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गुरुग्राम,13 अक्टूबर। गुरुग्राम विश्वविद्यालय एवं पंजाबी साहित्य अकादमी के संयुक्त तत्वावधान में गुरु तेग बहादुर सिंह के 400वें  प्रकाश पर्व एवं बाबा बंदा सिंह बहादुर की जन्म जयंती को समर्पित एक दिवसीय ‘राष्ट्रीय संगोष्ठी‘ का आयोजन किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि दसवें वंशज एवं वर्तमान गद्दीनशीन,डेरा बाबा बंदा बहादुर रियासी (जम्मू -कश्मीर ) जतिंदर पाल सिंह सोढ़ी रहे । कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि पंजाबी साहित्य अकादमी, हरियाणा के उपाध्यक्ष सरदार गुरविंदर सिंह धमीजा और करनाल नगर निगम के संयुक्त आयुक्त गगनदीप सिंह थे।

संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में डेरा बाबा बंदा बहादुर रियासी (जम्मू -कश्मीर ) के दसवें वंशज एवं वर्तमान गद्दीनशीन जतिंदर पाल सिंह सोढ़ी ने कहा कि सिख धर्म का इतिहास  कुर्बानियों से भरा है। धर्म की रक्षा के लिए श्री गुरु गोबिंद सिंह ने अपने पूरे परिवार को न्योछावर कर दिया। धर्म के लिए सर्वस्व बलिदान करने वाले गुरु तेग बहादुर और बाबा बंदा सिंह बहादुर को कौन भुला सकता है। बाबा बंदा सिंह बहादुर के जीवन पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि बंदा बहादुर ने जागीरदारी प्रथा खत्म कर किसानों को जमीनों का मालिक बनाया और पंजाब के लोगों को गुरबाणी अनुसार जीवन यापन सिखाया। बाबा बंदा सिंह बहादुर ने न केवल लोगों को मुगलों से स्वतंत्रता दिलाने के लिए संघर्ष किया बल्कि भारत को सामाजिक, सांस्कृतिक, और धार्मिक रूप से  जागृत करने के लिए भी प्रेरित किया। आज की युवा पीढ़ी आधुनिकता की चकाचौंध में अपनी संस्कृति, सभ्यता व संस्कारों को भूलती जा रही है, जिसपर ध्यान देने की जरुरत है।

संगोष्ठी के विशिष्ट अतिथि पंजाबी साहित्य अकादमी हरियाणा के उपाध्यक्ष गुरविंदर सिंह धमीजा ने अपने उद्बोधन में कहा कि बाबा बंदा सिंह बहादुर का संघर्ष बदले की लड़ाई नहीं थी, बल्कि वास्तव में सामाजिक-धार्मिक स्वतंत्रता और आर्थिक समानता के लिए एक कड़ा संघर्ष था। उनका विद्रोह एक स्थानीय मुद्दा ही नहीं रहा बल्कि दूर-दूर तक फैलते हुए एक जन आंदोलन बन गया। उन्होंने  कहा कि बाबा सिंह का आंदोलन दलित वर्गों का आंदोलन था और समय गुजरने के साथ सभी वर्गों, धर्मों, संप्रदायों एवं जातियों के लोग उनके साथ आ जुड़े।

इस अवसर पर नगर निगम करनाल के संयुक्त आयुक्त गगनदीप सिंह ने कहा कि सिख गुरुओं के आदर्शों एवं सिद्धांतों में सच्ची आस्था दिखाते हुए बाबा बंदा सिंह बहादुर ने समानता, न्याय, धर्म निरपेक्षता तथा भाईचारे के उच्चादर्शों के लिए अपने जीवन का बलिदान दे दिया।

गुरुग्राम यूनिवर्सिटी के वाइस चांसलर डॉ. मार्कण्डेय आहूजा ने अपने विचार रखते हुए कहा कि हमारे देश का गौरवमयी इतिहास रहा है, यहां अनेक वीर सपूतों ने माँ भारती की रक्षा के लिए अपना सर्वाेच्च बलिदान दिया है। भारतीय संस्कृति के संरक्षण के लिए अपने प्राणों की आहुति दी है। गुरु तेग बहादुर और बाबा बंदा सिंह बहादुर जैसे आध्यात्मिक गुरुओं तथा योद्धाओं के बलिदान का उदाहरण दुनिया के इतिहास में नहीं मिलता है। जीवन में एक सदगुरु का होना आवश्यक है, जो शिष्य, मन और इंद्रियों को संयमित कर साधना करते हैं, वे अवश्य ही गुरु की कृपा के पात्र बनते हैं।हमें अपने आप को गुरु के प्रति पूर्ण रूप से समर्पित कर देना चाहिए तभी हमको सच्चा ज्ञान प्राप्त होगा।अर्जुन ने जब श्री कृष्ण के समक्ष सम्पूर्ण समर्पण किया तब जाकर उन्हें गीता का ज्ञान प्राप्त हुआ।

संगोष्ठी के विशिष्ट वक्ता दिल्ली विश्वविद्यालय के पंजाबी विभाग के विभागाध्यक्ष प्रो.रवि रविंद्र ने अपने वक्तव्य में कहा कि गुरु गोविंद सिंह ‘गुरु शिष्य’ संबंधों के सबसे बेहतरीन उदाहरण थे। बाबा बंदा बहादुर के रण कौशल का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि बाबा बंदा बहादुर सीमित संसाधन के साथ शत्रुओं से लड़े। उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि किसानों को उनका हक मिले। बंदा बहादुर  एक संवेदनशील प्रशासक थे और जीवन के अधिकांश समय प्रतिकूल परिस्थितियों और युद्ध की छाया में रहने के बावजूद न्याय के पथ से कभी विचलित नहीं हुए। इस मौके पर कालिंदी कॉलेज दिल्ली की प्रो.नैना हसीजा ने कहा कि बंदा सिंह बहादुर ने पंजाबियों को उनकी छीनी हुई पहचान, इज्जत के साथ साथ गुलामी की सोच से आजादी दिलाई।

गुरुग्राम विवि द्वारा आयोजित संगोष्ठी में काफी संख्या में प्रोफेसर, विद्यार्थी, शोधार्थी एवं शिक्षकगण ने हिस्सा लिया और विद्वान वक्ताओं ने  अपने अपने विचार साझा किए।

इस मौके पर प्रों. एम. एस. तुरान ,प्रो.बदरुद्दीन, डॉ.अन्नपूर्णा ,डॉ.अमन वशिष्ठ ,डॉ गायत्री रैना, डॉ.अशोक खन्ना,डॉ.नवीन गोयल ,प्रो.राकेश कुमार योगी, डॉ.वंदना हांडा,डॉ. शुभम गांधी , डॉ.एकता ,डॉ.सीमा महलावत , डॉ.नीलम वशिष्ठ आदि विद्वान मौजूद रहे। मंच का संचालन डॉ. सुमन वशिष्ठ ने सफलतापूर्वक किया।

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