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कमलेश भारतीय

फूलों की घाटी यानी कश्मीर उदास है जो लोग कहते थे कि कश्मीर हमारा है और हम इसे छोड़कर नहीं जाने वाले वे इसे छोड़कर जाने लगे हैं तो फूलों की घाटी उदास क्यों न हो ? स्विट्जरलैंड से पहले कश्मीर में ही फूलों के लम्बे लम्बे खेतों में फिल्मों की शूटिंग हुआ करती थी । फिल्म निर्देशकों की पहली पसंद रहा कश्मीर लेकिन अब उदास है । वैसे खुश तो पिछले तीन दशक से कभी नहीं रहा । उदासी अब ज्यादा बढ़ती जा रही है । पहले फिल्मों की शूटिंग लगभग बंद हुई , फिर पर्यटकों के आने पर असर पडा और अब तो जो प्रवासी काम काज की तलाश में दूसरे राज्यों से आए हैं वे भी लौटने की सोचने लगे । अनुमान के अनुसार सात लाख प्रवासी मजदूर है कश्मीर से जो वापसी पर गंभीर है । फूलों की घाटी में फूल तोड़ने वाले नहीं मिल रहे , होटल व्यवसाय और पर्यटक एक दूसरे से जुड़े हुए हैं । पर्यटक आएंगे तो होटल भी काम पे लग जायेंगे और शिकारे वालों को भी रोटी मिलेगी लेकिन जो आतंकवाद फैलाया इस बार वह आम आदमी पर हमला है । बढ़ई, गोलगप्पे वाले और शिक्षक के साथ साथ कैमिस्ट निशाने पर लिए ।

आम आदमी को डराने का मकसद और इससे अर्थ व्यवस्था हिलने जा रही है । कटिंग करने वाले तक प्रवासी हैं । कैसे करेंगे ? कोरोना ने पहले कटिंग रोक दी थी । छोटी से लेकर बड़ी जरूरतें प्रभावित होने जा रही हैं । फूलों की घाटी को कौन उदास होने से बचायेगा ? जब इतना प्रचार हुआ कि कोई भी कश्मीर में प्लाॅट/ज़मीन खरीद सकता है तब से मात्र दो ही बाहर के लोगों ने प्लाॅट खरीदे हैं । बाहरी लोग तो निकलना ही चाह रहे हैं , एक बार फिर यह बात आ रही है कि अब जो सन् 1990 से कश्मीर छोड़ने को तैयार न थे , वे भी सोचने लगे हैं । कश्मीर को क्या आतंकवाद के हवाले छोड़ दिया जायेगा या कि आतंकवाद में झोंक दिया जायेगा? मन की बात कहिए न साहब ? आप तो विदेश से आते हो तो इवेंट बना लेते हो । अब कश्मीर को इवेंट कब बनाओगे? अब तो आपके कश्मीरी पंडित अनुपम खेर भी आपकी नीतियों पर खुशी जाहिर करते हुए कुछ कहने नहीं आते जबकि वे कश्मीरियों की वापसी के बड़े दावेदार थे । कुछ कीजिए साहब ,,,,ये आपकी खामोशियां फूलों की घाटी की उदासी बढ़ाती जायेगी ,,

बोल कि लव आज़ाद हैं ,,
-पूर्व उपाध्यक्ष हरियाणा ग्रंथ अकादमी ।
9416047075

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