वैश्विक प्रतिष्ठा
- स्थिर आंतरिक बाज़ार
- नियंत्रित मुद्रास्फीति
इसलिए रुपये की वास्तविक स्थिति उतनी कमजोर नहीं जितनी डॉलर के मुकाबले देखकर प्रतीत होती है।
अन्य वैश्विक मुद्राओं के मुकाबले रुपये का मूल्यांकन
रुपया अधिकांश विकसित देशों की मुद्राओं की तुलना में कमजोर है—
- डॉलर के मुकाबले लगभग ₹89–90
- यूरो, पाउंड, येन—सभी के मुकाबले मूल्य घटा
लेकिन यह कमजोरी हमेशा नकारात्मक संकेत नहीं होती; कई देश प्रतिस्पर्धात्मक बने रहने के लिए जानबूझकर अपनी मुद्रा को कमजोर रखते हैं। भारत के लिए स्थिति मिश्रित है—
- कमजोर रुपया: निर्यात को कुछ बढ़ावा
- महंगा आयात (विशेषकर ऊर्जा): अर्थव्यवस्था पर दबाव
मध्य एशियाई देशों—कज़ाख़स्तान, उज्बेकिस्तान, ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान या तुर्कमेनिस्तान—की तुलना में रुपया कहीं अधिक स्थिर दिखता है। इससे भारत–मध्य एशिया व्यापार में अवसर बढ़े हैं।
विज़न 2047 और भारतीय रुपये का भविष्य
भारत का लक्ष्य 2047 तक विकसित राष्ट्र बनना है। 26 ट्रिलियन डॉलर की संभावित अर्थव्यवस्था और बढ़ती प्रति व्यक्ति आय के साथ रुपये की शक्ति स्वाभाविक रूप से बढ़ेगी।

2047 में रुपये की स्थिति इन कारकों पर निर्भर करेगी—
- ऊर्जा आत्मनिर्भरता
- निर्यात-प्रधान अर्थव्यवस्था
- विदेशी मुद्रा भंडार की मजबूती
- नियंत्रित व्यापार घाटा
- रुपये में अंतरराष्ट्रीय व्यापार
- सेमीकंडक्टर, एआई, रक्षा, अंतरिक्ष, फार्मा, तकनीक में नेतृत्व
- डिजिटल करेंसी (CBDC) और फिनटेक नेटवर्क
यदि ये सुधार योजनानुसार चलते रहे तो 2047 में रुपया स्थिर, मजबूत और व्यापक रूप से स्वीकार्य वैश्विक मुद्रा बन सकता है।
2047 का संभावित परिदृश्य: कैसा होगा रुपया?
- अंतरराष्ट्रीय व्यापार में रुपये का उपयोग बढ़ सकता है।
- डिजिटल रुपया सीमापार भुगतान प्रणाली को तेज़ और सक्षम बनाएगा।
- भारत यदि ऊर्जा आयात पर निर्भरता कम करता है, तो रुपये पर बाहरी दबाव घटेंगे।
- AI, तकनीक, रक्षा और विनिर्माण में अग्रणी बनने से रुपये की वैश्विक विश्वसनीयता बढ़ेगी।
संक्षेप में, 2047 तक रुपये की स्थिति आज से परिवर्तित, अधिक सशक्त और प्रभावशाली होने की संभावना है।
निष्कर्ष
भारतीय रुपये का भविष्य चार स्तंभों पर टिका है—
आर्थिक नीतियाँ, राजनीतिक स्थिरता, तकनीकी नेतृत्व और अंतरराष्ट्रीय साझेदारियाँ।
यदि भारत
- डॉलर-निर्भरता कम करता है,
- रुपये-आधारित व्यापार को बढ़ाता है,
- और डिजिटल वित्तीय ढांचे में नेतृत्वकारी भूमिका निभाता है,
तो 2047 में भारतीय रुपया दुनिया की सबसे विश्वसनीय और मजबूत मुद्राओं में शामिल हो सकता है।
यह वह स्थिति होगी जिसकी आज केवल कल्पना की जा रही है—
एक स्थिर, मजबूत, विश्वसनीय और वैश्विक व्यापार में स्वीकार्य भारतीय रुपया।
-संकलनकर्ता लेखक – क़र विशेषज्ञ स्तंभकार साहित्यकार अंतरराष्ट्रीय लेखक चिंतक कवि संगीत माध्यमा सीए(एटीसी) एडवोकेट किशन सनमुखदास भावनानी गोंदिया महाराष्ट्र







