डॉ. शैलेश शुक्ला गृह मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा ‘राजभाषा गौरव पुरस्कार’ से सम्मानित

भारतीय जनतंत्र की सफलता का सबसे महत्वपूर्ण पैमाना नागरिकों के जीवन में आने वाला सकारात्मक बदलाव है। जनता का विश्वास तभी मजबूत होता है, जब शासन उसके सम्मान, सुरक्षा, आजीविका और भविष्य की चिंता करता दिखाई दे। जनादेश सत्ता चलाने का अधिकार देने के साथ जनहित की जिम्मेदारी भी सौंपता है।
जनकल्याणकारी व्यवस्था का आधार हमारे संविधान में मौजूद है। अनुच्छेद 38 सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय पर आधारित व्यवस्था स्थापित करने तथा असमानताएं कम करने का निर्देश देता है। अनुच्छेद 39 पर्याप्त आजीविका, सामुदायिक संसाधनों के जनहितकारी वितरण और जनसाधारण के अहित में धन तथा उत्पादन के साधनों का संकेंद्रण रोकने पर बल देता है। अनुच्छेद 47 पोषण, जीवन स्तर और सार्वजनिक स्वास्थ्य में सुधार को राज्य के प्रमुख दायित्वों में रखता है। राज्य के नीति-निर्देशक सिद्धांतों में शामिल इन लक्ष्यों को बजट, नीतियों और प्रशासनिक निर्णयों में उतारना जनकल्याणकारी शासन की बुनियाद है।
जनकल्याण का अर्थ केवल आर्थिक सहायता बांटना या चुनाव से पहले योजनाओं की घोषणा करना नहीं है। इसका उद्देश्य ऐसी व्यवस्था बनाना है, जिसमें प्रत्येक नागरिक को सम्मानजनक जीवन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं, रोजगार और न्याय मिले। सरकार की सफलता का मूल्यांकन करते समय आर्थिक वृद्धि और बड़ी परियोजनाओं के साथ यह भी देखा जाना चाहिए कि आम परिवार की आय कितनी बढ़ी, बच्चों की पढ़ाई कितनी सुधरी और इलाज का बोझ कितना घटा।
उपलब्धियों के साथ चुनौतियां भी
भारत ने गरीबी कम करने और बुनियादी सुविधाओं के विस्तार में प्रगति की है। नीति आयोग के जनवरी 2024 में प्रकाशित चर्चा पत्र के अनुसार, बहुआयामी गरीबी का अनुमानित अनुपात 2013-14 के 29.17 प्रतिशत से घटकर 2022-23 में 11.28 प्रतिशत रहा। इस अवधि में लगभग 24.82 करोड़ लोगों के बहुआयामी गरीबी से बाहर आने का अनुमान लगाया गया।
इन आंकड़ों को समझते समय यह स्पष्ट रखना जरूरी है कि संबंधित वर्षों के अनुपात उपलब्ध सर्वेक्षणों के बीच गरीबी में कमी की दर के आधार पर अनुमानित किए गए हैं। ये प्रत्येक वर्ष किए गए प्रत्यक्ष सर्वेक्षण के परिणाम नहीं हैं। उपलब्धि महत्वपूर्ण है, लेकिन गरीबी, बेरोजगारी, कुपोषण और असमानता की शेष चुनौतियों का ईमानदार आकलन भी उतना ही आवश्यक है।
रोजगार बने प्राथमिकता
रोजगार को सरकारी नीतियों के केंद्र में रखना होगा। युवाओं को डिग्री के साथ ऐसे कौशल मिलने चाहिए, जिनकी वास्तविक अर्थव्यवस्था में मांग हो। विनिर्माण, कृषि प्रसंस्करण, पर्यटन, स्वास्थ्य सेवाओं, निर्माण, अनुसंधान और हरित ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में रोजगार के अवसर बढ़ाने की संभावनाएं हैं।
छोटे उद्यमों को सुलभ ऋण, सरल पंजीकरण, समय पर भुगतान और बाजार तक पहुंच चाहिए। प्रशिक्षण योजनाओं की सफलता केवल प्रशिक्षित युवाओं की संख्या से नहीं मापी जानी चाहिए। यह देखना अधिक उपयोगी होगा कि कितने युवाओं को काम मिला, उनका वेतन कितना है और रोजगार कितना स्थायी है। स्वरोजगार के मामले में वास्तविक आय और कारोबार की निरंतरता भी मूल्यांकन का हिस्सा होनी चाहिए।
शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश
गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं नागरिकों को गरीबी तथा असुरक्षा से बाहर निकालने का मजबूत आधार हैं। सरकारी विद्यालयों में पर्याप्त शिक्षक, पुस्तकालय, प्रयोगशालाएं और प्रभावी शिक्षण व्यवस्था सुनिश्चित होनी चाहिए। उच्च शिक्षा की गुणवत्ता छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों तक भी पहुंचनी चाहिए।
स्वास्थ्य सेवाओं में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और जिला अस्पतालों को मजबूत करना जरूरी है। चिकित्सकों, जांच सुविधाओं और आवश्यक दवाओं की उपलब्धता ऐसी हो कि बीमारी किसी परिवार को कर्ज और संपत्ति बेचने की मजबूरी में न धकेले। शिक्षा तथा स्वास्थ्य पर सरकारी व्यय दीर्घकालीन सामाजिक निवेश है, जिसका लाभ आने वाली पीढ़ियों को भी मिलता है।
खेती और गांव हों मजबूत
कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत किए बिना व्यापक जनकल्याण संभव नहीं है। सिंचाई, भंडारण, शीतगृह, कृषि अनुसंधान, प्रसंस्करण और बाजार संपर्क में सुधार किसानों की आय बढ़ाने के लिए आवश्यक है। किसान उत्पादक संगठनों और सहकारी संस्थाओं को सक्षम बनाकर छोटे किसानों की सौदेबाजी की शक्ति बढ़ाई जा सकती है।
फसल विविधीकरण स्थानीय मिट्टी, जलवायु, जल उपलब्धता और बाजार की जरूरतों के अनुरूप होना चाहिए। किसानों के लिए उत्पादन बढ़ने के साथ लाभकारी मूल्य, समय पर भुगतान और प्राकृतिक आपदाओं से सुरक्षा भी जरूरी है। गांवों में रोजगार तथा अच्छी सार्वजनिक सेवाएं उपलब्ध हों, ताकि लोगों को बुनियादी जरूरतों के लिए मजबूरी में पलायन न करना पड़े।
पात्र नागरिक तक पहुंचे लाभ
सरकारी योजना का वास्तविक महत्व तभी है, जब उसका लाभ पात्र व्यक्ति को समय पर मिले। डिजिटल भुगतान और प्रत्यक्ष लाभ अंतरण उपयोगी माध्यम हो सकते हैं, लेकिन तकनीक की सफलता नागरिक की सुविधा से तय होनी चाहिए।
आधार, बैंक खाते, इंटरनेट या दस्तावेजों की त्रुटियों के कारण कोई पात्र नागरिक राशन, पेंशन अथवा अन्य सहायता से वंचित न हो। डिजिटल प्रक्रिया विफल होने पर वैकल्पिक व्यवस्था उपलब्ध होनी चाहिए। शिकायत दर्ज करने की सरल प्रक्रिया, समयबद्ध समाधान और अपील की व्यवस्था प्रत्येक योजना का आवश्यक हिस्सा बने। प्रशासन की भूमिका नागरिक को बार-बार कार्यालय बुलाने के बजाय उसकी कठिनाई दूर करने की होनी चाहिए।
जवाबदेही हो सुनिश्चित
जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों की जवाबदेही को स्पष्ट संस्थागत व्यवस्था से जोड़ना होगा। प्रत्येक प्रमुख योजना के लक्ष्य, समयसीमा, खर्च और परिणाम सार्वजनिक होने चाहिए। स्वतंत्र मूल्यांकन से यह सामने आना चाहिए कि योजना ने निर्धारित उद्देश्य कितना पूरा किया।
सामाजिक अंकेक्षण, सूचना का अधिकार, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक की रिपोर्ट और संसदीय तथा विधानसभा समितियों की सिफारिशों पर गंभीर कार्रवाई जरूरी है। भ्रष्टाचार के विरुद्ध कार्रवाई राजनीतिक पहचान से प्रभावित नहीं होनी चाहिए। सार्वजनिक खरीद और ठेकों में पारदर्शिता बढ़ाकर सरकारी धन के दुरुपयोग की गुंजाइश कम की जा सकती है। जनता को पता होना चाहिए कि उसके कर का पैसा कहां खर्च हुआ और उससे किसे लाभ मिला।
स्थानीय भागीदारी बढ़े
लोकतंत्र में नागरिक की भूमिका मतदान तक सीमित नहीं हो सकती। ग्राम सभाओं, नगर निकायों और अन्य स्थानीय निर्वाचित संस्थाओं को पर्याप्त वित्तीय संसाधन, प्रशासनिक अधिकार तथा प्रशिक्षित कर्मचारी मिलने चाहिए।
हर क्षेत्र की जरूरत अलग होती है। पहाड़ी इलाके की प्राथमिकताएं महानगर से और सूखाग्रस्त जिले की जरूरतें बाढ़ प्रभावित क्षेत्र से भिन्न हो सकती हैं। स्थानीय योजनाओं में महिलाओं, युवाओं, किसानों, श्रमिकों, दिव्यांगजनों और वंचित समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित की जानी चाहिए। जनता के अनुभव और प्रमाणित स्थानीय आवश्यकताएं विकास की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण आधार बनें।
सामाजिक न्याय जीवन में दिखे
सामाजिक न्याय का अर्थ अवसरों के रास्ते में मौजूद वास्तविक बाधाओं को दूर करना है। जाति, धर्म, लिंग, भाषा, दिव्यांगता और आर्थिक स्थिति के कारण पैदा होने वाली वंचनाओं की पहचान कर प्रभावी कदम उठाने होंगे।
महिलाओं की शिक्षा, सुरक्षित सार्वजनिक परिवहन, रोजगार में समान अवसर और बच्चों तथा आश्रितों की देखभाल संबंधी सुविधाएं उनकी आर्थिक भागीदारी बढ़ा सकती हैं। दिव्यांग नागरिकों के लिए भवन, परिवहन और डिजिटल सेवाएं सुलभ हों। कमजोर वर्गों के लिए संचालित योजनाओं में सम्मान और भेदभावरहित व्यवहार सुनिश्चित हो। अधिकारों की सार्थकता नागरिक के दैनिक जीवन में दिखाई देनी चाहिए।
बजट में दीर्घकालीन जनहित
सरकारी बजट की प्राथमिकताएं दीर्घकालीन जनहित से निर्धारित होनी चाहिए। मुफ्त सुविधाओं, सब्सिडी और नकद सहायता का मूल्यांकन उनके उद्देश्य, जरूरतमंदों तक पहुंच, परिणाम और वित्तीय स्थिरता के आधार पर किया जाना चाहिए।
संकट में कमजोर परिवारों को सहायता देना आवश्यक है। इसके साथ स्थायी रोजगार, गुणवत्तापूर्ण सार्वजनिक सेवाओं और सामाजिक सुरक्षा में निवेश भी जरूरी है। अनावश्यक खर्च घटाकर शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, अनुसंधान और स्थानीय बुनियादी ढांचे को प्राथमिकता दी जाए। प्रत्येक नई योजना में वित्तपोषण, अपेक्षित परिणाम और स्वतंत्र मूल्यांकन की व्यवस्था स्पष्ट होनी चाहिए।
नागरिक का जीवन बने कसौटी
जनकल्याणकारी जनतंत्र के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, प्रशासनिक सुधार, पारदर्शिता और नागरिक भागीदारी का साथ जरूरी है। सरकार की उपलब्धियों का आकलन इस आधार पर होना चाहिए कि उसके निर्णयों से लोगों के जीवन में कितना सुधार आया।
लोकतंत्र नागरिक को प्रतिनिधि चुनने के साथ उनसे निरंतर सवाल पूछने का अधिकार भी देता है। जिस व्यवस्था में व्यक्ति सम्मान के साथ जी सके, अवसरों तक उसकी पहुंच हो और उसकी शिकायत गंभीरता से सुनी जाए, वहीं जनकल्याण का उद्देश्य साकार होता है। सत्ता का प्रत्येक निर्णय नागरिक के जीवन को बेहतर बनाने की कसौटी पर परखा जाए और विकास का लाभ समाज के सबसे कमजोर व्यक्ति तक पहुंचे—तभी जनहित वास्तव में जनादेश का आधार बनेगा।








