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अभी भाजपा की ओर से प्रभारी नियुक्त किए हैं लेकिन चुनाव की घोषणा नहीं की है। माना जा रहा है कि चुनाव सितंबर माह में हो जाएंगे लेकिन कुछ जानकारों का कहना है कि चुनाव सितंबर में संभव है ही नहीं, क्योंकि अभी न तो वोटों की लिस्ट बनी है और उसके पश्चात जो गांव निगम में मिलाए गए हैं, उनकी वार्डबंदी भी होनी है। इन कामों में समय लगेगा। स्मरण रहे कि इन कामों में सरकार को जनता से आपत्तियां लेने में भी समय देना पड़ता है। यह अनुमान भी लगाए जा रहे हैं कि चुनाव प्रक्रिया 2022 समाप्त न हो और चुनाव 2023 की जनवरी-फरवरी में हों।

भारत सारथी/ऋषि प्रकाश कौशिक

गुरुग्राम। सरकार की ओर से तीन निगमों के चुनाव की घोषणा अप्रत्यक्ष रूप से कर दी गई है। भाजपा ने गुरुग्राम के प्रभारी निकाय मंत्री कमल गुप्ता को बनाया है, जबकि पहली बार मानेसर के निगम का प्रभारी पूर्व शिक्षा मंत्री रामबिलास  शर्मा को बनाया है और फरीदाबाद का मुख्यमंत्री के विश्वासपात्र संजय भाटिया को।

चुनाव प्रभारियों की नियुक्तियों के पश्चात से ही गुरुग्राम में चुनाव की हलचल आरंभ हो गई है। हर वार्ड से दर्जनों प्रत्याशी नजर आ रहे हैं चुनाव लडऩे के लिए तैयार। उन लोगों का कहना है कि यह चुनाव भाजपा और आप पार्टी तो चुनाव चिन्ह पर लड़ेंगी, बाकी तो सब निर्दलीय ही होंगे।

यह भी सुना जा रहा है कि कई भाजपाइयों का यह भी कहना है कि यदि टिकट नहीं मिली तो निर्दलीय अपना भाग्य आजमाएंगे। वर्तमान भाजपाई पार्षदों की सोच यह है कि टिकट हमें ही मिलेगा तो लगता है कि भाजपा में भी तमाशा अच्छा देखने को मिलेगा। 

क्या निगम के भ्रष्टाचार होंगे उजागर?

पिछले काफी समय से निगम की कार्यशैली पर प्रश्न लगा रही है जनता, विपक्ष और कुछ वर्तमान पार्षद भी। निगम के अनेक भ्रष्टाचारों की चर्चा रही है। पिछले दिनों निगम के चीफ इंजीनियर और एक पार्षद की कहासुनी के पश्चात अधिकारियों और पार्षदों में स्थिति विषम हो गई लेकिन वर्तमान में सामान्य नजर आ रही है। इसके पीछे कहा जा रहा है कि सब बंदरबांट का झगड़ा था। स्थिति बिगड़ते देख दोनों पक्षों ने यह सोचा कि मिलकर चलने में ही फायदा है वरना रायता फैल जाएगा।

कुछ माह पहले निगम की सामान्य बैठक में निर्णय हुआ था कि पिछले पांच वर्षों में जो कार्य जितने पैसे के निगम ने कार्य हैं, उनकी लिस्ट हर वार्ड के पार्षदों को दी जाए। फिर उसके पश्चात न जानें क्या हुआ, न तो पार्षदों की ओर से यह मांग उठाई गई और न ही अधिकारियों ने कोई चिंता की।

कुछ पार्षदों ने नाम न लिखने की बात पर बताया कि निगम में बहुत घालमेल है। अनेक काम ऐसे हैं जो केवल कागजों में हुए हैं। जमीन पर कहीं दिखाई नहीं दे रहे। यदि लिस्ट दे देंगे तो यह बात खुलकर सामने आ जाएगी कि हमारे वार्ड में कितने काम हुए और कितने पैसे के हुए। कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि छोटे काम की बड़ी पेमेंट हुई हों। 

मौजूदा पार्षद अपने क्षेत्रों में जाकर अपने कामों की उपलब्धि बता रहे हैं लेकिन यह नहीं बता पाए कि उनके कार्यकाल में निगम की ओर से कितना पैसा उनके वार्ड में खर्च हुआ। इनकी इन बातों से आम जनता को अधिकांश अपने काम से काम रखती है और यह सोचती है कि जो काम निगम ने करा दिए वह हमारा भाग्य है। हम कर भी क्या सकते हैं लेकिन वर्तमान समय में जो कुछ वार्ड से अन्य उम्मीदवार चुनाव लडऩा चाहते हैं, वह यह सोच बना रहे हैं कि आरटीआई लगाकर उस क्षेत्र में लगे पैसे और कामों का हिसाब लिया जाए। और फिर वहां जो अनियमितताएं पाई जाएं, उन्हें उजागर कर वर्तमान पार्षद पर आरोप सिद्ध कर विजय की राह प्रशस्त कर सकें तो लगता है कि आरटीआई लगने से कई मामले सामने आ सकते हैं।

गुरुग्राम का निगम बहुत धनाड्य निगम है और इसी निगम में प्रधानमंत्री के स्वच्छ भारत अभियान को पलीते लग रहे हैं। गुरुग्राम में जगह-जगह कूड़े के अंबार देखने को मिल जाते हैं। ऐसा नहीं है कि निगम सफाई पर पैसा नहीं खर्च रही लेकिन सफाई की कंपनी इकोग्रीन पर सदा ही निगम की सामान्य बैठकों में पार्षदों और चेयरमैनों द्वारा आरोप लगाए जाते रहे हैं परंतु हल कोई निकला नहीं।

अभी चंद रोज पहले भाजपा के पर्यावरण विभाग के सचिव का ब्यान आया था कि वह कूड़ा जलाने पर रोक लगाने का प्रशासन को पत्र लिखेंगे। यह बात सिद्ध करती है कि गुरुग्राम में कूड़े का निस्तारण उचित नहीं हो रहा है। पर्यावरण सचिव तो एक स्थान की कह रहे हैं लेकिन गुरुग्राम में अनेक स्थानों पर कूड़े का निस्तारण वहीं जलाकर किया जाता है।

सड़कें बनाने पर कितनी धनराशि खर्च होती है लेकिन फिर भी सड़कों पर गड्ढ़े आने वाले को भी बता देते हैं कि गुरुग्राम निगम की कार्यशैली कितनी अच्छी है। 

इसी प्रकार सड़कों पर लगे हुए बोर्ड निगम को मुंह चिढ़ाते मिल जाते हैं। सीवरों का हाल जनता तो भुगत रही है लेकिन अब सारा हरियाणा जान रहा है कि किस प्रकार सीवरों की सफाई या जलनिकासी का समुचित समाधान नहीं हुआ, इसीलिए गुरुग्राम के उपायुक्त ने बचाव के लिए 16 वरिष्ठ अधिकारियों की कमेटी बनाई है।  तात्पर्य यह कि प्रशासन और सरकार खुद मान रही है कि हम नालों और सीवरों की सफाई समय पर नहीं करा पाए।

इन सब कारणों के लिए जनता को अपने चुने हुए प्रतिनिधियों अर्थात मेयर और पार्षदों को ही जिम्मेदार मानेगी न कि जब अधिकारी उचित ढंग से कार्य नहीं कर रहे हैं तो उन्होंने इसकी शिकायत क्यों नहीं की।

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