दीपा शर्मा

चंडीगढ़, 01 अप्रैल – शिक्षा का मूल उद्देश्य विद्यार्थियों के बौद्धिक, नैतिक और सामाजिक विकास को सुनिश्चित करना है। स्कूलों में पढ़ाई जाने वाली पुस्तकों का बच्चों की सोच, आचरण और दृष्टिकोण पर गहरा प्रभाव पड़ता है। इसीलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि स्कूलों में केवल स्वीकृत और प्रामाणिक पाठ्य पुस्तकें ही उपयोग में लाई जाएं।
हरियाणा में कई प्राइवेट स्कूलों द्वारा निर्धारित नियमों की अनदेखी करते हुए अब भी अस्वीकृत और अनुचित पुस्तकों का उपयोग किया जा रहा है। शिक्षा विभाग ने इसे गंभीरता से लेते हुए सख्त कदम उठाने का निर्णय लिया है।
अनुचित पुस्तकों से बढ़ता खतरा
शिक्षा विशेषज्ञ दीपा शर्मा ने कहा कि स्कूलों में अनुचित और विवादास्पद पुस्तकों का उपयोग बच्चों के मानसिक और नैतिक विकास पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। इन पुस्तकों में अश्लील, भ्रामक, धार्मिक उन्माद फैलाने वाली, हिंसक या गलत जानकारी देने वाली सामग्री हो सकती है, जो न केवल विधिक दृष्टिकोण से गलत है बल्कि छात्रों के भविष्य को भी खतरे में डाल सकती है।
उन्होंने कहा कि समाज अपनी संस्कृति और नैतिकता को बनाए रखने के लिए शिक्षा को महत्वपूर्ण माध्यम मानता है। यदि स्कूलों में ऐसी पुस्तकें रखी जाती हैं, जो समाज की मान्यताओं और मूल्यों के विरुद्ध हों, तो इससे बच्चों में नकारात्मक सोच और गलत आदतें विकसित हो सकती हैं।
प्रशासन की सख्ती और निर्देश
हरियाणा के जिला शिक्षा अधिकारी ने सभी खंड शिक्षा अधिकारियों को निर्देशित किया है कि वे प्राइवेट स्कूलों के पाठ्यक्रम का निरीक्षण करें। यह सुनिश्चित किया जाए कि केवल स्वीकृत पाठ्य पुस्तकें ही उपयोग में लाई जा रही हैं। यदि किसी स्कूल में नियमों का उल्लंघन पाया जाता है, तो उसे तुरंत सूचित किया जाएगा और नियमानुसार कार्रवाई होगी।
अभिभावकों की भूमिका
दीपा शर्मा ने अभिभावकों से भी अपील की है कि वे अपने बच्चों की शिक्षा पर विशेष ध्यान दें। उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि उनके बच्चे को जो पुस्तकें पढ़ाई जा रही हैं, वे स्वीकृत और गुणवत्ता वाली हों। यदि किसी स्कूल में अनुचित पाठ्य सामग्री का उपयोग हो रहा है, तो इसकी जानकारी तुरंत प्रशासन को दी जानी चाहिए।
सहयोग से होगा सुधार
दीपा शर्मा का कहना है कि शिक्षा का स्तर सुधारने के लिए प्रशासन, स्कूल संचालक और अभिभावकों को एकजुट होकर कार्य करना होगा। शिक्षा विभाग ने इस दिशा में गंभीरता दिखाते हुए स्पष्ट कर दिया है कि शैक्षणिक गुणवत्ता के साथ कोई समझौता नहीं किया जाएगा।
शिक्षा के क्षेत्र में सकारात्मक पहल
इस प्रकार की कार्रवाई से शिक्षा प्रणाली में सुधार आएगा और विद्यार्थियों को सशक्त और सुरक्षित शिक्षा प्राप्त हो सकेगी। प्रशासन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि भविष्य में ऐसे मामलों को लेकर और भी सख्ती बरती जाएगी।
दीपा शर्मा ने कहा कि शिक्षा के क्षेत्र में हर किसी की जिम्मेदारी है। प्रशासन, स्कूल संचालक और अभिभावक मिलकर बच्चों को एक स्वस्थ, सुरक्षित और ज्ञानवर्धक शिक्षा देने के लिए कटिबद्ध हों। इसी प्रकार के सकारात्मक प्रयास से ही आने वाली पीढ़ी को उज्जवल भविष्य की दिशा में अग्रसर किया जा सकता है।
निष्कर्ष:
शिक्षा विभाग का यह कदम न केवल शैक्षणिक गुणवत्ता को बनाए रखने में सहायक सिद्ध होगा, बल्कि छात्रों के सर्वांगीण विकास में भी महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इस दिशा में अभिभावकों और शिक्षण संस्थानों का सहयोग आवश्यक है, ताकि छात्रों को एक मजबूत और प्रामाणिक शैक्षिक वातावरण मिल सके।