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कुरुक्षेत्र धर्म स्थान है जहां भगवान श्री कृष्ण के श्री मुख से उत्पन्न हुई पावन गीता का जन्मोत्सव गीता जयंती मनाई जाती है : ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी

गीता में जीवन का सार है, जिसे पढ़कर कलयुग में भी मनुष्य को सही राह मिलती है।

वैद्य पण्डित प्रमोद कौशिक

कुरुक्षेत्र, 24 नवम्बर : अगर हर मनुष्य को गीता का ज्ञान हो तो समाज में हर समस्या का समाधान हो जाएगा। कुरुक्षेत्र तीर्थों की संगम स्थली ही नहीं बल्कि वह धर्म स्थान है जहां भगवान श्री कृष्ण के श्री मुख से उत्पन्न हुई पावन गीता का जन्मोत्सव गीता जयंती मनाई जाती है। गीता के महत्व पर चर्चा करते हुए देशभर में संचालित श्री जयराम संस्थाओं के परमाध्यक्ष ब्रह्मस्वरूप ब्रह्मचारी ने कहा कि गीता में जीवन का सार है। जिसे पढ़कर कलयुग में भी मनुष्य को सही राह मिलती है। इसी महत्व को देखते हुए गीता जयंती का आयोजन होता है।

ब्रह्मचारी ने कहा कि गीता एकमात्र ऐसा महान ग्रन्थ है जिसके जन्म दिवस को गीता जयंती के रूप में मनाया जाता है। भगवत गीता का धर्म समाज में सबसे ऊपर स्थान माना जाता है। इसे सबसे पवित्र ग्रंथ माना जाता है। ब्रह्मचारी ने कहा कि गीता स्वयं श्री भगवान कृष्ण ने मोह ग्रस्त अर्जुन को सुनाई थी। महाभारत के युद्ध में अर्जुन अपने सगों को दुश्मन के रूप में सामने देखकर विचलित हो जाता है और अर्जुन शस्त्र उठाने से इंकार कर देता है। तब स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को मनुष्य धर्म एवं कर्म का उपदेश दिया। यही उपदेश भगवत गीता में लिखा हुआ है, जिसमें मनुष्य के सभी धर्मों एवं कर्मों का समावेश है। ब्रह्मचारी ने बताया कि मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष की एकादशी का दिन भगवत गीता जयंती के रूप में प्रतिवर्ष मनाया जाता है। भगवत गीता का जन्म भगवान श्री कृष्ण के मुख से कुरुक्षेत्र के मैदान में महाभारत के हुआ था।

उन्होंने कहा कि गीता केवल धर्म संस्कृति व समाज को मार्गदर्शन नहीं देती है। यह जातिवाद से कहीं ऊपर मानवता का ज्ञान देती है। गीता के अठारह अध्यायों में मनुष्य के सभी धर्म एवं कर्म का ब्यौरा है। इसमें सतयुग से कलयुग तक मनुष्य के कर्म एवं धर्म का ज्ञान है। ब्रह्मचारी ने कहा कि गीता के श्लोकों में मनुष्य जीवन का आधार छिपा है। मनुष्य के लिए क्या कर्म है, उसका क्या धर्म है। इसका विस्तार स्वयं भगवान श्री कृष्ण ने अपने मुख से कुरुक्षेत्र की धरती पर किया था। उसी ज्ञान को गीता के पन्नों में लिखा गया है। यह सबसे पवित्र और मानव जाति का उद्धार करने वाला ग्रन्थ है।

ब्रह्मचारी ने कहा कि महाभारत काल कुरुक्षेत्र का वह भयावह युद्ध है, जिसमें भाई ही भाई के सामने शस्त्र लिए खड़ा था। वह युद्ध धर्म की स्थापना के लिए था। उस युद्ध के दौरान अर्जुन ने जब अपने ही दादा, भाई एवं गुरुओं को सामने दुश्मन के रूप में देखा तो उसका गांडीव (अर्जुन का धनुष) हाथों से छुटने लगा, उसके पैर कांपने लगे थे। उसने युद्ध करने में अपने आप को असमर्थ पाया। तब भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को उपदेश दिया। इस प्रकार गीता का जन्म हुआ। श्री कृष्ण ने अर्जुन को धर्म की सही परिभाषा समझाई। उसे निभाने की ताकत दी। एक मनुष्य रूप में अर्जुन के मन में उठने वाले सभी प्रश्नों का उत्तर श्री कृष्ण ने स्वयं अर्जुन को दिया। उसी का विस्तार भगवत गीता में समाहित है, जो आज मनुष्य जाति को उसका कर्तव्य एवं अधिकार का बोध कराता है। गीता का जन्म मनुष्य को धर्म का सही अर्थ समझाने की दृष्टि से किया गया। जब गीता का वाचन स्वयं प्रभु ने किये उस वक्त कलयुग का प्रारंभ हो चुका था। कलयुग ऐसा दौर है जिसमें गुरु एवं ईश्वर स्वयं धरती पर मौजूद नहीं हैं, जो भटकते अर्जुन को सही राह दिखा पाएं। ऐसे में गीता का उपदेश मनुष्य जाति को राह प्रशस्त करता है। इसी कारण महाभारत काल में गीता की उत्पत्ति की गई।

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