स्वामी विवेकानंद ने पूरी दुनिया को अपने अमूल्य ज्ञान से अलोकित किया

4 जुलाई 2019, दुनिया में भारतीय सभ्यता-संस्कृति का प्रचार-प्रसार करने वाले महान संत स्वामी विवेकानंद जी की 117वीं पुण्यतिथि पर स्वयंसेवी संस्था ग्रामीण भारत के अध्यक्ष वेदप्रकाश विद्रोही ने अपने कार्यालय में उन्हे भावभीनी श्रद्धांजली अर्पित की। प्रदीप यादव, कपिल यादव, अमन एडवोकेट, यश यादव व अजय कुमार ने भी स्वामी जी को अपने श्रद्धासुमन अर्पित किये।

इस अवसर पर विद्रोही ने कहा कि अमेरिका व यूरोप में भारतीय सभ्यता-संस्कृति, वेद, उपनिषद का प्रचार-प्रसार करने में स्वामी विवेकानंद जी का विशेष योगदान रहा। अपने 39 साल के छोटे से जीवनकाल में ना केवल उन्होंने पूरी दुनिया को भारतीय संस्कृति व सभ्यता का अमूल्य ज्ञान दिया अपितु पूरे भारत को भी अपनी विद्धता से प्रभावित किया। स्वामी जी की शिक्षाओं, ज्ञान, लेखों, कार्यो से आज भी हम प्ररेणा लेते है। विद्रोही ने कहा कि एक मई 1897 को कलकत्ता में स्वामी विवेकानंद जी ने जिस रामकिशन मिशन की स्थापना की थी वह आज वट वक्ष बनकर पूरी दुनिया व भारत को ना केवल भारतीय सभ्यता-संस्कृति का ज्ञान दे रहा है अपितु अपने सेवा कार्यो से मानवता व गरीबों की बहुत बड़ी सेवा भी कर रहा है।

स्वामी जी ने सिस्टर निवेदिता के साथ अपनी वर्ष 1899 की दूसरी यूरोप यात्रा में विदेशों में वेदान्ता सोसाईटीज की भी स्थापना की जो आज अमेरिका-यूरोप सहित पूरी दुनिया में वेद, उपनिषद व भारतीय सभ्यता-संस्कृति का ज्ञान देती है। विद्रोही ने कहा कि 12 जनवरी 1863 को कलकत्ता में हाईकोर्ट के अर्टानी विश्वनाथ दत्ता के घर जन्मे नरेन्द्र नाथ दत्ता ने स्वामी विवेकानंद बनकर पूरी दुनिया को अपने जीवनकाल और आज भी प्ररेणा स्त्रोत है। वर्ष 1881 में युवा नरेन्द्रनाथ दत्ता रामकिशन परमहंस के सम्पर्क आये और उनके शिष्य बने। 31 मई 1893 को स्वामी विवेकानंद बनकर स्वामीजी ने बम्बई से जापान, चाईना, कनाडा होते हुए 30 जुलाई 1893 को शिकागो अमेरिका में विश्व धर्म संसद में भाग लेने पहुंचे। शिकागो में 11 सितम्बर से 27 सितम्बर तक हुई विश्व धर्म संसद में स्वामी जी ने भाग लेकर बहनों व भाईयों से शुरू किये अपने सम्बोधन से पूरी दुनिया को प्रभावित किया। स्वामीजी ने भारतीय सभ्यता-संस्कृति, वेद, उपनिषद के बारे में पूरी दुनिया को ज्ञान देकर भारतीय ज्ञान की धाक जमाई।

दो वर्ष तक अमेरिका, यूरोप में वेद, उपनिषद का प्रचार-प्रसार करके वे भारत लौटे और रामकिशन मिशन की स्थापना करके वेद, उपनिषद, संस्कृति के प्रचार-प्रसार में जुट गए। वर्ष 1899 में सितम्बर निवेदिता के साथ फिर यूरोप गए और वहां उनका स्वास्थ्य बिगडने पर वापिस लौट आये। बेल्लूर मठ में 4 जुलाई 1902 को स्वामीजी ने 39 वर्ष की आयु में इस नश्वर शरीर को त्यागने से पहले भारत सहित पूरी दुनिया अपने अमूल्य ज्ञान से अलोकित किया जो आज भी हमारे लिए प्ररेणा का स्त्रोत है। ऐसे महान संत को उनकी पुण्यतिथि पर शत-शत नमन। 

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