डॉ. घनश्याम बादल

दशहरा आते ही रावण के पुतले खड़े होने लगते हैं। गाँव-गाँव और शहर-शहर मेले लगते हैं। राम की विजय का उत्सव मनाने के साथ रावण के पुतले जलाकर हम खुश होते हैं कि एक बार फिर उसका अंत कर दिया। लेकिन हर साल बढ़ती भीड़ और रावण के पुतलों की बढ़ती ऊँचाई एक नया प्रश्न खड़ा करती है।
कागज, बाँस और बारूद से बना दस सिरों वाला रावण शाम होते-होते आग के हवाले कर दिया जाता है। आतिशबाजी होती है, तालियाँ बजती हैं और लोग घर लौट जाते हैं। मगर अगले दिन वही झूठ, अहंकार, छल, स्त्री का अपमान, सत्ता का दुरुपयोग और दूसरों को नीचा दिखाने की होड़ फिर अपनी जगह खड़ी मिलती है। सवाल है कि हर साल जलने वाला रावण हमारे वास्तविक जीवन में मरता क्यों नहीं? क्या हमने बुराई के पुतले जलाने की परंपरा तो बचा ली, लेकिन बुराई को पहचानने और उससे लड़ने का साहस खो दिया? दशहरे का असली सवाल शायद यही है।
विजयादशमी के मायने
भारतीय परंपरा में विजयादशमी केवल त्योहार नहीं, विजय के विवेक की कसौटी भी है। यह बताती है कि शक्ति का अर्थ किसी को दबाना नहीं, अन्याय का प्रतिरोध करना है; ज्ञान का अर्थ दूसरों पर रोब जमाना नहीं, अपने अहंकार पर अंकुश लगाना है; और विजय का अर्थ केवल शत्रु को परास्त करना नहीं, स्वयं की कमजोरियों पर भी जीत हासिल करना है।
राम की विजय और रावण
रामायण की कथा में भगवान राम और रावण का युद्ध धर्म और अधर्म के संघर्ष का प्रतीक बनकर सामने आता है। एक ओर मर्यादा, कर्तव्य, धैर्य और लोकमंगल का आदर्श है, तो दूसरी ओर असाधारण विद्वत्ता और सामर्थ्य के बावजूद अहंकार से अंधा हो चुका शासक।
रावण कोई साधारण प्रतिद्वंद्वी नहीं था। वह प्रकांड विद्वान, शिवभक्त, कुशल योद्धा और शक्तिशाली लंकापति था, लेकिन उसकी उपलब्धियाँ उसके विवेक को नहीं बचा सकीं। सीता का हरण केवल एक स्त्री का अपहरण नहीं, दूसरे की स्वतंत्रता और गरिमा को अपनी इच्छा के अधीन कर लेने की मानसिकता का प्रतीक भी है। यही रावण की सबसे बड़ी पराजय थी। वह राम के हाथों युद्ध में बाद में हारा, अपने अहंकार के हाथों पहले ही हार चुका था।
आज की प्रासंगिकता
रामकथा के अलग-अलग रूपों में घटनाओं और चरित्रों की व्याख्या के अनेक स्वर मिलते हैं। कहीं राम मर्यादा पुरुषोत्तम हैं, कहीं कथा भक्ति का आधार बनती है और कहीं रावण के चरित्र के माध्यम से सत्ता, विद्वत्ता तथा नैतिकता के संबंध पर विचार किया जाता है। पर एक बात स्पष्ट है—प्रतिभा अपने आप में चरित्र का प्रमाणपत्र नहीं होती। ज्ञान के साथ विवेक न हो, तो वही ज्ञान विनाश का औजार बन सकता है।
दशहरे की कथा का यह पक्ष आज भी उतना ही प्रासंगिक है। आधुनिक समाज में पद, पैसा, प्रतिष्ठा और तकनीकी सामर्थ्य को सफलता का पर्याय मान लेने की प्रवृत्ति बढ़ी है। हम यह पूछना भूल जाते हैं कि सफलता किस कीमत पर हासिल हुई और उसका लाभ किसे मिला।
एक पर्व, अनेक संदर्भ
दशहरे का महत्व केवल राम और रावण के युद्ध तक सीमित नहीं है। भारतीय धार्मिक परंपराओं में यह पर्व देवी दुर्गा की महिषासुर पर विजय से भी जुड़ा है। यहाँ विजय का रूप बदल जाता है—शक्ति अन्याय और आसुरी प्रवृत्तियों का प्रतिरोध करती है। राम की कथा मर्यादा और कर्तव्य का स्मरण कराती है, तो दुर्गा की कथा बताती है कि जब संकट व्यापक हो, तब संगठित शक्ति और साहस की आवश्यकता होती है।
आध्यात्मिक पक्ष
आध्यात्मिक दृष्टि से देखें, तो रावण के दस सिर मनुष्य के भीतर पलने वाली अनेक विकृतियों की याद दिला सकते हैं—काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद, मत्सर, अहंकार, ईर्ष्या, छल और विवेकहीनता। यह प्रतीकात्मक व्याख्या है, कोई एकमात्र शास्त्रीय अर्थ नहीं। इसका संदेश इतना भर है कि बुराई केवल बाहर खड़ा कोई शत्रु नहीं होती; वह हमारे निर्णयों, व्यवहार और इच्छाओं में भी जगह बना सकती है।
आत्मपरीक्षण का अवसर
इसीलिए दशहरा आत्मपरीक्षण का अवसर है। दूसरों के दोष गिनाना आसान है, अपने भीतर झाँकना कठिन। रावण का पुतला जलाते समय यदि मन में किसी के प्रति घृणा, व्यवहार में अन्याय और फैसलों में स्वार्थ जस का तस बना हुआ है, तो उत्सव का शोर हमारी आत्मा तक पहुँच ही नहीं पाया।
परंपरा से लोकजीवन तक
विजयादशमी की परंपरा सदियों में अनेक धार्मिक, सामाजिक और सांस्कृतिक रूपों में विकसित हुई है। उत्तर भारत की रामलीलाएँ और रावण-दहन, मैसूर का दशहरा, बंगाल में दुर्गापूजा का विजयादशमी पर समापन तथा विभिन्न क्षेत्रों में नवरात्र और दशहरे से जुड़ी शस्त्रपूजा व आयुधपूजा की परंपराएँ इस पर्व के बहुरंगी स्वरूप को सामने लाती हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में इसकी रस्में भिन्न हैं, लेकिन विजय, शुभारंभ और सामूहिक उत्सव का भाव उन्हें जोड़ता है।
शस्त्रपूजा में शक्ति, सुरक्षा और कर्तव्य का भाव निहित है। आज उसके अर्थ का विस्तार किया जा सकता है। किसान अपने औजारों, कारीगर अपने उपकरणों, सैनिक अपने शस्त्रों और विद्यार्थी अपनी पुस्तकों के प्रति सम्मान व्यक्त करें, तो यह परंपरा कर्म की गरिमा का उत्सव बन सकती है। पूजा का अर्थ वस्तु को पवित्र मानकर रख देना ही नहीं, उसके उपयोग को जिम्मेदार बनाना भी है।
मेले और मेल-मिलाप
लोकजीवन में दशहरा सामाजिक मेल-मिलाप, स्थानीय कला, रंगमंच और सामूहिक भागीदारी का अवसर भी है। रामलीलाएँ केवल धार्मिक आख्यानों की प्रस्तुतियाँ नहीं, संवाद, अभिनय, संगीत और लोकस्मृति की जीवित परंपराएँ हैं। उनके मंच पर पीढ़ियाँ मिलती हैं और समाज अपने नैतिक प्रश्नों को कथा के माध्यम से दोबारा देखता है। इस सांस्कृतिक विरासत को बचाना दशहरे के अर्थ को बचाना भी है।
आज विजयादशमी मनाने का सबसे बड़ा उद्देश्य बुराई के विरुद्ध ऐसा साहस जगाना होना चाहिए, जिसमें राम की विनम्रता, सभ्यता, शालीनता और मर्यादा समाहित हो। आवश्यकता ऐसे व्यक्तित्व तैयार करने की है, जो आधुनिक रावणों के सामने डट सकें और दलित, दमित, शोषित, वंचित तथा आम आदमी के अधिकारों और सम्मान की रक्षा के लिए अंतिम दम तक संघर्ष करने का सामर्थ्य रखें। तभी विजयादशमी लोकमंगल का मर्यादा पर्व बनकर हमारे जीवन में सार्थक होगी।








