रेजांगला से लेकर कारगिल तक अहीरवाल के जवानों का बलिदान

कारगिल युद्ध में हुए 438 शहीदो में से 125 शहीद अहीरवाल के. सबसे कम पौन 18 वर्ष का शहीद बिजेंद्र पटौदी के कूणी गांव का. अहीरवाल में 125 शहीदों में से आठ शहीद पटौदी क्षेत्र से हैं

फतह सिंह उजाला

गुरुग्राम। अहीरवाल को सैनिकों की खान कहा गया है। यहां की माटी और हवा में न जाने एेसा क्या है जो इलाके के युवाओं को अपनी जान देश पर कुर्बान करने के लिए प्रेरित करती आ रही है। रेजांगला से लेकर कारगिल के युद्ध तक यह बात साबित हो चुकी है। अहीरवाल इलाका  भारतीय सेना में सबसे ज्यादा जवान देने का श्रेय हासिल करने वाले सैन्य इतिहास में हमेशा गौरवान्वित करता रहा है। 1914 के प्रथम युद्ध से यहां के युवा सेना में भर्ती होना शुरू हुए थे और आज भी यह सिलसिला जारी है। अहीरवाल में तीन गांव ऐसे हैं जहां हर दूसरे-तीसरे घर से फौजी है। प्रथम युद्ध से लेकर कारगिल तक में यहां के जवान बहादुरी से लड़े, कुछ शहीद हुए तो कुछ लड़ाई जीतकर गांव पहुंचे। 

पौने 18 वर्ष की उम्र में शहीद हुआ बिजेंद्र पटौदी

18 वर्ष से कम आयु वाला वोट नहीं दे सकता, लेकिन फौज में भर्ती होकर देश के लिए अपनी जान दे सकता है। यही हकीकत है सैनिकों की खान कहलाने वाले अहीरवाल के पटौदी क्षेत्र की। आजादी के बाद सेना के इतिहास में कारगिल युद्घ में पौने 18 वर्ष की आयु में गांव दौलताबाद कूणी के बिजेंद्र कुमार ने देश सहित दुनिया के युवाआें के सामने एक अनौखी इबारत सेना के इतिहास में लिख छोड़ दी है।

एक अक्तूबर 1981 को कूणी गांव में जगमाल के यहां जन्मा बिजेंद्र कुमार एमएलए सीनियर सेकेंडरी स्कूल जाटौली-हेलीमडी में 11वीं कक्षा में पढ़ते हुए ही 19 मार्च 1998 को 13 कुमाऊं बटालियन में सैनिक भर्ती हो गया था। 30 अगस्त 1999 को आपरेशन मेघदूत के तहत कारगिल युद्घ में 5685 चोटी को पाक सैनिकों से मुक्त कराते हुए वह शहीद हो गया। दो सितंबर 1999 को युवा शहीद का शव पैतृक गांव कूणी पहुंचा और सैनिक सम्मान के साथ शहादत को सभी ने सलाम किया।

बिजेंद्र के अलावा कूणी गांव के ही मूल निवासी कैप्टन परमजीत कारगिल युद्घ के दौरान हवाई हादसे का शिकार हो देश के काम आए। मुमताजपुर गांव के लांस नायक आजाद सिंह पटौदी क्षेत्र के पहले सैनिक थे, जो कारगिल युद्घ में शहीद हुए। लोहचबका गांव के भागीरथ भी इसी दौर में ही अक्तूबर माह के दौरान उत्तर-पूर्व की सबसे उंची चोटी गौरीशंकर पर शहादत को प्राप्त हुए। 

कारगिल के पहले शहीद  सुखबीर सिंह

गांव धामलावास निवासी डिप्टी कमांडेंट सुखबीर  सिंह को अहीरवाल क्षेत्र कारगिल के प्रथम शहीद के रूप में हर वर्ष नमन करता है। 26 मई 1999 को सायं पौने आठ बजे अपने साथियों सहित कारगिल क्षेत्र के छेनीगुंढज इलाके में बर्फीली सर्द हवाओं के बीच मुस्तैदी से तैनात थे। वे एक चेक पोस्ट का निरीक्षण करने जा रहे थे, तभी घाटी में घात लगाकर बैठे पाक आतंकवादियों ने गोलियां बरसानी शुरू कर दी। आवाज सुनकर सुखबीर ङ्क्षसह चौकन्ने हो चुके थे। उन्होंने जवाबी फायर किया, लेकिन गोलाबारी के बीच उग्रवादियों ने एक गोला उनकी ओर फेंक दिया। सुखबीर ङ्क्षसह गंभीर रूप से घायल हो गये, परंतु उन्होंने धैर्य नहीं खोया तथा घायल होने के बावजूद जवानों को दुश्मनों से ल?ने का आदेश देते रहे। घायल सुखबीर को तत्काल श्रीनगर के आर्मी अस्पताल में पहुंचाया गया, परंतु उनका जीवन बचाया नहीं जा सका। वर्ष 1999 में उन्हें जम्मू-कश्मीर में तैनात किया गया, परंतु यह उनकी अंतिम नियुक्ति सिद्ध हुई। 26 मई 1999 को देश के लिए वे शहीद हो गए।

प्रथम विश्व युद्ध में लड़े थे 247 जवान

देश को आजाद कराने और स्वतंत्रता को बनाए रखने में 12 हजार से ज्यादा की आबादी वाले कोसली वीर सैनिकों की वीर भूमि बन चुका है। प्रथम विश्वयुद्ध में कोसली से 247 लोगों ने भाग लिया था।  इसके बाद विक्टोरिया क्रॉस, महाबीर चक्र व वीर चक्र के अलावा अनेक शौर्य पदकों से अलंकृत वीरों ने अपनी बहादुरी व पराक्रम के बल पर सैन्य इतिहास में अनूठी पहचान बनाई है। प्रथम व द्वितीय विश्वयुद्ध के अलावा स्वतंत्रता संग्राम, वर्ष 1962 के भारत-चीन, 1965 व 1971 के भारत पाक की लड़ाइयों, कारगिल ऑपरेशन विजय और आजाद हिंद फौज में भी सक्रिय भूमिका निभाई। गांव से सेना में ब्रिगेडियर, मेजर जनरल, कर्नल के अलावा 115 लेफ्टिनेंट कर्नल से लेकर लेफ्टिनेंट, मेजर, कैप्टन सेना की तीनों कोर वायु सेना, थल सेना, जल सेना में करीब 350 सैनिक देश सेवा में लगे हुए हैं। इसके अलावा करीब 400 पूर्व सैनिकों के साथ 13 कर्नल, 3 ब्रिगेडियर, वायु सेना के तीन विंग कमांडर रिटायर हो चुके हैं।  शहीदों के लिए स्मारक कोसली के सैनिक रेस्ट हाउस परिसर में बने युद्ध स्मारक स्थल पर रेवाड़ी जिले के साथ झज्जर, गुरुग्राम, भिवानी, रोहतक के वीर सैनिकों व शहीदों के नाम अंकित हैं।

कभी नहीं लड़े अंग्रेजों के लिए

कोसली में करीब 5200 की आबादी वाले इस गांव के हर पांचवें घर में फौज की वर्दी है। देश की आजादी में भी इस गांव का विशेष योगदान रहा। यहां के जवान कभी अंग्रेजों के लिए नहीं लड़े। नेताजी सुभाषचंद्र बोस की आजाद हिंद फौज में सबसे पहले यहां के युवाओं ने भाग लिया। सन 1962 में भारत-पाक युद्ध में गांव के रामचंद्र ने अपने अदम्य सौम्य से वीर चक्र प्राप्त किया तो कारगिल युद्ध में साधुराम ने शहादत देकर गांव की मिट्टी को गौरवान्वित किया।  आज भी काफी संख्या में युवा सेना में भर्ती होने के लिए दिन रात पसीना बहाते हैं। गांव के सरपंच मनोज कुमार की माने तो इस समय 1200 के लगभग फौजी रिटायर होकर या सेना में डयूटी दे रहे हैं।

कारगिल में रेवाड़ी के तीन जवान शहीदसेना में वीरता दिखाने की जब कभी बात आती है तो सबसे आगे सीना ताने रेवाड़ी के जवान ही खड़ेे नजर आते हैं। आजादी से पूर्व बलिदान देने वाले महापुरुषों की वीरता आज भी यहां के युवाओं की रग रग में हैं। आजादी के बाद जितने युद्ध हुए सभी में यहां के जवानों का शौर्य सामने आया है। कारगिल की दुर्गम चोटी पर तिरंगा फहराने निकली भारतीय सेना में जिला के वे तीन जवान भी शामिल थे जिन्होंने सीने पर गोली खाकर भी भारत माता का जयघोष किया। कारगिल में भी यहां के जवानों का बलिदान स्वर्ण अक्षरों में लिखा हुआ है। रेजांगला की दुर्गम पहाडिय़ों की तरह ही कारगिल क्षेत्र में भी भौगोलिक स्थिति भारतीय सैनिकों के विपरीत थी, लेकिन सैनिकों का जज्बा दुश्मन पर भारी पड़ा।





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