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कमलेश भारतीय

महाराष्ट्र की अघाड़ी सरकार के गठबंधन ढीले पड़ने लगे हैं । वैसे भी यह बात सच है कि भाजपा के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह दो हार पचा नहीं पाये आज तक -पहली अहमद पटेल का अमित शाह के भारी विरोध के बावजूद राज्यसभा पहुंच जाना और दूसरा महाराष्ट्र में सारी जोड़ तोड़ करके भी भाजपा की सरकार न बनवा पाना और इसके लिए वे समय समय पर कोई न कोई तीर चलाते ही रहते हैं ।

पहले कंगना रानौत को महाराष्ट्र सरकार की छवि धूमिल करने का काम सौंपा जिसे उस अभिनेत्री ने कुशलता से अंजाम दिया । अब यह वही पुराना खेल राजनीतिक उठापटक और दलबदल का शुरू कर दिया है । इस बार एकनाथ शिंदे खुशी खुशी मोहरा बने हैं और मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे के दूत के सामने शर्त रखी है कि यदि शिवसेना भाजपा के साथ सरकार बनाये तभी वे मान सकते हैं , नहीं तो इंकार है वापसी के लिए । यह शर्त असल में तो कहीं और किसी और की है , एकनाथ शिंदे तो मोहरा भर हैं । शिंदे तीस विधायकों को लेकर सूरत चले गये हैं । यानी वही चूहे बिल्ली का खेल शुरू हो चुका है ।

इस पूरे घटनाक्रम को देखते हुए कांग्रेस ने भी अपने विधायकों को टटोलना और उन पर नजर रखनी शुरू कर दी है । इस तरह पंजाब, हरियाणा, राजस्थान के बाद यह खेल फिर से महाराष्ट्र में खेला जा रहा है । आसल में अब दलबदल को हमारा राष्ट्रीय खेल घोषित कर दिया जाना चाहिए । यह खेल क्रिकेट के आईपीएल से भी ज्यादा पैसे देता है । आईपीएल के खिलाड़ियों की तरह विधायकों की भी ऊंचे दामों पर नीलामी होने लगी है । खिलाड़ियों को समयानुसार और डिमांड के आधार पर खरीदा जाता है । फिर ये मोहरे अपना खेल दिखाते हैं । अपने जौहर दिखाते हैं । कभी क्राॅस वोटिंग करके तो कभी सरकार के विरूद्ध अविश्वास प्रस्ताव लेकर । क्राॅस वोटिंग करने वाले महाशय अभी भाजपा में जायेंगे या नहीं इस पर भी संशय के बादल मंडरा रहे हैं । पंजाब में दलबदल करते ही अवाॅर्ड में मिला संगरूर लोकसभा क्षेत्र का टिकट । इस तरह दलबदल करवाने के लिए तरकश में अनेक तीर , प्रलोभन और सम्मान होने चाहिएं तभी इस खेल में कोई आपके पाले मे आयेगा । कांग्रेस के तरकश मे तीर बहुत कम बचे हैं और महाभारत की लड़ाई तेज होती जा रही है ।

अब कहा जा रहा है कि एकनाथ शिंदे मुख्यमंत्री बनने के सपने देख रहे हैं तो भाई देवेंद्र फडणबीस कहां जायेंगे ? कहीं अजीत पवार वाली न बन जाये । चार दिनों की चांदनी , फिर अंधेरी रात । उद्धव भांप नहीं पाये खेल और, शरद पवार का कहना है कि देखते हैं । शरद पवार ने ही यह अघाड़ी सरकार बनवाई थी । अब फिर से दो दो चाणक्य आमने सामने हैं -अमित शाह और शरद पवार । देखें कौन किसको मात देता है ? एक बात तो साफ है कि लोकतंत्र तो हारेगा ही हर बार की तरह । लोकतंत्र का अपहरण होता रहेगा अब । इसे बचाने जनता को ही आगे आना होगा ।
-पूर्व उपाध्यक्ष, हरियाणा ग्रंथ अकादमी ।

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