चुनाव आयोग से स्वीकृति मांगने के  40 ‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌ दिनों बाद भी  हिम्मत सिंह की हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग  के नियमित चेयरमैन के  तौर पर नियुक्ति लंबित

गत माह 19 अप्रैल को  आचार संहिता के चलते प्रदेश सरकार ने  चुनाव आयोग को स्वीकृति देने  के लिए लिखा था पत्र

9 अप्रैल को  हरियाणा के वित्त सचिव अनुराग रस्तोगी को दिया गया था चेयरमैन का अतिरिक्त कार्यभार

हर चयन प्रक्रिया के उपरांत आयोग द्वारा तैयार फाईनल रिजल्ट पर केवल चेयरमैन नहीं बल्कि सदस्यों के भी हस्ताक्षर आवश्यक — एडवोकेट

कैबिनेट मंत्री, मुख्य सचिव और विधि परामर्शी  की कमेटी करती है एच.एस.एस.सी.  चेयरमैन और सदस्यों दोनों का चयन 

चंडीगढ़ –  18वी लोकसभा आम चुनाव की कड़ी के  छठे चरण में गत शनिवार 25 मई को हरियाणा की सभी 10 लोकसभा सीटों पर मतदान सम्पन्न होने के बाद अब  यह देखने लायक होगा कि चुनाव आयोग की स्वीकृति प्राप्त होने के उपरान्त क्या प्रदेश में  नायब सैनी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार द्वारा 

हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग (एच.एस.एस.सी.) में तत्काल रूप से नए चेयरमैन के तौर पर प्रदेश  के एडवोकेट  जनरल – (महाधिवक्ता)  कार्यालय  में   बतौर एडिशनल एडवोकेट जनरल के तौर पर तैनात  हिम्मत सिंह की ही नियुक्ति की जाती है या फिर लागू व्यवस्था के अनुसार आयोग में  अन्य 6 सदस्यों की भी.

  चूँकि बीते करीब अढ़ाई माह अर्थात 16  मार्च से हरियाणा सहित देश भर में 18 वीं लोकसभा आम चुनाव के दृष्टिगत आदर्श आचार संहिता लागू है जो आगामी 6  जून तक जारी रहेगी, इसलिए हिम्मत सिंह की एच.एस.एस.सी. चेयरमैन के तौर पर नियुक्ति आदेश जारी करने के लिए राज्य सरकार के मुख्य सचिव कार्यालय द्वारा गत माह 19 अप्रैल को पत्र लिखकर मुख्य चुनाव अधिकारी (सीईओ) मार्फ़त भारतीय चुनाव आयोग से स्वीकृति मांगी है जो प्राप्त हुई अथवा नहीं, यह  फिलहाल सार्वजनिक नहीं है.

बहरहाल, चूँकि हिम्मत सिंह रोड़ वर्ग से हैं इसलिए उनकी प्रस्तावित नियुक्ति पर प्रदेश के  रोड़ समाज द्वारा प्रदेश सरकार का आभार  भी जताया गया था. वहीँ चूँकि  करनाल और कुरुक्षेत्र ज़िलों में रोड़ समाज के लोग (मतदाता) अधिक संख्या में है और करनाल से पूर्व मुख्यमंत्री मनोहर लाल लोकसभा सांसद का चुनाव लड़ रहे हैं और उनके विरूद्ध रोड़ वर्ग से मराठा वीरेंद्र वर्मा चुनावी मैदान में हैं, इस कारण मतदान से कुछ दिन पूर्व गरमाये  चुनावी माहौल  में रोड़  वर्ग से एच.एस.एस.सी. चेयरमैन की नियुक्ति होने पर सवाल भी उठे थे. रोचक बात यह है कि प्रदेश के  मुख्यमंत्री नायब सैनी स्वयं भी करनाल विधानसभा सीट से उपचुनाव लड़ रहे हैं.

बहरहाल, इसी बीच पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट के एडवोकेट हेमंत कुमार ने बताया कि मौजूदा लागू व्यवस्था अनुसार एच.एस.एस.सी. में चेयरमैन  को मिलाकर कुल सात सदस्य हो सकते हैं जिनका चयन तीन सदस्यीय समिति द्वारा किया जाता है जिसमें प्रदेश के मुख्यमंत्री द्वारा नामित एक कैबिनेट मंत्री, प्रदेश के मुख्य सचिव और प्रदेश के विधि परामर्शी (एल.आर. ) अर्थात विधि एवं विधायी विभाग के सचिव  तीनो सदस्य होते है. 

चूँकि अढ़ाई महीने पूर्व  12 मार्च को प्रदेश में सत्ता परिवर्तन हुआ जब मनोहर लाल के स्थान पर नायब सैनी नए मुख्यमंत्री बने और उनके तीन दिन बाद 15 मार्च बाद दोपहर तत्कालीन  मुख्य सचिव संजीव कौशल के स्थान पर टी.वी.एस.एन. प्रसाद को मुख्य सचिव बनाया गया एवं  उसके अगले ही  दिन  16 मार्च से आचार संहिता लागू हो गयी, इसलिए यह देखने लायक है कि क्या एच.एस.एस.सी. के नए चेयरमैन हिम्मत सिंह के  चयन में क्या पूर्व खट्टर सरकार के कैबिनेट मंत्री और पूर्व मुख्य सचिव संजीव कौशल शामिल थे या उनके बाद  उस पद पर आसीन पदाधिकारी. 

हेमंत ने बताया कि यह भी ध्यान करने योग्य है कि क्या तीन सदस्यीय कमेटी ने केवल एच.एस.एस.सी चेयरमैन का चयन किया या आयोग में अधिकतम छः अन्य सदस्यों का भी. जहाँ तक  आयोग में ताजा तौर पर केवल चेयरमैन की नियुक्ति करने का विषय है, इस पर‌ हेमंत का कहना है कि चेयरमैन और अधिकतम‌ 6 अन्य सदस्यों की नियुक्ति से ही  आयोग का विधिवत गठन‌ होता है, अकेला चेयरमैन आयोग द्वारा विभिन्न सरकारी पदों के लिए पूर्ण की गई चयन प्रक्रिया उपरांत घोषित परिणाम ( रिजल्ट) पर‌ हस्ताक्षर  नहीं कर सकता है बल्कि उस पर आयोग के सभी सदस्यों के  हस्ताक्षर भी अनिवार्य  हैं. जहाँ तक  हाईकोर्ट और अन्य अदालतों‌ में  आयोग द्वारा की गई विभिन्न चयन प्रक्रियाओं से संबंधित लंबित कानूनी एवं अवमानना  मामलों  और आयोग के अन्य प्रशासनिक कार्यों  का विषय है, तो‌ इसके लिए प्रदेश सरकार के वित्त‌ सचिव, अनुराग रस्तोगी को गत  9 अप्रैल को आयोग के चेयरमैन का अतिरिक्त कार्यभार दिया गया जो आज तक जारी है.

हेमंत ने आगे बताया कि ऐसा सुनने और पढ़ने में भले ही  आश्चर्यजनक प्रतीत हो परन्तु सत्य यही है कि प्रदेश में  आज तक लाखों  सरकारी कर्मचारियों (राजकीय विभागों के अतिरिक्त प्रदेश  के  सरकारी  बोर्डों, निगमों आदि हेतु  भी ) के लिए चयन करने वाले हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग —  एच.एस.एस.सी. (पूर्व नाम अधीनस्थ सेवाएं चयन बोर्ड –एस.एस.एस.बी.) को वर्तमान तौर पर  कानूनी दर्जा ही प्राप्त नहीं है और यह आयोग  प्रदेश  के मुख्यमंत्री के सीधे अधीन आने वाले  जनरल एडमिनिस्ट्रेशन ( सामान्य प्रशासन) विभाग  (मानव संसाधन- एच.आर. शाखा )  के एक अधीनस्थ कार्यालय के तौर पर काम  कर रहा है.  इसका संचालन  54  वर्षो पूर्व जनवरी, 1970 को  तत्कालीन राज्य सरकार द्वारा   जारी एक गजट नोटिफिकेशन से,  जिसमें आज तक समय समय पर सम्बंधित राज्य सरकारों द्वारा  मनमर्जी से सैंकड़ों बदलाव किये जाते रहे हैं, से ही किया जा रहा है. 

एडवोकेट ने  आगे   बताया कि साढ़े  19 वर्ष पूर्व  दिसंबर,2004 में हरियाणा कि तत्कालीन चौटाला सरकार ने प्रदेश  विधानसभा मार्फ़त   हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग अधिनियम, 2004 बनवा एच.एस.एस.सी. को वैधानिक (कानूनी )  मान्यता प्रदान की थी परन्तु तीन माह बाद ही  मार्च, 2005 में  जब भूपेंद्र  हुड्डा  प्रदेश के मुख्यमंत्री बने,  तो उन्होंने नई  विधानसभा के पहले ही सत्र  में  हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग (निरसन ) विधेयक, 2005 सदन से पारित करवाकर  आयोग को मिला कानूनी दर्जा समाप्त करवा दिया था. हालांकि इसके लिए  दोनों सरकारों (मुख्यमंत्रियों ) की अपनी अपनी मजबूरी थी. चौटाला चाहते थे कि वर्ष  2005 विधानसभा आम चुनावो के बाद  अगर उनके  हाथ से  सत्ता चली गयी, तो इसके बावजूद   उनके द्वारा नियुक्त  आयोग के चेयरमैन और सदस्य अपने अपने  पद पर कायम रह सकें  जबकि हुड्डा जब मुख्यमंत्री बने तो वह चौटाला सरकार द्वारा नियुक्त आयोग के  चेयरमैन और सदस्य हटाकर  अपनी मनमर्जी के चेयरमैन और सदस्य नियुक्त करना चाहते थे. 

हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री  मनोहर लाल खट्टर  के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने अपने साढ़े नौ वर्षो के लम्बे कार्यकाल में भी हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग के लिए विधानसभा मार्फ़त ताज़ा कानून नहीं बनवाया. 

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