वेदप्रकाश विद्रोही ने साहित्यकार व मूर्घन्य पत्रकार बाबू बालमुकुंद गुप्त जी की 112वीं पुण्यतिथि पर भावभीनी श्रद्धाजंली दी

18 सितम्बर 2019, स्वयंसेवी संस्था ग्रामीण भारत के अध्यक्ष एवं हरियाणा प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व प्रवक्ता वेदप्रकाश विद्रोही ने साहित्यकार व मूर्घन्य पत्रकार बाबू बालमुकुंद गुप्त जी की 112वीं पुण्यतिथि पर अपने कार्यालय में भावभीनी श्रद्धाजंली दी। कपिल यादव, अमन यादव, अजय कुमार, प्रदीप यादव ने भी अपनेे श्रद्धासुमन गुप्तजी को अर्पित किये।

विद्रोही ने कहा कि पत्रकारिता व हिन्दी साहित्य में बाबू बालमुकुंद गुप्तजी का नाम स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज है। गुडियानी गांव में 14 नवम्बर 1865 को जन्मे गुप्तजी मात्र 42 वर्ष की आयु में 18 सितम्बर 1907 को इस नश्वर संसार सेे चले गए थे। लेकिन इतने अत्पकाल में उन्होंने हिन्दी साहित्य व हिन्दी पत्रकारिता की जो सेवा की, उससे हिन्दी जगत व पूरा देश सदैव उनका आभारी रहेगा। ऐसे मुर्घन्य पत्रकार, साहित्यकार, लेखक, हिन्दी गद्य के जनक बाबू बालमुकुंद गुप्तजी को उनकी 112वीं पुण्यतिथि पर शत-शत नमन।

बालमुकुंद गुप्त : जीवन परिचय

बाबू बालमुकुंद गुप्त का जन्म  हरियाणा राज्य में रेवाड़ी जिला के गांव गुडियाना में 14 नवम्बर सन् 1865 ईo में हुआ था।  इनके पिता का नाम लाला पूरणमल तथा पितामह का नाम लाला गोवर्धनदास था।  इनका परिवार बख्शी राम  वालों के नाम से प्रसिद्ध था।  इनका लालन पोषण इनकी विधवा चाची के द्वारा किया गया था।  पंद्रह वर्ष की अल्पायु में इनका विवाह एक प्रतिष्ठित परिवार में अनार देवी के साथ हुआ था।  गुप्त जी की प्रारम्भिक शिक्षा गांव के ही मदरसे में उर्दू माध्यम से हुई।  दस वर्ष की आयु में इन्हें राकिन स्कूल में प्रविष्ट करवाया गया।  इनके स्कूल के प्रिंसिपल इनकी अध्ययनशील और सहनशील प्रकृति से बहुत प्रभावित थे।  स्कूल स्तर पर इन्हे पुरे पंजाब का सर्वश्रेष्ठ छात्र घोषित किया गया था और इन्हे छात्रवृति भी दी गयी थी परन्तु अपने दादा और पिता की मृत्यु के कारण ये अपनी शिक्षा पूरी नहीं कर पाए थे।  बाद में इन्होने फिर से पढ़ना शुरू किया और इक्कीस वर्ष की आयु में सन्  1886 में मिडिल कर सके थे।  इन्हें उर्दू भाषा पर विशेष अधिकार था।                              

इसके अतिरिक्त गुप्त जी गंभीर चिंतक , प्रभावशाली निबंधकार, ओजस्वी वक्ता, निर्भीक एवं निष्पक्ष आलोचक,  कुशल अनुवादक,  सहृदय कवि और संवेदनशील समाजसेवी के रूप में राष्ट्रीय स्तर पर जाने जाते हैं।  उन्होंने अंग्रेजी शासन की दमनकारी नीतियों के विरुद्ध शंखनाद किया।  छद्म नाम से “शिवशम्भु के चिट्ठे” , “चिट्ठे और खत”, तत्कालीन लार्ड कर्जन और मिंटो के नाम से “भारत मित्र” में लिखे।  पंडित झाबरमल शर्मा और पंडित बनारसीदास चतुर्वेदी के सम्पादन में “गुप्त निबंधावली” का प्रकाशन सन् 1905 में हुआ।  आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी  और आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने उनके निबंधों की भूरि-भूरि प्रशंसा की है।  डॉo नत्थन सिंह के सम्पादन में “बालमुकुंद गुप्त ग्रंथावली” हरियाणा साहित्य अकादमी पंचकूला से सन् 1993 में प्रकाशित हुई।                                           

 गुप्त जी के निबंध आत्मपरक विचारात्मक, व्यंग्यात्मक,  साहित्यिक,  सामाजिक,  राजनीतिक और सांस्कृतिक आदि विषयों से संबंधित हैं।  उन्होंने अपने निबंधों में राष्ट्रीय चेतना और राष्ट्रभाषा हिंदी की उन्नति में  अभूतपूर्व योगदान दिया।  इनके निबंधों की भाषा सहज, सरल, प्रौढ़ , परिष्कृत और प्रवाहपूर्ण है।  स्वभाविकता और व्यंग्यात्मकता इनकी शैली के गुण हैं।  राष्ट्रभाषा हिंदी और देश के लिए यह दुर्भाग्य था कि मात्र 42 वर्ष की अल्पायु में ही 18 सितम्बर सन् 1907 को उनका स्वर्गवास हो गया।  हिंदी गद्य के उन्नायकों में वे चिरस्मरणीय रहेंगे।  

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