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-कमलेश भारतीय

राजनिति में जनता की मर्जी कब चली ? कौन पूछे जनता की पसंद ? कौन पूछे जनता की राय ? हां जनता की राय के निमित्त पर दिखावा जरूर होता आया है । आप के राष्ट्रीय संयोजक और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पंजाब में यह शिगूफा छोड़ कर शुरूआत की कि हम जनता की पसंद का मुख्यमंत्री बनायेंगे जैसे दिल्ली में पहली बार 28 सीटें जीतने पर कांग्रेस के आठ सदस्यों का सहयोग लें या न लें पल कितना बड़ा ड्रामा करने के बाद गठबंधन करने में देर नहीं लगाई थी और पहली बार मुख्यमंत्री भी बने थे । जिस कांग्रेस को पानी पी पी कर कोसा उसी कांग्रेस के साथ गठबंधन कर लिया जनता की राय के नाम पर । ऐसे ही किया हरियाणा में जननायक जनता पार्टी ने जब त्रिशंकु परिणाम आया तब जिस भाजपा को यमुना पार भेजने के दावे कर रहे थे उसी के साथ सरकार बनाने में देर न की । अब भाजपा के साथ राज ठाट हो रहे हैं और दादा गौतम नारनौल के विकास को लेकर रो रहे हैं । दूसरी बार मंत्रिमंडल के विस्तार में दादा गौतम की बजाय देवेंद्र बबली को मंत्रिमंडल में स्थान मिला । बरवाला के विधायक जोगेंद्र सिहाग भी देखते रह गये । हालांकि इसी मंत्रीपद की आस में चेयरमैनी भी छोड़ दी लेकिन दुविधा में दोऊ गये न चेयरमैन बने न मंत्री । रह गये विधायक के विधायक । इस तरह न जनता की चली न ही विधायक की । टोहाना की जनता की चली ।

जनता की राय क्या कोई मायने रखती है ? बहुत रखती है यदि जनता अपनी पर आ जाये । आपातकाल के खिलाफ आंदोलन जनता की राय ही तो थी और जनता ने सन् 1977 के लोकसभा चुनाव में इंदिरा गांधी , बंसीलाल जैसे लोगों को हरा कर जता दिया था कि जनता की राय क्या होती है । जनता की राय थी किसान आंदोलन के साथ और जनता ने दिखा दिया जब प्रधानमंत्री को टी वी पर आकर तीनों कृषि कानून वापस लेने की घोषणा करनी पड़ी । अब केजरीवाल कह रहे हैं कि जनता मुझे मुख्यमंत्री के रूप में देखना चाहती है और भगवत मान भी पसंद है लेकिन हम जनता की राय से ही मुख्यमंत्री बनायेंगे । कांग्रेस में चन्नी और सिद्धू भी जनता की राय के बिना मुख्यमंत्री बनने को तैयार बैठे हैं लेकिन जनता जिसे चाहेगी उसे भी कुर्सी सौंपेगी ।
-पूर्व उपाध्यक्ष, हरियाणा ग्रंथ अकादमी ।

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