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-कमलेश भारतीय

महात्मा गांधी ने सत्याग्रह का मंत्र दिया था स्वतंत्रता पूर्व जो बाद में भी समय समय पर सत्ता से विरोध के लिए उपयोग किया जाने लगा । सत्याग्रह यानी जो सत्य है उसको मनाने के लिए आग्रह करना लेकिन शान्तिपूर्वक । पहले तीन कृषि कानून आये जिनका विरोध किया किसानों ने और काफी हद तक पूरे एक साल शान्तिपूर्वक ढंग से ही यह आंदोलन चलाया । तब भी यही बात कही जाती रही कि ये कानून वापस नहीं लिये जायेंगे लेकिन किसानों के सत्याग्रह में इतना दम निकला कि एक दिन खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इन कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा करनी पड़ी। । अब भी यही कहा जा रहा है कि यह अग्निपथ वापस नहीं लिया जायेगा । बड़े बड़े पदों पर तैनात रहे सैन्य शक्ति के लोग भी यही कह रहे हैं और इसकी तारीफ कर रहे हैं । मन में आता है कि इनसे पूछ लें कि यदि आपको भी चार साल ही मिलते सेवा करने को तो ये बड़े पद कैसे मिलते ? सोचिये तो एकबार बड़े अधिकारी साहब ? ऊपर से सैन्य अधिकारी मीडिया में आकर सरकार की बजाय खुद इसे डिफेंड ही नहीं कर रहे बल्कि यह धमकी भी दे रहे हैं कि जो युवा इन प्रदर्शनों में भाग लेंगे उन्हें सेना की सेवा के अयोग्य माना जायेगा । यह रवैया कैसे और सैन्य अधिकारियों की बजाय यह बात तैयार रक्षामंत्री राजनाथ सिंह को कहनी चाहिए । सेना की दखलअंदाजी बहुत दुखद है । आखिर युवाओं की सुनिये ।

दूसरी तरफ कांग्रेस ने महात्मा गांधी के सत्याग्रह की फिर से शुरु किया इस अग्निपथ के खिलाफ । प्रियंका गांधी भी इसे वापस लिये जाने का बैनर पकड़कर आईं । दीपेन्द्र हुड्डा को घर में ही नजरबंद कर दिया गया था और उन्होंने जवाब में पुलिस वालों को पिलाई चाय और खिलाये समोसे । यह भी गांधीवादी जवाब ही तो था । किसी को बुरा भला न कहा बल्कि चाय पिला दी । इस सत्याग्रह से कांग्रेस में एक नयी चेतना तो आई है । यदि ऐसे ही सत्याग्रह रसोई गैस सिलेंडर के दिन बढ़ने पर की जाती तो आम आदमी भी जुड़ाव महसूस करता । जैसे जैसे राहुल गांधी पर ईडी का दवाब बनाया वैसे वैसे सत्याग्रह भी तेज हुआ । अभी फिर पूछताछ होनी है । कांग्रेस को जनता के जरूरी मुद्दों पर सत्याग्रह चलाना चाहिए न कि सिर्फ ईडी के दबाब से मुक्त होने के लिए ।

दूसरी ओर भाजपा इसे राजनीति करार दे रही है । संबित पात्रा कह रहे हैं कि यह सत्याग्रह शुद्ध राजनीति है कांग्रेस की ओर से । सरकार को अस्थिर करने की योजना है । इसका लक्ष्य सरकार को गिराना है । सशस्त्र बलों और युवाओं की चिंता नहीं है । यह दुखद है । फिर वे याद दिलाते हैं कि सेनाओं में युवाओं की औसत आयु कम करने का प्रस्ताव सन् 1989 में किया गया था यानी कांग्रेस शासन काल में तो आप इसे वापस क्यों लाये ? लाये तो कृषि कानूनों की तरह रद्द क्यों नहीं कर सकते ? इतना विरोध और इतना नुकसान किसलिये ? एक साल लम्बे चले कृषि आंदोलन से अभी देश उबर नहीं पाया था कि यह अग्निपथ दुखती रग की तरह सामने आ गया । जरा विरोध को आवाज सुनिये । इसे सिर्फ कांग्रेस का आंदोलन न मान कर चलिये । किसान आंदोलन के पीछे कांग्रेस का हाथ मान कर हठधर्मी अपना ली थी और फिर इतना नुकसान झेला ।

यदि सत्याग्रह की बात करें तो महात्मा गांधी ने भी अंग्रेजो की अनुचित नीतियों के विरोध में ही शुरु किया था । लाला लाजपत राय ने भी तो साइमन कभीशन का विरोध किया और प्राण दे दिये । इसलिए सत्याग्रह को राजनीति से जोड़कर देखना कोई बहुत सही नहीं । इसे युवाओं के साथ जोड़कर देखने पर ही कोई हल निकलेगा । देखने का कोण बदल लीजिए ।
-पूर्व उपाध्यक्ष, हरियाणा ग्रंथ अकादमी ।

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