विदेशी फंडिंग का आरोप : सनसनी से नहीं, सबूतों से तय होनी चाहिए सच्चाई

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सौरभ वार्ष्णेय

बिना प्रमाण गंभीर आरोप लगाना लोकतंत्र, राजनीतिक विमर्श और सार्वजनिक विश्वसनीयता के लिए कितना उचित है? विदेशी फंडिंग को लेकर उठे विवाद ने इस प्रश्न को एक बार फिर सामने ला दिया है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में किसी देश के आंतरिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप की आशंका को पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। दुनिया के अनेक देशों में राजनीतिक गतिविधियों, चुनावी प्रक्रियाओं और जन आंदोलनों पर बाहरी प्रभाव को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं। लेकिन किसी आशंका को प्रमाणित तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना और किसी राजनीतिक संगठन पर विदेशी धन लेकर देश में अशांति फैलाने का आरोप लगाना दो अलग-अलग बातें हैं। यही अंतर जिम्मेदार पत्रकारिता, निष्पक्ष राजनीतिक विमर्श और लोकतांत्रिक मूल्यों की बुनियाद है।

अमेरिकी गायिका और अभिनेत्री मैरी मिलबेन के हालिया बयान को इसी कसौटी पर परखना चाहिए। १४ अक्टूबर को प्रकाशित समाचार रिपोर्टों के अनुसार, उन्होंने सोशल मीडिया मंच एक्स पर अभिजीत दीपके और कॉकरोच जनता पार्टी—सीजेपी—को अमेरिका में मौजूद कुछ दानदाताओं से वित्तीय सहायता मिलने का आरोप लगाया। उन्होंने इस कथित मदद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध और भारत में शासन व्यवस्था को बाधित करने वाली गतिविधियों से जोड़ा। दूसरी ओर, दीपके ने विदेशी फंडिंग के आरोपों को खारिज किया है। इसलिए इस विवाद में आरोप और संबंधित पक्ष का जवाब, दोनों पाठकों के सामने रखना जरूरी है।

आरोप के साथ प्रमाण भी जरूरी

ऐसे गंभीर आरोप सामने आने के बाद सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि इनके समर्थन में ठोस सबूत क्या हैं? क्या किसी बैंक खाते का प्रमाणित विवरण सामने आया है? क्या वित्तीय लेन-देन का दस्तावेज उपलब्ध है? क्या संबंधित एजेंसी की किसी जांच में इसकी पुष्टि हुई है? क्या किसी आधिकारिक रिपोर्ट में धन के स्रोत, प्राप्तकर्ता और इस्तेमाल का उल्लेख किया गया है?

इस लेख के लिए देखी गई समाचार रिपोर्टों में आरोपों का विवरण तो मिलता है, लेकिन उनकी पुष्टि करने वाले बैंक रिकॉर्ड, प्रमाणित वित्तीय दस्तावेज अथवा किसी सक्षम जांच एजेंसी का निष्कर्ष प्रस्तुत नहीं किया गया है। इस सीमा को स्पष्ट रखना आवश्यक है। बयान का प्रकाशित होना और उसमें लगाए गए आरोप का प्रमाणित होना एक ही बात नहीं है।

किसी राजनीतिक दल या संगठन को अवैध विदेशी धन मिलने का आरोप सामान्य राजनीतिक टिप्पणी नहीं है। इसका संबंध देश की संप्रभुता, राजनीतिक पारदर्शिता और कानून के पालन से है। यदि किसी दल या संगठन को अवैध विदेशी वित्तपोषण प्राप्त हुआ है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। दोष सिद्ध होने पर कानून के अनुसार कार्रवाई भी होनी चाहिए। लेकिन जांच और प्रमाण के बिना किसी संगठन को देशविरोधी गतिविधियों में शामिल घोषित कर देना न्यायपूर्ण सार्वजनिक विमर्श के अनुरूप नहीं है।

राजनीति में आरोप लगाना आसान है, लेकिन उन्हें प्रमाणित करना कठिन। इसलिए आरोप लगाने वाले से विश्वसनीय दस्तावेज, वित्तीय रिकॉर्ड या अन्य सत्यापन योग्य साक्ष्य मांगना स्वाभाविक है। केवल सोशल मीडिया पोस्ट, राजनीतिक बयान अथवा किसी विदेशी नागरिक की टिप्पणी अपने आप में किसी गंभीर आरोप का प्रमाण नहीं बन जाती। जब तक विश्वसनीय साक्ष्य सामने नहीं आते, तब तक ऐसे कथनों को आरोप या दावा ही कहा जाना चाहिए, स्थापित तथ्य नहीं।

विरोध और विदेशी साजिश में अंतर

लोकतंत्र में राजनीतिक दलों के बीच मतभेद स्वाभाविक हैं। सत्तापक्ष और विपक्ष, दोनों को अपनी विचारधारा रखने, सरकार की नीतियों पर बहस करने और जनता के सामने अपना पक्ष प्रस्तुत करने का अधिकार है। यही लोकतंत्र की शक्ति है। लेकिन जब राजनीतिक विरोध को विदेशी साजिश, देशविरोधी गतिविधि या राष्ट्रीय सुरक्षा के संकट से जोड़ दिया जाता है, तब यह देखना जरूरी हो जाता है कि ऐसा निष्कर्ष किन तथ्यों के आधार पर निकाला गया है।

यदि किसी राजनीतिक संगठन को बदनाम करने के उद्देश्य से अपुष्ट आरोपों को बार-बार प्रसारित किया जाता है, तो इससे जनता के बीच भ्रम और अविश्वास पैदा हो सकता है। दूसरी ओर, यदि वास्तव में विदेशी वित्तपोषण के जरिए गैरकानूनी गतिविधियां संचालित हो रही हैं, तो उनकी अनदेखी भी नहीं की जा सकती। इसलिए न तो हर आरोप को राजनीतिक षड्यंत्र कहकर खारिज करना उचित है और न ही हर आरोप को सच मान लेना।

किसी संगठन की सरकार विरोधी गतिविधि मात्र से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि उसके पीछे विदेशी धन है। इसी प्रकार, किसी आंदोलन को मिलने वाला सार्वजनिक समर्थन अपने आप उसकी वित्तीय पारदर्शिता का प्रमाण नहीं बन जाता। राजनीतिक समर्थन और वित्तीय जवाबदेही, दोनों को उनके अपने तथ्यों के आधार पर परखा जाना चाहिए।

कानून की कसौटी स्पष्ट हो

भारत एक संप्रभु लोकतांत्रिक देश है। यहां विदेशी अंशदान के स्वीकार और उपयोग को नियंत्रित करने के लिए विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम—एफसीआरए—लागू है। इस कानून की धारा ३ राजनीतिक दलों और उनके पदाधिकारियों को विदेशी अंशदान स्वीकार करने से प्रतिबंधित करती है। दूसरी ओर, पात्र गैर-सरकारी संस्थाओं के लिए निर्धारित शर्तों के अधीन पंजीकरण या पूर्व अनुमति लेकर विदेशी अंशदान प्राप्त करने की व्यवस्था है। इन अलग-अलग कानूनी श्रेणियों को एक जैसा नहीं समझना चाहिए।

किसी विशिष्ट मामले में कौन-सा प्रावधान लागू होगा, यह संबंधित संस्था की कानूनी स्थिति, धन के स्रोत, प्राप्तकर्ता और लेन-देन की प्रकृति पर निर्भर करेगा। किसी समूह के नाम में ‘पार्टी’ शब्द होना भर उसकी पंजीकरण स्थिति स्थापित नहीं करता। इसलिए किसी संगठन पर कानूनी निष्कर्ष देने से पहले उसकी वास्तविक स्थिति और संबंधित रिकॉर्ड की जांच आवश्यक है।

यदि भारतीय कानूनों का उल्लंघन करके धन उपलब्ध कराने या प्राप्त करने के प्रमाण मिलते हैं, तो सक्षम एजेंसियों को कार्रवाई करनी चाहिए। लेकिन किसी विदेशी नागरिक की राजनीतिक टिप्पणी को अपने आप विदेशी फंडिंग का सबूत नहीं माना जा सकता। जांच का आधार सत्यापन योग्य सामग्री होनी चाहिए।

समर्थन सत्यता का प्रमाण नहीं

भारत की संप्रभुता की रक्षा करना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी है कि इस विषय का इस्तेमाल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वियों के विरुद्ध बिना प्रमाण आरोप लगाने के लिए न किया जाए।

मैरी मिलबेन पहले भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी नीतियों के समर्थन में अपनी राय व्यक्त कर चुकी हैं। वर्ष २०२१ में उन्होंने कृषि सुधारों के संदर्भ में मोदी पर विश्वास जताया था। बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री ‘इंडिया : द मोदी क्वेश्चन’ को लेकर हुए विवाद में भी उन्होंने मोदी का समर्थन किया था। लेकिन किसी व्यक्ति का पहले किसी सरकार या नीति के पक्ष में बोलना उसके नए आरोपों की सत्यता का प्रमाण नहीं बन जाता।

राजनीतिक समर्थन और तथ्यात्मक प्रमाण दो अलग-अलग विषय हैं। किसी व्यक्ति की प्रतिष्ठा, अंतरराष्ट्रीय पहचान या किसी नेता के प्रति उसकी प्रशंसा के आधार पर उसके प्रत्येक दावे को सही नहीं माना जा सकता। उसी तरह, किसी व्यक्ति के राजनीतिक विचारों से असहमति होने के कारण उसके प्रत्येक कथन को गलत भी नहीं ठहराया जा सकता। हर दावे की जांच उसके प्रमाणों के आधार पर होनी चाहिए।

यही कसौटी आरोपों का जवाब देने वाले पक्ष पर भी लागू होती है। केवल खंडन कर देना सभी सवालों का अंतिम उत्तर नहीं है। जहां किसी लेन-देन को लेकर ठोस प्रश्न उठें, वहां संबंधित पक्ष से स्पष्ट और दस्तावेज-आधारित जवाब की अपेक्षा भी उचित है। पारदर्शिता की मांग सभी के लिए समान होनी चाहिए।

पत्रकारिता की जिम्मेदारी

आज सोशल मीडिया के दौर में सनसनीखेज दावे तेजी से फैलते हैं। कई बार किसी बयान को आकर्षक शीर्षक देकर इस तरह प्रसारित किया जाता है कि पाठक आरोप और सच्चाई के बीच का अंतर भूल जाते हैं। एक ही दावे को अनेक मंचों पर दोहराया जाना भी उसकी स्वतंत्र पुष्टि नहीं है। इससे लोकतांत्रिक संवाद प्रभावित होता है और समाज में अनावश्यक अविश्वास पैदा हो सकता है।

समाचार माध्यमों की जिम्मेदारी है कि वे किसी गंभीर आरोप को प्रकाशित करने से पहले उसके स्रोत, संदर्भ और प्रमाणों की पड़ताल करें। संबंधित राजनीतिक दल, संगठन या व्यक्ति का पक्ष लें, उपलब्ध आधिकारिक रिकॉर्ड की जांच करें और जहां पुष्टि उपलब्ध न हो, वहां स्पष्ट रूप से लिखें कि दावा स्वतंत्र रूप से सत्यापित नहीं हुआ है।

यह सावधानी केवल समाचार के भीतर किसी छोटे वाक्य तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। शीर्षक, चित्र और कैप्शन में भी आरोप को तथ्य की तरह प्रस्तुत नहीं किया जाना चाहिए। यदि खबर में प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं, तो उसकी प्रस्तुति ऐसी नहीं होनी चाहिए जिससे पाठक पहले ही किसी को दोषी मान ले।

पाठकों को भी किसी सनसनीखेज पोस्ट को तुरंत सच मानने या आगे प्रसारित करने से पहले उसकी विश्वसनीयता जांचनी चाहिए। राष्ट्रहित का अर्थ केवल किसी सरकार या राजनीतिक दल का समर्थन करना नहीं है। इसका अर्थ सत्य, कानून, पारदर्शिता और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति प्रतिबद्धता भी है।

सबके लिए एक ही कसौटी

यदि भारत में किसी राजनीतिक दल या संगठन को अवैध विदेशी वित्तीय सहायता मिलने का ठोस प्रमाण है, तो उसे सक्षम जांच एजेंसियों के समक्ष रखा जाना चाहिए और कानून के अनुसार जांच होनी चाहिए। जनता के सामने भी सत्यापन योग्य तथ्य आने चाहिए। लेकिन यदि आरोप केवल बयानबाजी और अपुष्ट दावों पर आधारित हैं, तो उन्हें तथ्य के रूप में प्रचारित करना जनता को भ्रमित करने जैसा होगा।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के समर्थकों को अपने नेता के पक्ष में विचार रखने का पूरा अधिकार है। विपक्षी दलों को सरकार की आलोचना करने का भी समान लोकतांत्रिक अधिकार है। दोनों के लिए एक ही कसौटी होनी चाहिए—तथ्य और प्रमाण। राजनीतिक सहमति या असहमति के आधार पर इस कसौटी को बदला नहीं जा सकता।

भारत की प्रतिष्ठा मजबूत होती है निष्पक्ष जांच, पारदर्शी व्यवस्था, स्वतंत्र पत्रकारिता और न्यायपूर्ण कार्रवाई से। इसलिए विदेशी फंडिंग के इस कथित मामले में भी भावनात्मक प्रतिक्रियाओं के बजाय प्रमाण सामने लाने की मांग की जानी चाहिए।

लोकतंत्र में सवाल उठाना अधिकार है, लेकिन किसी आरोप को सच मानने से पहले प्रमाण मांगना जनता का अधिकार और पत्रकारिता का दायित्व है।

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Author: Bharat Sarathi

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