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– मुकेश शर्मा : राजनीतिक विश्लेषक

हरियाणा के आने वाले विधानसभा चुनाव में क्या कोई ऐसा विपक्षी नेता है,जो मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के विजय-रथ को रोक पाये ? यह विपक्षी दलों के लिए एक बड़ा अहम सवाल है।
भाजपा के सत्ता में आने से पहले बड़ी अवधि तक हरियाणा में जाट राजनीति का बोलबाला रहा और पिछले कुछ सालों से इसका मुख्य चेहरा रहे पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा।लोकसभा चुनाव में उनकी करारी हार और साथ में अच्छी छवि वाले उनके पुत्र दीपेन्द्र सिंह के चुनाव हार जाने के बाद हुड्डा का वह जादू नहीं समझा जा रहा, जो उनके लोकसभा चुनाव लड़ने से पहले तक था।

पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला के सितारे गर्दिश में क्या आये कि उनके पुत्र अभय सिंह चौटाला अपने पारिवारिक और राजनीतिक दोनों ही कुनबों को नहीं संभाल पाए।उनके पौत्र दुष्यन्त चौटाला भी कोई करिश्मा नहीं दिखा पाए।

काँग्रेस प्रदेशाध्यक्ष डॉ.अशोक तंवर की प्रधानी में काँग्रेस दस की दस लोकसभा सीट हार गई और उनका विकल्प समझी जाने वाली पूर्व केंद्रीय मंत्री कु.शैलजा भी अपनी सीट नहीं बचा पायीं।ऐसी परफोर्मेंस के चलते कौन रोक पायेगा खट्टर के विजय रथ को?यद्यपि कुछ विपक्षी दलों के साझा मोर्चा बनाकर चुनाव लड़ने की सुगबुगाहट है,लेकिन अब चुनाव में इतना कम समय रह गया है कि लगता नहीं कि इतनी कम अवधि में वे जनता को विश्वास में ले पायेंगे।

अब ज़रा बात कर लेते हैं जातिगत समीकरणों की।ढ़ाई करोड़ से कुछ ज्यादा आबादी वाले हरियाणा में नब्बे विधानसभा और दस लोकसभा सीटें हैं।एण्डी फैक्ट्स के आँकड़ों को यदि सही माना जाए तो हरियाणा में 32 फीसदी जाट मतदाता हैं और रोहतक, सोनीपत, जींद, सिरसा, हिसार, भिवानी, महेन्द्रगढ़, फरीदाबाद आदि क्षेत्रों में इनकी मुख्य चुनावी भूमिका है।

एस.सी/एस.टी 21℅ हैं,लेकिन अलग अलग हल्कों में फैले हुए हैं,जबकि अम्बाला और सिरसा लोकसभा क्षेत्रों में नेतृत्व की स्थिति में हैं।पंजाबी/सिख लगभग 9℅,ब्राह्मण 8℅,वैश्य 7℅,यादव5℅,राजपूत 3%,सैनी 3℅,गुर्जर 2℅ एवं अन्य 10℅ बताये गए हैं।

आँकड़ों के प्रतिशत पर कुछ मतभेद भी हो सकता है, लेकिन यह तो सर्वविदित है कि जाट मतदाता ही बहुसंख्यक हैं और राजनीतिक फेरबदल करने की स्थिति में रहते हैं।किंतु फिलहाल  किसी भी एक जाट नेता का प्रभुत्व न होने के कारण ऐसा नहीं लगता कि मुख्यमंत्री मनोहर लाल के विजय रथ को कोई विपक्षी नेता रोक पायेगा।

यदि पार्टी के भीतर कोई भितरघात नहीं हुआ तो मनोहर लाल के ही दोबारा मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचने के संकेत लग रहे हैं।

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