अभी झांकियां बाकी हैं दोस्त

कमलेश भारतीय

दशहरा संपन्न हो गया । शहर शहर चल रही रामलीलाएं भी संपन्न हो गयीं । प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से लेईर हर छोटे बडे नेता ने रावण के पुतले को जलाया । देश भर में लाखों करोडों के पुतले फूंके गये । किसी ने भी भ्रष्टाचार , रेप करने वाले रावणों और महंगाई के रावण को जलाने की हिम्मत नहीं दिखाई । बेरोजगारी के पुतले को नहीं जलाया । बस । दिखावे के रावण को मारा । जलाया । ताली बजाई और घर आ गये । प्रदूषण का ख्याल नहीं रखा । इको फ्रेंडली नहीं रहे ।

टीवी पर सिया के राम में कैकेयी का रोल निभा रही एक्ट्रेस ग्रूशा कपूर ने अपनी फेसबुक पर व्यंग्य करते लिखा है कि एक रावण के पुतले को जलता देखने कितने ही रावण आए । सच ही व्यंग्य किया । कितने रावण समाज में विचर रहे हैं और उनकी पहचान मुश्किल है । रावण राम का वेश धारण किए हैं तो पहचान कैसे हो ? हम भ्रष्टाचार , बेरोजगारी , पर्यावरण प्रदूषण के रावण को मारने आगे आएं । हम भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाएं । सीता की हर कदम पर अग्निपरीक्षा के खिलाफ आवाज उठाएं । साम्प्रदायिकता के रावण को जलाएं । बहुत से काम हैं जो धन से हो सकते हैं । फिर क्यों पुतले जलाने पर खर्च करें ? परंपरा के नाम पर कुछ नया शुरू करें । रावणों के अट्ठहासों को सुनें । इन पर अंकुश लगाने का काम करें । केवट व शबरी की आवाज व पुकार सुने । आइए नयी रामायण रच डालें ।

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