अपने ही देश में हिन्दी की दुर्गति क्यों?’ :डॉ. वेदप्रताप वैदिक

– मुकेश शर्मा

डॉ.वेदप्रताप वैदिक
– मुकेश शर्मा

हाल ही में दक्षिण भारतीय राज्यों के विरोध के कारण केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे से हिन्दी की अनिवार्यता को खत्म कर दिया।अब संशोधित शिक्षा नीति के मसौदे में हिन्दी की अनिवार्यता का कोई ज़िक्र नहीं है।

केंद्र सरकार के इस फैसले ने एक बार फिर से इस सवाल को खड़ा कर दिया कि भला हिन्दुस्तान में ही हिन्दी की ऐसी दुर्गति क्यों?इस सिलसिले में हिन्दी कथाकार मुकेश शर्मा ने हिन्दी को भारत और विश्व मंच पर स्थापित करने के लिए प्रयत्नशील और भाषा के सवाल पर स्वामी दयानंद सरस्वती, डॉ.राममनोहर लोहिया की परम्परा को आगे बढ़ाने वाले भारतीय भाषा सम्मेलन के अध्यक्ष एवं देश के जानेमाने हिन्दी पत्रकार, विश्लेषक डॉ.वेदप्रताप वैदिक से बातचीत की।प्रस्तुत हैं इस बातचीत के प्रमुख अंश:

प्र.:हाल ही में केन्द्र सरकार ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति के मसौदे से हिन्दी की अनिवार्यता को खत्म कर दिया है।इस पर आपकी क्या प्रतिक्रिया है?

उ.: केन्द्र सरकार ने दक्षिण भारतीय राज्यों में हिन्दी को नकार कर  72 साल पुरानी नीति को ही दोहरा दिया है।सरकार में दम होना चाहिए।यदि सरकार कह दे कि देश में अंग्रेजी की अनिवार्यता नहीं होगी,भले ही इसके लिए कानून लाना पड़े।सरकार अपना कामकाज हिन्दी भाषा में करे।तब नतीजा यह होगा कि लोग स्वतः हिन्दी की ओर बढ़ेंगे।

हिन्दी की अनिवार्यता के लिए मैंने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मोहन भागवत से बात की।पुराने समय में पं.दीनदयाल उपाध्याय, अटलबिहारी वाजपेयी से भी बात की।

मैंने अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति पर अपना शोध ग्रन्थ हिन्दी में लिखा जिस कारण जेएनयू के स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज ने मेरी छात्रवृत्ति रोक दी थी।तब 1966-67 में संसद में इस मुद्दे पर हंगामा हुआ और परिणामस्वरूप इंदिरा गांधी की पहल पर स्कूल के संविधान में संशोधन करना पड़ा और मुझे वापस लेना पड़ा।

प्र.: दक्षिण भारतीय राज्यों को हिन्दी से भला क्या दिक्कत हो सकती है?

उ.: दरअसल हिन्दी वाले पाखण्ड बहुत फैलाते हैं।अंग्रेजी की अनिवार्यता के कारण यहां भारत और इण्डिया दो अघोषित देश बन गए हैं।जब दक्षिण वाले हिन्दी सीखते हैं तो वे व्याकरण की दृष्टि से हमसे भी शुद्ध हिन्दी बोलते हैं।यदि अंग्रेजी की अनिवार्यता को खत्म करके यह व्यवस्था बना दी जाए कि हिन्दी वाले अहिन्दी भाषा सीखें और अहिन्दी वाले हिन्दी भाषा सीखें तो स्वतः समाधान हो जाएगा।

प्र.: क्या हिन्दी भाषा अपनाने वालों को ‘दूसरे दर्ज़े का नागरिक’ समझा जा रहा है?

उ.: यहां अंग्रेजी को रानी और हिन्दी को नौकरानी बना रखा है।हम किसी विदेशी भाषा के विरुद्ध नहीं हैं,बल्कि इस बात के पैरोकार हैं कि उस विदेशी भाषा की अनिवार्यता नहीं होनी चाहिए।अमेरिका, रूस,चीन,फ्रांस, ब्रिटेन जैसे वीटो पावर वाले देशों में भी किसी विदेशी भाषा की अनिवार्यता नहीं है, जबकि विश्व के 49 पूर्व गुलाम देशों में ऐसा ही है।

यहां तो दवाई भी लेनी हो तो अंग्रेजी चाहिए।कांग्रेस के इस मजाक को भाजपा भी चुनौती नहीं दे पायी।जबकि उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव ने अंग्रेजी को अनिवार्य भाषा से हटाकर एच्छिक भाषा बना दिया था।इसीकी ज़रूरत है।

प्र.: क्या हिन्दी पढ़कर बड़ा वेतन लेने लायक करियर बनाया जा सकता है?

उ.: देखिए, आज अंग्रेजी भारत और इण्डिया के बीच एक अदृश्य दीवार की तरह से है।जब बीच में से अंग्रेजी हट जाएगी तो हिन्दी भाषा के माध्यम से ही एक अच्छा करियर बनाया जा सकेगा।

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