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राजमाता ने जनसेवा से कभी मुख नहीं मोड़ा

हेमेन्द्र क्षीरसागर, लेखक, पत्रकार व विचारक

राजमाता विजया राजे सिंधिया त्याग एवं समर्पण की प्रति मूर्ति थी। उन्होंने राजसी ठाठ-बाट का मोह त्यागकर जनसेवा को अपनाया तथा सत्ता के शिखर पर पहुँचने के बाद भी उन्होंने जनसेवा से कभी अपना मुख नहीं मोड़ा। विजयाराजे सिंधिया का जन्म 12 अक्टूबर 1919 को सागर, मध्य प्रदेश के राणा परिवार में हुआ था। इनके पिता नाम महेन्द्रसिंह ठाकुर था और विजयाराजे सिंधिया की माता नाम श्रीमती विंदेश्वरी देवी थीं। विजयाराजे सिंधिया का विवाह के पहले का नाम ‘लेखा दिव्येश्वरी’ था। इनका विवाह 21 फ़रवरी, 1941 में ग्वालियर के महाराजा जीवाजी राव सिंधिया से हुआ था। विजयाराजे के बेटे नाम माधवराव सिंधिया, बेटी का नाम वसुंधरा राजे सिंधिया, यशोधरा राजे सिंधिया और पौत्र ज्योतिरादित्य सिंधिया हैं। विजया राजे सिंधिया अपने पति जीवाजी राव सिंधिया की मृत्यु के बाद संसद सदस्य बनीं थीं। अपने सैध्दांतिक मूल्यों के दिशा निर्देश के कारण विजया राजे सिंधिया कांग्रेस छोड़कर भाजपा में शामिल हो गईं। तब से लेकर उन्होंने अनेकों बार संसद और विधानसभा का कुशल नेतृत्व किया। 1998 से राजमाता का स्वास्थ्य ख़राब रहने लगा और 25 जनवरी, 2001 में राजमाता विजया राजे सिंधिया का निधन हो गया।

अतुलनीय, सौम्य, शालीन और विनम्र छवि ज़िंदगी के कड़वे अनुभवों के बावजूद राजमाता को करीब से जानने वाले बताते हैं कि वो बेहद सहज महिला थीं। कोई उन्हें ‘प्रिंसेस’ या ‘राजकुमारी’ कहता था, तो वो इसका विरोध करती थीं। ‘मुझे सब लेखी देवी ही कहते हैं, वही कहिए’, अक्सर दूसरों को इसी तरह टोकती थीं। राजमाता जी कहती भी थीं- “मैं एक पुत्र की नहीं, मैं तो सहस्रों पुत्रों की मां हूं, उनके प्रेम में आकंठ डूबी रहती हूं।‘’ उल्लेखनीय, पिछली शताब्दी में भारत को दिशा देने वाले कुछ एक व्यक्तित्वों में राजमाता विजयाराजे सिंधिया भी शामिल थीं। राजमाताजी केवल वात्सल्यमूर्ति ही नहीं थीं, वो एक निर्णायक नेता थीं और कुशल प्रशासक भी थीं। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आजादी के इतने दशकों तक, भारतीय राजनीति के हर अहम पड़ाव की वो साक्षी रहीं। 

अभिभूत, विवाह से पहले राजमाताजी किसी राजपरिवार से नहीं थीं, एक सामान्‍य परिवार से थीं। लेकिन विवाह के बाद उन्होंने सबको अपना भी बनाया और ये पाठ भी पढ़ाया कि जनसेवा के लिए, राजकीय दायित्वों के लिए किसी खास परिवार में जन्म लेना ही जरूरी नहीं होता। अनुकरणीय, कोई भी साधारण से साधारण व्यक्ति, जिनके भीतर योग्यता है, प्रतिभा है, देश सेवा की भावना है वो इस लोकतंत्र में सत्ता को भी सेवा का माध्यम बना सकता है। आप कल्‍पना कीजिए सत्‍ता थी, संपत्ति थी, सामर्थ्‍य था, लेकिन उन सबसे बढ़कर जो राजमाता की अमानत थी, वो थी संस्‍कार, सेवा और स्‍नेह की सरिता। ये सोच, ये आदर्श उनके जीवन के हर कदम पर हम देख सकते हैं। अगर राजमाताजी चाहती तो उनके लिए बड़े से बड़े पद तक पहुंचना मुश्किल नहीं था। लेकिन उन्होंने लोगों के बीच रहकर, गांव और गरीब से जुड़े रहकर उनकी सेवा करना पसंद किया। हम राजमाता के जीवन के हर एक पहलू से हर पल बहुत कुछ सीख सकते हैं। राजमाता के जीवन में अध्‍यात्‍म का अधिष्‍ठान था। साधना, उपासना, भक्ति उनके अन्तर्मन में रची बसी थी। लेकिन जब वो भगवान की उपासना करती थीं, तो उनके पूजा मंदिर में एक चित्र भारत माता का भी होता था। नारीशक्ति के बारे में तो वो विशेषतौर पर कहती थीं कि-“जो हाथ पालने को झुला सकता है, वह विश्‍व पर राज भी कर सकते हैं”। आज भारत की यही नारीशक्ति हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही है, देश को आगे बढ़ा रही है। आज भारत की बेटियाँ पार्टनर जेटस उड़ा रही हैं, सेनाओं में युद्ध की भूमिकाओं में अपनी सेवाएँ दे रही हैं। आज तीन तलाक के खिलाफ कानून बनाकर देश ने राजमाता की उस सोच को, नारी सशक्तिकरण के उनके प्रयास को और आगे बढ़ाया है।

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