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न्यायसंगत नहीं हैं ट्रैफिक-जुर्माने

Sep 5, 2019

मुकेश शर्मा, राजनीतिक विश्लेषक

लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी के चेहरे को देखकर भाजपा गठबंधन को बहुमत दिलाने वाले मतदाताओं ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि इसके ऐवज में जल्दी ही उन्हें क्या मिलने वाला है।
केन्द्र सरकार द्वारा नया मोटर वाहन (संशोधन) अधिनियम,2019 को पारित कराके जो जुर्माने की नयी दरें लागू की गई हैं, वे न्यायसंगत प्रतीत नहीं हो रही हैं।प्राकृतिक न्याय की तो धज्जियाँ उड़ती प्रतीत हो रही हैं।

यही सही है कि इससे पूर्व लागू जुर्माने की दरें आज के समय में प्रासंगिक नहीं रह गई थी, उन्हें बढ़ाने की ज़रूरत थी।लेकिन यह वृद्धि न्यायसंगत होनी चाहिए, आम लोगों को सुधार का रास्ता दिखाने वाली हों,न कि उन्हें नष्ट कर देने वाली।यह वृद्धि तो इस तर्ज़ पर हो गई कि जैसे गरीबी को हटाने के लिए गरीब को ही मार दो।

बिना ड्राइविंग लाइसेंस के ड्राइविंग करने पर पाँच हजार रुपये, ड्राइविंग के दौरान मोबाइल फोन पर बातचीत, जुर्माना पाँच हजार रुपये, बिना परमिट दस हजार रुपये, बिना इन्श्योरेंस दो हजार रुपये, नाबालिग ने वाहन चला दिया तो उसके अभिभावक दोषी,सजा का प्रावधान।
यह सही है कि इन सबकी रोकथाम ज़रूरी है, लेकिन क्या ये जुर्माने के प्रावधान अधिक कठोर नहीं हैं?इस मामले में लोगों में जागरुकता लाने के लिए, सामाजिक चेतना लाने के लिए सरकार ने क्या किया?

हाईवे पर सड़कें ठीक तो टोल टैक्स दो।शहर,गाँव, कस्बों में सड़कें टूटी रहें, किसी पर जुर्माना नहीं।चौराहों, गलियों में लाइटें खराब पड़ी रहें, किसी पर जुर्माना नहीं।थोड़ी सी बारिश से शहर में जाम ,जुर्माना किसी पर नहीं।क्या यही प्राकृतिक न्याय है कि जनता नियमों का पालन न करे तो उन्हें आर्थिक तौर पर तोड़ देने वाले प्रावधान, लेकिन सरकारी तंत्र अपनी सही ड्यूटी न करे तो ऐसे किसी जुर्माने का प्रावधान नहीं।क्या ये प्रावधान एकतरफा नहीं हैं?

यदि ये जुर्माने बढ़ाने ही थे तो इनकी पुरानी दरों को दो गुणा या थोड़ा और अधिक कर सकते थे,सीधे ही पुरानी दर पाँच सौ रुपये से दस हजार रुपये, यह न्यायसंगत नहीं लग रहा।
लिहाजा अजीब स्थिति बन रही हैं।पुराने दुपहिया वाहन की कीमत पन्द्रह हजार रुपये, लेकिन जुर्माना लग गया तेईस हजार रुपये।लोन लेकर वाहन लिया,जुर्माना ऐसा कि कर्जाई की सिट्टी-पिट्टी गुम।ट्रैफिक नियमों की अवहेलना करके चलना गलत है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि आम लोगों को ऐसा कड़ा आर्थिक दण्ड दें।क्या इन बढ़ी दरों से भ्रष्टाचार नहीं बढ़ेगा?सरकार अपने ट्रैफिक विभाग को रिश्वत लेने से रोक लेगी?

यदि इन दरों को मानवीय आधार पर संशोधित नहीं किया गया तो ध्यान रहे आने वाले चुनाव में यह जनता भी सरकार पर जुर्माना लगा सकती है।विधानसभा चुनावों में ही सरकार को अपने इस फैसले के परिणाम की झलक मिल जाएगी।

राष्ट्रवाद का नाम लेकर नोटबंदी,लचर और जटिल जीएसटी, नौकरियाँ खत्म हो रही हैं, व्यापार में न टूट पाने वाली मंदी,लेकिन तब भी देश ने मोदी के नाम पर सरकार का साथ दिया।कारण कमजोर और नेतृत्व विहीन विपक्ष, विजन का अभाव।लेकिन यह बार-बार नहीं होगा।ऐसे कठोर फैसले जनता का सरकार से मोहभंग कर सकते हैं।क्या से क्या हो गया, बेवफा तेरे प्यार में

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