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—-बासी रावड़ी में फिर से उठाया जा रहा है उबाल
—- अतीत में पंडित रामविलास शर्मा करते रहे हैं यह प्रयास

अशोक कुमार कौशिक  

नारनौल । जिला महेंद्रगढ़ में आजकल एक बार फिर से गड़े मुर्दे उखाड़े जा रहे हैं, जो कभी खुद से नहीं हो सका उसे फिर से हवा दी जा रही है। सवाल यह नहीं है  कि कौन गलत है कौन सही? सवाल यह भी नहीं है की यह मांग जब रेवाड़ी जिला बना अथवा दादरी जिला बना तब क्यों नहीं उठी? क्योंकि अतीत में दादरी भी महेंद्रगढ़ का हिस्सा रही है। क्या रियासतों के समय का नक्शा फिर से निर्धारित करने की कोशिश तो नहीं की जा रही, क्योंकि जिला महेंद्रगढ़ पटियाला और नाभा रियासत के समय दो हिस्से में था ? नारनौल क्षेत्र पटियाला में कनीना काटी बावल क्षेत्र नाभा राज्य का हिस्सा हुआ करता था। पर इस रियासती नक्शे को बनाने के पीछे राजनीतिक बू स्पष्ट दिखाई दे रही है।

काफी दिन से महेंद्रगढ़ जिले का नाम व जिला हेड क्वार्टर बदलने का मुद्दा लगातार गर्माया हुआ है। कभी आंदोलन तो कभी कोर्ट की बातें कही जाती है। महेंद्रगढ़ में रहने वाले लोगों को 55 साल बाद शायद याद तो आया अब जिला हेड क्वार्टर महेंद्रगढ़ में होना चाहिए? जी नहीं अतीत में अपने मंत्री बनने से ही महेंद्रगढ़ से भाजपा के विधायक बने पंडित रामविलास शर्मा लगातार यह प्रयासरत रहे की जिला मुख्यालय नारनौल की बजाए महेंद्रगढ़ को किया जाए। उस समय के पत्रकारों ने इसका पुरजोर विरोध किया था। जन भावनाओं और मीडिया के दबाव के चलते पंडित जी अपने मंसूबों में कामयाब नहीं हो पाए। अब अतीत में जो आग दब चुकी थी उसे अब फिर हवा दी जा रही है। इस बात की साक्षी जिले के वरिष्ठ पत्रकार रोहतास सिंह यादव है, जिन्होंने अपने अन्य समकालीन साथियों के साथ मिलकर पंडित जी कि इस राजनीतिक  कू चाल का जमकर विरोध किया था।

 बात उस समय रेवाड़ी भी महेंद्रगढ़ जिले का अंग होता था  । हरियाणा में दैनिक ट्रिब्यून, जनसत्ता, नवभारत टाइम्स, हिंदुस्तान, मिलाप, वीर अर्जुन, पंजाब केसरी सहित साप्ताहिक समाचार पत्रों की तूती बोलती थी। सरकार और प्रशासन में मीडिया का हव्वा होता था । उन दिनों महेंद्रगढ़ से महावीर भारद्वाज, महेंद्र तिवारी, नारनौल से रोहतास सिंह यादव, ज्ञान स्वरूप भारद्वाज, सुरेंद्र व्यास, पी एस राव, हरबंस लाल चौधरी, छाजू राम स्नेक, जितेंद्र मिश्रा,अटेली से रोहित यादव, अशोक कौशिक, सोहन सिंह, रतन लाल शर्मा, रेवाड़ी से नवल किशोर रस्तोगी, नरेश चौहान, तरुण जैन, महावीर निनानिया एक दो लोग साप्ताहिक अखबार के लिए भी करते थे तथा धारूहेड़ा से मोहन जैतोई आदि पत्रकारिता में कार्यरत  थे। उस समय कभी इस प्रकार के विवाद को सार्वजनिक तौर पर हवा नहीं दी गई अब क्यों महेंद्रगढ़ जिले में रियासतों का पुराना नक्शा बनाने की चेष्टा की जा रही है?

मैं उनका भी समर्थन करता हूं जो चाहते हैं कि जिला हेडक्वार्टर महेंद्रगढ़ बने। महेंद्रगढ़ के साथियों यही मांग यदि आप रेवाड़ी जिला बनते समय उठाते या दादरी जिला बनते समय उठाते तो ज्यादा वाजिब रहता आप जिला मुख्यालय की मांग के बजाय नए जिले की मांग क्यों नहीं उठा रहे? सबसे पहले तो बेहतर यह होता कि भाजपा शासन में आप महेंद्रगढ़ का नाम कानोड़ करवाते। भाजपा शहरों के नाम बदल कर पूरा उसके ऐतिहासिक नाम को देने में की आगे रही है।नारनौल को 55 साल तक जिला हेडक्वार्टर के रूप में संजोकर कर रखा गया। पर विभाजन कि यह प्रक्रिया भाजपा शासनकाल में ही शुरू हुई। जब कनीना को उपमंडल का दर्जा दिया गया तथा कनीना में ही पुलिस उपाधीक्षक का कार्यालय खोला गया। जिसे अटेली से जोड़ दिया गया। इस बात का न तो राजनीतिक क्षेत्र में और न ही मीडिया क्षेत्र में कोई बड़ा विरोध हो पाया। इसी के चलते उन राजनेताओं में दोबारा से आस बंधी जो अपना राजनीतिक वर्चस्व लगभग गवा चुके। वह इस मुद्दे के सहारे दोबारा से शांत महेंद्रगढ़ क्षेत्र को अशांति की ओर धकेल रहे है।

अब यह मांग कहां से आ गई है । महेंद्रगढ़ में रहने वाले लोगों का कहना है कि नारनौल तक पहुंचने में समय लगता है और दूरी ज्यादा होने की वजह से लोगों को तकलीफ होती है। इसलिए जिला हेडक्वार्टर महेंद्रगढ़ में होना चाहिए लेकिन समस्या इधर से खत्म होगी तो उधर शुरू हो जाएगी क्योंकि फिर नांगल चौधरी विधानसभा के आखिरी छोर के गांव के लिए समस्या शायद और बड़ी हो 60 किलोमीटर तक का सफर उन्हें करना पड़े, या फिर अटेली क्षेत्र के गनियार, बजार, चंद्रपुरा, बोचरिया, अटेली, बेगपुर, तथा कांटी, खेड़ी नावदी, रामपुरा, बिहाली के लोगों को नहीं होगी।
वैसे सब कुछ तो है महेंद्रगढ़ जिले में जिला उपायुक्त जिला पुलिस कप्तान भी सप्ताह में 1 दिन वहां बैठना शुरु कर दिया। कुछ विभाग के अधिकारी नारनौल में बैठते हैं बाकी करीब-करीब हर विभाग का अधिकारी महेंद्रगढ़ जिले में बैठता है।

अब सवाल खड़ा होता है क्यों ना नारनौल को अलग जिला बना दिया जाए तो समस्या ही खत्म हो जाएगी लेकिन समस्या खत्म नहीं होगी समस्या और ज्यादा बढ़ जाएगी जिसका कारण यह है कि एक तो क्षेत्रफल के आधार पर अभी महेंद्रगढ़ नारनौल को अलग करना सही नहीं है वहीं दूसरी बात बाकी जिलों के क्षेत्रफल के हिसाब से महेंद्रगढ़ जिला इतना बड़ा भी नहीं है कि जिस के दो भाग करके नारनौल को अलग जिला बनाया जा सके।

अगर अलग जिला बनाया जाता है तो सरकार पर अतिरिक्त भार होगा और अतिरिक्त भार टैक्स के रूप में जनता की जेब से ही वसूला जाएगा

अब इतना शोर शराबा क्यों है। इसे भी जान लेते हैं कुछ लोग इसे राजनीतिक स्टंट बता रहे हैं वहीं कुछ लोगों का कहना है मांग उठाते काफी लंबा समय हो गया कुछ गलतियां सरकार के अधिकारियों की भी रही जिन्होंने जिले का माहौल खराब करने के लिए पत्राचार में जिले का नाम नारनौल लिख दिया जिसके बाद मुद्दा और गरमा गया।

मेरा मानना है कि महेंद्रगढ़ जिले के भाईचारे को कायम रखें समय के साथ परिवर्तन भी होंगे लेकिन सिर्फ एक तरफा ना सोच कर दोनों तरफ सोच और विचार करें।

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