राजेश श्रीवास्तव

भारत में चुनाव आयोग और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण को लेकर चल रहे आंदोलन की परिणति कुछ भी हो, इसकी राजनीतिक परीक्षा तीन स्तरों पर होनी है—मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की संस्थागत जवाबदेही, भाजपा की राजनीतिक विश्वसनीयता और राहुल गांधी के नेतृत्व में विपक्ष की आंदोलन को आगे बढ़ाने की क्षमता। फिलहाल भाजपा आयोग के पक्ष में खड़ी दिखाई देती है, जबकि कांग्रेस इस विवाद को मताधिकार और लोकतांत्रिक भरोसे का सवाल बनाने में जुटी है।
राजनीति में किसी व्यक्ति या संस्था के समर्थन की भी अपनी सीमाएं होती हैं। यदि विवाद गहराता है और राजनीतिक नुकसान की आशंका बढ़ती है, तो सत्ता अपनी रणनीति बदल सकती है। हालांकि अभी यह निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी कि ज्ञानेश कुमार के खिलाफ उठे सवालों पर सरकार क्या रुख अपनाएगी। इतना अवश्य है कि चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर बहस अब राजनीतिक बयानों से आगे बढ़कर न्यायिक परीक्षण तक पहुंच चुकी है।
सुप्रीम कोर्ट ने आयोग की सामूहिक निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठाने वाली याचिकाओं पर जवाब मांगा है। इनमें आरोप है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने कुछ निर्णय अन्य दोनों आयुक्तों की सहमति के बिना लिए। अदालत ने तत्काल निलंबन का आदेश नहीं दिया और संबंधित रिपोर्टों की सत्यता जांचने की आवश्यकता बताई। इसलिए जवाब मांगने को दोष सिद्ध होने के समान नहीं माना जा सकता।
फॉर्म 6 का विवाद भी इसी सावधानी से समझना होगा। अदालत ने स्पष्ट किया है कि संशोधित फॉर्म की वैधता पर उसने अभी निर्णय नहीं दिया है। लिहाजा न इसे न्यायालय से मिली अंतिम स्वीकृति कहा जा सकता है और न केवल विवाद के आधार पर बदलाव को अपराध घोषित किया जा सकता है। निर्णय प्रक्रिया, वैधानिक अधिकार और संबंधित दस्तावेजों की जांच के बाद ही स्थिति स्पष्ट होगी।
यदि अन्य आयुक्तों की आपत्तियों की अनदेखी के आरोप प्रमाणित होते हैं, तो यह आयोग की सामूहिक कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न होगा। दूसरी ओर, यदि आयोग अपने निर्णयों के समर्थन में पर्याप्त अभिलेख प्रस्तुत करता है, तो उनका भी निष्पक्ष मूल्यांकन आवश्यक होगा। किसी निर्णय पर हस्ताक्षर होना महत्वपूर्ण साक्ष्य हो सकता है, लेकिन उससे जुड़े सभी प्रश्नों का उत्तर अपने आप नहीं मिल जाता। अदालत का निष्कर्ष संपूर्ण रिकॉर्ड और लागू कानून पर निर्भर करेगा।
इसी पृष्ठभूमि में इंडिया गठबंधन का विरोध राजनीतिक महत्व रखता है। राहुल गांधी और कांग्रेस मतदाता सूची में कथित अनियमितताओं को जनता के अधिकार से जोड़ रहे हैं। आयोग और भाजपा इन आरोपों को खारिज करते हैं। इस टकराव ने चुनावी प्रक्रिया की विश्वसनीयता को राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है।
मृत व्यक्तियों, स्थायी रूप से स्थानांतरित मतदाताओं और दोहरी प्रविष्टियों के मामलों में सूची सुधार आवश्यक है। लेकिन इस प्रक्रिया की कसौटी यह भी होनी चाहिए कि कोई पात्र नागरिक अपने मताधिकार से वंचित न हो। नाम हटाने का आधार स्पष्ट हो, संबंधित व्यक्ति को जानकारी मिले और उसे अपनी बात रखने का प्रभावी अवसर दिया जाए। मतदाता सूची की शुद्धता और नागरिक के अधिकार की रक्षा साथ-साथ चलनी चाहिए।
बड़े पैमाने पर नाम हटने की शिकायतों को केवल स्थानीय कर्मचारियों की चूक बताकर टालना उचित नहीं होगा। उसी तरह, बिना दस्तावेजी प्रमाण यह घोषित कर देना भी सही नहीं कि हर विवादित कार्रवाई किसी राजनीतिक दल के निर्देश पर हुई। विपक्ष की चुनौती है कि वह अपनी आशंकाओं को ठोस उदाहरणों और प्रमाणों से पुष्ट करे। आयोग की जिम्मेदारी है कि वह सवालों का स्पष्ट और तथ्यपरक उत्तर दे।
सड़कों पर उतरने वाले आंदोलनों का प्रभाव केवल तत्काल मांग पूरी होने से नहीं मापा जाता। वे सरकार की प्राथमिकताओं और सार्वजनिक विमर्श को भी प्रभावित करते हैं। परीक्षा संबंधी विवादों पर कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन के बाद धर्मेंद्र प्रधान का शिक्षा मंत्री पद से इस्तीफा ऐसी ही एक महत्वपूर्ण घटना रहा। फिर भी प्रत्येक आंदोलन की परिस्थितियां अलग होती हैं; एक आंदोलन का परिणाम दूसरे की सफलता की गारंटी नहीं होता।
भाजपा के सामने चुनौती यह है कि वह चुनावी संस्थाओं के बचाव और उनके प्रत्येक विवादित निर्णय के राजनीतिक समर्थन के बीच विवेकपूर्ण रुख अपनाए। विपक्ष के सामने चुनौती है कि संस्थागत जवाबदेही की मांग करते हुए वह नागरिकों में चुनाव प्रक्रिया के प्रति निराशा न फैलाए। लोकतंत्र को प्रमाण आधारित आलोचना और पारदर्शी उत्तर, दोनों चाहिए।
इस पूरे घटनाक्रम का दूसरा महत्वपूर्ण पक्ष राहुल गांधी की राजनीति है। भारत जोड़ो यात्रा ने उन्हें जनता के बीच लंबे समय तक सीधे संवाद करने का अवसर दिया। समर्थकों के लिए यह उनकी छवि पर वर्षों से चिपकाए गए राजनीतिक विशेषणों से बाहर निकलने का अभियान भी था। यात्रा ने यह प्रश्न उठाया कि किसी नेता का मूल्यांकन केवल उसके विरोधियों द्वारा बनाई गई छवि से किया जाना चाहिए या उसके व्यवहार, विचार और जनसंपर्क से भी।
जनवरी 2023 में हरियाणा में राहुल गांधी ने अपनी सार्वजनिक छवि से अलग होकर काम करने की बात कही थी। उनका आशय था कि दूसरों की बनाई छवि के बजाय उनका ध्यान अपने काम पर है। इस कथन को उनकी राजनीतिक शैली में आए बदलाव के संदर्भ में देखा जा सकता है। पैदल यात्रा, अलग-अलग समुदायों से बातचीत और आम लोगों की समस्याओं को सुनना उस शैली के प्रमुख हिस्से बने।
भारत जोड़ो यात्रा की उपयोगिता को केवल इस आधार पर खारिज नहीं किया जा सकता कि उसके बाद कांग्रेस केंद्र में सरकार नहीं बना सकी। किसी राजनीतिक अभियान का प्रभाव संगठन, जनसंवाद और मुद्दों की स्वीकार्यता पर भी पड़ता है। हालांकि चुनावी परिणाम अनेक सामाजिक, क्षेत्रीय और गठबंधन संबंधी कारणों से बनते हैं; उन्हें किसी एक यात्रा या नेता के खाते में डाल देना भी अधूरा विश्लेषण होगा।
राहुल गांधी ने अर्थव्यवस्था, रोजगार, सामाजिक असमानता और संस्थागत निष्पक्षता जैसे विषयों पर लगातार सरकार को घेरा है। उनके समर्थक इसे उनकी बढ़ती राजनीतिक समझ का प्रमाण मानते हैं। लेकिन यह कहना कि उनकी हर बात बाद में सही सिद्ध हुई, एक व्यापक और अप्रमाणित निष्कर्ष होगा। प्रत्येक दावे की कसौटी उसके तथ्य और परिणाम ही होने चाहिए।
फिलहाल राहुल गांधी चुनावी पारदर्शिता के सवाल को व्यापक राजनीतिक अभियान में बदलने का प्रयास कर रहे हैं। भाजपा उनके आरोपों और आंदोलन के उद्देश्यों पर सवाल उठाकर जवाब दे रही है। किस पक्ष का तर्क जनता स्वीकार करेगी, यह भाषणों के साथ-साथ सामने आने वाले प्रमाणों पर भी निर्भर करेगा।
ज्ञानेश कुमार की कार्यप्रणाली पर उठे सवालों का न्यायिक निष्कर्ष अभी बाकी है। भाजपा की राजनीतिक चुनौती और राहुल गांधी की नेतृत्व परीक्षा भी जारी है। इस विवाद का सबसे जरूरी प्रश्न किसी नेता की जीत या हार नहीं, बल्कि नागरिक का यह भरोसा है कि उसका नाम मतदाता सूची में सुरक्षित है, उसका वोट मायने रखता है और चुनाव कराने वाली संस्था निष्पक्ष है।








